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भक्तों के लिए भगवान को भी बौना होना पड़ता है.

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02 Jun 26
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भक्तों के लिए भगवान को भी बौना होना पड़ता है.

पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने जगदीश मंदिर में पुरुषोत्तम मास की श्रीमद भागवत पुराण कथा में भगवान के वामन अवतार का रोचक वृत्तांत सुनाया*

*सच्ची महानता शक्ति में नहीं, बल्कि वचनपालन, विनम्रता और समर्पण में होती है*

उदयपुर:
उदयपुर के सुप्रसिद्ध जगदीश मंदिर में पुरूषोत्तम मास के सोहलवें दिन व्यास पीठ से श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा का वाचन करते हुए पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने भगवान वामन और राजा बलि के प्रसंग को रोचक ढंग से सुनाया ।

पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने कहा कि भगवान अपने भक्तों के लिए क्या नहीं करते? तीनों लोको, पर्वत, नदियों, आकाश और समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी विराट रूपधारी भगवान विष्णु अपने भक्तों के हित के लिए बौना रूप (वामन स्वरूप ) तक धारण कर लेते हैं। यही नहीं, जगत के स्वामी भिक्षा में राजा से जागीर भी माँगने आ जाते हैं। भगवान वामन और राजा बलि का प्रसंग हिंदू धर्म के प्रमुख और प्रेरणादायक आख्यानों में से एक है। देवताओं की रक्षा और राजा बलि के अहंकार को दूर करने के लिए भगवान वामन ने एक बटुक (बाल ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया। इसका वर्णन विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और अन्य पुराणों में मिलता है। वामन को भगवान विष्णु का पाँचवाँ अवतार माना जाता है।

महाबली दैत्यराज बलि प्रह्लाद के पौत्र थे। अपने बल और तपस्या के प्रभाव से उन्होंने स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। जब राजा बलि एक विशाल यज्ञ कर रहे थे, तब वामन भगवान वहाँ पहुँचे। राजा बलि ने उनका सम्मान किया और इच्छानुसार दान माँगने को कहा। वामन भगवान ने कहा “मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।” इस पर राजा बलि हँस पड़े और बोले कि इतने छोटे से ब्राह्मण को इतना ही चाहिए? उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें धन-धान्य से इतना भर दूँगा कि तुम्हारी सात पीढ़ी उपयोग करेगी तो भी कम नहीं होगा क्योंकि लेकिन वामन भगवान वामन ने कहा कि “मनुष्य को अधिक लोभ नहीं करना चाहिए। यदि तुम एक द्वीप भी किसी को दान में दोंगे तो उसे उसके पास के द्वीपों की चाह रहेंगी। इंसान की तृष्णा (इच्छा ) कभी पूरी नहीं होती है। सबसे बड़ा धन संतोष ही होता है। इसलिए मुझे तो केवल तीन पग भूमि का दान ही चाहिए । बौने कद के बालक वामन जब अपनी बात पर अड़ गए तो यह सुन गर्विले राजा बलि ने उन्हें तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। पास खड़े राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें चेतावनी भी दी कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं, परन्तु बलि अपने वचन पर अडिग रहें। बलि ने तीन पद दान में देने का संकल्प लेकर वामन देवता से तीन डग भरने को कहा, तब दान का संकल्प होते ही वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया।पहले पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्ग और आकाश को माप लिया।अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा। तब राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर प्रस्तुत कर दिया और कहा, प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।भगवान ने तीसरा पग उनके सिर पर रखा और उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया। फिर भी एक पग देना शेष रह गया।

वामन अवतार की कथा से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि मनुष्य को अपने धन, श्रम आदि का कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। यहाँ तक कि अपनी भक्ति का भी नहीं।
राजा बलि की पत्नी विंध्यावली ने कहा – “कुछ लोग समझते हैं कि ये सभी मेरा है । है प्रभु आपको कोई क्या दे सकता है, क्योंकि सब कुछ ही तो आपका ही ही तो है। अपनी तो कोई वस्तु है ही नहीं।”

यह कथा केवल देव-असुर संघर्ष की नहीं, बल्कि दान, सत्यनिष्ठा, विनम्रता और अहंकार त्याग की शिक्षा देती है।राजा बलि ने अपने वचन की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग दिया।भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्हें अमर यश प्रदान किया।बलि को वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने का वरदान भी मिला। ओणम पर्व को इसी घटना से जोड़ा जाता है, विशेषकर केरल में।

इस प्रकार वामन और बलि का प्रसंग यह बताता है कि सच्ची महानता शक्ति में नहीं, बल्कि वचनपालन, विनम्रता और समर्पण में होती है।


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