पद्मभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन का समाचार सुनते ही मन जैसे एकाएक शून्य हो गया। ऐसा लगा मानो भारतीय लोककला की एक युगप्रवर्तक आवाज़ हमेशा के लिए मौन हो गई हो। वे केवल पंडवानी की कलाकार नहीं थीं, बल्कि उस प्राचीन लोक परंपरा की जीवंत आत्मा थीं। उन्होंने महाभारत की कथाओं को केवल गाया नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व, स्वर, अभिनय और अद्भुत अभिव्यक्ति से उन्हें जीया। उनकी प्रस्तुति देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को उस कथा का सहभागी अनुभव करता था।
भारतीय लोक परंपरा में पंडवानी की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने का श्रेय जिस कलाकार को सबसे अधिक जाता है, वह निस्संदेह तीजन बाई हैं। उनकी बुलंद आवाज़, कापालिक शैली की दमदार प्रस्तुति, संवाद अदायगी और अभिनय की सहजता उन्हें असाधारण बनाती थी। उनके हाथों में मोरपंख से सजा तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी परशु, कभी तलवार और कभी किसान का हल। दर्शकों के सामने बिना किसी मंचीय आडंबर के वे महाभारत के प्रत्येक पात्र को सजीव कर देती थीं।
मुझे अपने जीवन में अनेक बार उन्हें निकट से देखने, सुनने और समझने का सौभाग्य मिला। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए मेरी जिम्मेदारियों में मंच संचालन भी शामिल था। मेरा स्वभाव रहा कि किसी भी कलाकार का मंच से परिचय देने से पहले मैं उसके जीवन, कला, साधना और सोच को विस्तार से जानने का प्रयास करता था। यही कारण था कि तीजन बाई से भी कई बार लंबी आत्मीय बातचीत का अवसर मिला। उनकी सादगी, सहजता और लोकजीवन से गहरा जुड़ाव मुझे हमेशा प्रभावित करता रहा।
शिल्पग्राम उत्सव, उदयपुर में उनकी प्रस्तुतियाँ आज भी मेरी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ जीवित हैं। जैसे ही मंच से मैं उनकी प्रस्तुति का परिचय देता और अंत में पूरे उत्साह से कहता— "आइए, स्वागत करें पद्मभूषण डॉ. तीजन बाई का..."— वैसे ही संगीत की लय के साथ उनका मंच पर ओजस्वी प्रवेश होता। उस क्षण पूरा वातावरण वीर रस से भर उठता था। दर्शकों की तालियाँ देर तक गूँजती रहतीं और कुछ ही क्षणों में पूरा सभागार महाभारत के युग में पहुँच जाता।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कथा को केवल सुनाती नहीं थीं, बल्कि जीती थीं। एक ही प्रस्तुति में वे वीर रस से लेकर करुण, हास्य, रौद्र, अद्भुत, भय, वीभत्स और श्रृंगार तक सभी रसों का ऐसा प्रभावशाली संचार करती थीं कि दर्शक भावनाओं की पूरी यात्रा कर लेते थे। बीच-बीच में समसामयिक प्रसंगों को सहज ढंग से जोड़कर वे श्रोताओं को कभी हँसा देतीं, तो कभी उनकी आँखें नम कर देतीं। प्रस्तुति समाप्त होने पर उनका आत्मीय अभिवादन दर्शकों के हृदय को छू जाता था।
उदयपुर के अतिरिक्त मुझे बसंत उत्सव, गांधीनगर, लोकोत्सव गोवा, दिल्ली और मुंबई सहित अनेक सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी प्रस्तुतियाँ सुनने का अवसर मिला। हर मंच पर उनका वही आत्मविश्वास, वही ऊर्जा और वही समर्पण दिखाई देता था। वे जहाँ भी जातीं, वहाँ केवल कार्यक्रम नहीं होता था, बल्कि लोकसंस्कृति का एक जीवंत उत्सव आकार लेता था।
मेरे जीवन की सबसे अविस्मरणीय स्मृतियों में एक घटना मुंबई विश्वविद्यालय के कलीना परिसर की है। वहाँ संगीत मार्तंड पद्मभूषण पंडित जसराज जी की गरिमामयी उपस्थिति में तीजन बाई ने महाभारत का कर्ण प्रसंग प्रस्तुत किया। उस दिन मैंने कला की वह ऊँचाई देखी, जहाँ शब्द, स्वर और अभिनय एकाकार होकर साधना का रूप ले लेते हैं। कर्ण की पीड़ा, उसका स्वाभिमान और उसका अंत जिस भाव से उन्होंने प्रस्तुत किया, उसने पूरे सभागार को स्तब्ध कर दिया। स्वयं पंडित जसराज जी भी भाव-विभोर हो गए थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इन दोनों महान विभूतियों को एक-दूसरे के प्रति आदर, स्नेह और कृतज्ञता व्यक्त करते देख मेरी आँखें भी भर आई थीं। वह दृश्य आज भी मेरी स्मृतियों का अनमोल हिस्सा है।
तीजन बाई की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने लोककला को केवल संरक्षित नहीं किया, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुँचाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोक परंपराएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की सांस्कृतिक चेतना और भविष्य की प्रेरणा भी हैं। वे मंच पर जितनी विराट दिखाई देती थीं, व्यक्तिगत जीवन में उतनी ही सरल, विनम्र और आत्मीय थीं। यही गुण उन्हें महान कलाकारों की श्रेणी में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी आवाज़, उनका तंबूरा, उनका अभिनय और महाभारत के अमर प्रसंग भारतीय संस्कृति की स्मृतियों में सदैव गूँजते रहेंगे। आने वाली पीढ़ियाँ जब भी पंडवानी का इतिहास पढ़ेंगी, तीजन बाई का नाम उसके स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित मिलेगा।
मेरे लिए तीजन बाई केवल एक महान लोक कलाकार नहीं थीं; वे भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत पाठशाला थीं। उनसे हर मुलाकात ने मुझे कला के प्रति समर्पण, साधना और संवेदनशीलता का नया अर्थ समझाया। उनकी स्मृतियाँ मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं और सदैव रहेंगी।
लोककला की यह अमर साधिका भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनकी आवाज़ और उनका अद्वितीय व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति के आकाश में सदैव ध्रुवतारे की तरह चमकता रहेगा।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि।