नई दिल्ली: शिंगल्स एक्शन वीक (23 फरवरी से 1 मार्च, 2026) से पहले जारी एक नए वैश्विक सर्वे में यह सामने आया है कि भारत में 50 साल से ज्यादा उम्र के लोग और पुरानी (क्रोनिक) बीमारियों से जूझ रहे लोग शिंगल्स से काफी प्रभावित हो रहे हैं। इसके बावजूद, इस बीमारी से बचाव को लेकर डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत बहुत कम हो रही है।
जीएसके द्वारा किए गए इस सर्वे के अनुसार, शिंगल्स से पीड़ित 43% भारतीयों ने बताया कि उन्हें इस बीमारी में बहुत ज्यादा दर्द सहना पड़ा। हर तीन में से एक व्यक्ति ने कहा कि वे काम करने या सामाजिक कार्यक्रमों में जाने में सक्षम नहीं रहे। क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) और कार्डियोवस्कुलर डिजीज (सीवीडी) से पीड़ित लोगों को शिंगल्स के कारण ज्यादा परेशानी हुई। वहीं डायबिटीज और सीवीडी के मरीज भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा प्रभावित पाए गए।
शिंगल्स एक दर्दनाक बीमारी है, जो वेरिसेला-जोस्टर वायरस (वीजेडवी) के दोबारा सक्रिय होने से होती है। यही वायरस चिकनपॉक्स का कारण भी बनता है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है, जिससे शिंगल्स का खतरा बढ़ जाता है। यह बीमारी आमतौर पर शरीर के एक हिस्से में रैश से शुरू होती है, जिसके साथ सीने, पेट या चेहरे पर दर्दनाक छाले हो सकते हैं। शिंगल्स से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है।
सर्वे में यह भी पाया गया कि पुरानी बीमारियों से जूझ रहे चार में से एक व्यक्ति को शिंगल्स के बारे में लगभग कुछ भी जानकारी नहीं है। वहीं, करीब तीन में से एक व्यक्ति को यह पता नहीं था कि क्रोनिक बीमारियों के कारण शिंगल्स का खतरा कैसे बढ़ जाता है।
50 साल या उससे ज्यादा उम्र के और किसी क्रोनिक बीमारी से जूझ रहे लगभग 75% भारतीय नियमित रूप से डॉक्टर के पास जाते हैं। इसके बावजूद करीब आधे (48%) लोगों ने कभी अपने डॉक्टर से शिंगल्स के बारे में बात नहीं की।
डायबिटीज से जूझ रहे 49% और सीवीडी से जूझ रहे 37% लोगों ने भी माना कि उन्होंने शायद ही कभी अपने डॉक्टर से शिंगल्स पर चर्चा की है।
सर्वे में कुछ गलतफहमियां भी सामने आईं। करीब पांच में से एक व्यक्ति का मानना था कि उनकी पुरानी बीमारी का उनकी इम्यूनिटी पर कोई असर नहीं पड़ता और इससे शिंगल्स का खतरा नहीं बढ़ता। वहीं करीब एक तिहाई लोगों को लगता था कि अगर वे अपनी क्रोनिक बीमारी को सही से संभाल रहे हैं, तो उन्हें संक्रमण नहीं होगा। जिन लोगों को शिंगल्स हो चुका है, उनमें भी चार में से एक (26%) को यह अंदाजा नहीं था कि यह इतनी गंभीर बीमारी हो सकती है।
जीएसके इंडिया की एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट – मेडिकल अफेयर्स, डॉ. शालिनी मेनन ने कहा,
“भारत में लोग पहले से ज्यादा उम्र तक जी रहे हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे पूरी तरह स्वस्थ हों। उम्र बढ़ने के साथ डायबिटीज, हाई बीपी, हृदय रोग, किडनी और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ये बीमारियां इम्यून सिस्टम को कमजोर करती हैं, जिससे संक्रमण से लड़ने की क्षमता घटती है। इसके बावजूद लोगों में क्रोनिक बीमारी और इम्यून हेल्थ के संबंध को लेकर जागरूकता बहुत कम है। मरीजों को अपने डॉक्टर से खुलकर और नियमित रूप से बात करनी चाहिए।”
दुनियाभर में बढ़ती उम्र के साथ शिंगल्स के मामले बढ़ रहे हैं। जापान में 2020 में 65 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोग कुल आबादी का करीब 29% थे। इसी के साथ वहां शिंगल्स के मामलों में 50% से ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई। इसके बाद जापान के कुछ प्रांतों में 65 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों के लिए शिंगल्स का टीका टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया गया।
भारत भी तेजी से उम्रदराज आबादी की ओर बढ़ रहा है। अभी देश में 60 साल से ज्यादा उम्र के करीब 15.3 करोड़ लोग हैं। 2050 तक यह संख्या बढ़कर 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। अभी 7.5 करोड़ से ज्यादा वरिष्ठ नागरिक किसी न किसी क्रोनिक बीमारी से जूझ रहे हैं। वहीं 27% लोग एक से ज्यादा पुरानी बीमारियों से प्रभावित हैं, जिनमें डायबिटीज (करीब 20%) और कार्डियोवस्कुलर डिजीज (29%) शामिल हैं। बढ़ती उम्र और पुरानी बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में भारतीय शिंगल्स के ज्यादा खतरे में हैं।
इन स्वास्थ्य समस्याओं का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य पर इसका दबाव बढ़ सकता है। स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता है, काम करने की क्षमता घटती है और लंबे समय तक देखभाल की जरूरत बढ़ती है। लगभग 78% वयस्कों के पास पेंशन या वित्तीय सुरक्षा नहीं है, इसलिए इलाज का खर्च परिवारों को उठाना पड़ता है।
ऐसे में जरूरी है कि इलाज के साथ-साथ बचाव पर भी ध्यान दिया जाए। सर्वे बताता है कि वयस्क टीकाकरण को स्वास्थ्य चर्चा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, खासकर उन लोगों के लिए जो क्रोनिक बीमारियों से जूझ रहे हैं। सर्वे के अनुसार, डॉक्टर (38%) या शिंगल्स से पीड़ित किसी व्यक्ति (41%) से जानकारी मिलने पर लोग इस बीमारी को बेहतर समझ पाते हैं। सही समय पर बातचीत और जागरूकता से इस बीमारी से होने वाली परेशानियों को काफी हद तक टाला जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है।