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कोटा के सरस दूध में तेल-केरोसिन जैसी बदबू,चाय के दुकानदारों के साथ चाय के शौकीन हुए परेशान

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21 May 26
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कोटा के सरस दूध में तेल-केरोसिन जैसी बदबू,चाय के दुकानदारों के साथ चाय के शौकीन हुए परेशान

कोटा |  के सरस दूध में तेल-केरोसिन जैसी बदबू,चाय के दुकानदारों के साथ चाय के शौकीन हुए परेशान मई। शहर में 19 मई को उस वक्त हड़कंप मच गया जब सरस डेयरी के दूध से तेल और केरोसिन जैसी तेज बदबू आने की शिकायतें पूरे शहर से सामने आने लगीं थीं। सुबह-सुबह घरों, चाय की थड़ियों और होटलों में जैसे ही दूध गर्म किया गया, लोगों को उसमें अजीब गंध महसूस हुई। देखते ही देखते मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया। चाय के दुकानदारों ने बताया कि सरस की हरी वाली थैली में तो अक्सर ऐसी शिकायतें आती रहती है लेकिन गोल्ड की थैली के दूध में पहली बार इस तरह की शिकायत आई है।

लोग एक-दूसरे को फोन कर पूछते रहे तुम्हारे दूध में भी बदबू आ रही है क्या? कहीं चाय फेंकी गई, कहीं बच्चों को दूध पिलाने से रोक दिया गया। शहरभर में सरस दूध को लेकर अविश्वास और नाराज़गी का माहौल बन गया।

शहर के कई इलाकों से उपभोक्ताओं ने आरोप लगाया कि दूध में तेल और केरोसिन जैसी गंध थी। कई लोगों ने दूध को तुरंत फेंक दिया। चाय विक्रेताओं का कहना है कि जैसे ही दूध उबाला गया, बदबू इतनी तेज थी कि ग्राहकों ने चाय पीने से ही इनकार कर दिया।सूत्रों के अनुसार, मामले के बाद करीब 9000 लीटर दूध नष्ट किए जाने की चर्चा भी सामने आई है।

हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन शहर में यह आंकड़ा चर्चा में बना हुआ है।

शिकायत लेकर पहुंचे तो मिला उल्टाजवाब-

बताया जा रहा है कि जब उपभोक्ता शिकायत लेकर डेयरी प्रबंधन के पास पहुंचे तो उन्हें संतोषजनक जवाब देने की बजाय उल्टा जवाब सुनने को मिला। आरोप है कि मार्केटिंग विभाग के महेंद्र राठौड़ ने शिकायतकर्ताओं को गंभीरता से लेने की बजाय टालने वाला रवैया अपनाया। इस व्यवहार से उपभोक्ताओं में और ज्यादा गुस्सा फैल गया। लोगों का कहना है कि जब खाद्य सुरक्षा जैसे गंभीर मामले पर भी जिम्मेदार अधिकारी संवेदनशील नहीं हैं, तो आम जनता आखिर किस पर भरोसा करे।

नकली दूध की चर्चाओं ने फिर उठाए बड़े सवाल-शहर में लंबे समय से डेयरी में नकली और मिलावटी दूध आने की चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन इस बार मामला सीधे पूरे शहर की सप्लाई तक पहुंच गया। लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में खराब या संदिग्ध दूध सप्लाई हुआ, तो गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया आखिर कहां थी।

क्या दूध की जांच केवल कागजों में हो रही है?

क्या सप्लाई से पहले सैंपल टेस्टिंग नहीं हुई?

और सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह दूध बच्चों और बीमार लोगों तक पहुंच गया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।


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