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नए सिस्टम में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना बना चुनौती, 80 फीसदी आवेदक टेस्ट में हो रहे फेल

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18 Jun 26
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नए सिस्टम में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना बना चुनौती, 80 फीसदी आवेदक टेस्ट में हो रहे फेल

के.डी. अब्बासी

कोटा। प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने के लिए लागू किए गए ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक अब आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। सेंसर और कैमरों से लैस इस नई व्यवस्था में लगभग 80 फीसदी आवेदक ड्राइविंग टेस्ट में असफल हो रहे हैं, जिसके चलते नए लाइसेंस आवेदनों की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

परिवहन विभाग द्वारा प्रदेशभर में स्थापित ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक का संचालन निजी एजेंसी के माध्यम से किया जा रहा है। ट्रैक पर लगे अत्याधुनिक सेंसर, कैमरे और सॉफ्टवेयर आवेदक के वाहन संचालन का मूल्यांकन करते हैं। पूरी प्रक्रिया लगभग मानव हस्तक्षेप से मुक्त है, जिससे किसी भी प्रकार की लापरवाही या त्रुटि सीधे सिस्टम में दर्ज हो जाती है।

जरा सी गलती और तुरंत फेल

ऑटोमेटेड ट्रैक पर वाहन का निर्धारित लाइन से बाहर जाना, ट्रैक को छूना, संतुलन बिगड़ना या तय नियमों का उल्लंघन करना तुरंत असफलता का कारण बन जाता है। पहले जहां कई आवेदक अभ्यास के आधार पर आसानी से परीक्षा पास कर लेते थे, वहीं अब सेंसर आधारित प्रणाली में छोटी-सी चूक भी भारी पड़ रही है।

बाइक और कार चालकों को अलग-अलग चुनौतियां

बाइक चालकों को आठ (8) आकार के ट्रैक पर बिना पैर जमीन पर लगाए संतुलन बनाए रखना पड़ता है, जो कई आवेदकों के लिए कठिन साबित हो रहा है। वहीं कार चालकों को रिवर्स पार्किंग, एच-ट्रैक, ढलान और निर्धारित सीमाओं के भीतर वाहन नियंत्रित करने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार कार चालक सबसे अधिक असफल हो रहे हैं, जबकि बाइक चालकों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

सड़क सुरक्षा के लिए लागू हुई व्यवस्था

परिवहन विभाग का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य केवल योग्य और दक्ष चालकों को ही ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना है। सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने और सुरक्षित यातायात व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए टेस्ट प्रक्रिया को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाया गया है।

आवेदकों की बढ़ी चिंता

लगातार बढ़ रही असफलता की दर ने लाइसेंस बनवाने वाले युवाओं और वाहन चालकों की चिंता बढ़ा दी है। कई आवेदकों का कहना है कि टेस्ट ट्रैक पर अभ्यास की पर्याप्त सुविधा नहीं होने और सेंसर आधारित सख्त मूल्यांकन के कारण लाइसेंस प्राप्त करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था सड़क सुरक्षा के लिहाज से बेहतर है, लेकिन इसके साथ-साथ आवेदकों को पर्याप्त प्रशिक्षण और अभ्यास की सुविधा उपलब्ध कराना भी जरूरी है, ताकि योग्य चालक अनावश्यक रूप से असफल न हों।


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