त्रेता युग में जन्में भगवान श्रीराम, विष्णु का सातवां अवतार और पुरुषोत्तम राम के रूप में सभी के आदर्श और पूजित हैं। हिंदुओं के प्रमुख पूज्य देवताओं में प्रभु राम के मंदिर तो हैं ही साथ ही चित्रकला, शिखालेख, मूर्ति कला और सिक्कों में इनका विराट और व्यापक स्वरूप दिखाई देता है। पुरातात्विक चिन्हों और प्रतीकों में भगवान राम के जीवन पर एक कृति का चतुर्थ संस्करण " कला एवं पुरातत्व में श्रीराम " हाल ही में प्रकाशित हुआ। इस शोध कृति को राजस्थान में झालावाड़ के इतिहासकार कुम्भा पुरस्कार प्राप्त ललित शर्मा ने बड़ी खोजबीन कर प्रामाणिक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर लिखा है।
यह कृति हाल ही में कुछ दिन पूर्व उनके पत्र के साथ प्राप्त हुई। दो दिन से इसे पढ़ रहा था तो कुछ अपनी बात लिखने का मन हुआ। कहते है किसी भी पुस्तक का आवरण पृष्ठ पुस्तक की जान होता है। पत्रकारिता में 50 फीसदी अंक इसी के होते हैं। आवरण इतना आकर्षक, प्रभावी और विषयानुरू है कि बस देखते रह जाएं। एक नजर में ही लाभ गया। पीले रंग की पृष्ठ भूमि में 19 वीं सदी के राम दरबार चित्रण में राम हनुमान का सेवक रूप में अंकन के साथ - साथ मुगलकालीन अकबर द्वारा जारी राम सीता की स्वर्ण मुद्रा, जो भारतीय संग्रहालय कोलकाता में है तथा राम की चतुर्भुजी की 12वीं सदी की विचित्र मूर्ति जो रानी की वाव, जिला अनहिल पाटन, गुजरात की है, तीनों का संयोजन चित्ताकर्षक है।
इस संस्करण का महत्व इसलिए है कि
कई नई जानकारियां इनमें जोड़ी गई हैं। जैसे कि हरियाणा प्रदेश में श्री राम की अनेक गुप्तकालीन मूर्तियां मिली हैं, छत्तीसगढ़ में श्री राम के अनेक शिल्प के अलावा उनके आदिवासी समूह के लोगो में राम के प्रति विश्वास , हाड़ौती में भडदेवरा, मानस गांव, चंद्रेसल सहित झालरापाटन के सूर्य मंदिर में मिली राम की परमार कालीन मूर्तियों का सम्यक कला विश्लेषण किया गया है। इसी क्रम में राम के प्राचीन सिक्कों पर भी नवीन जानकारी के सिक्के दूसरी सदी के है जिन पर राम का अंकन है और ये पंजाब, विदर्भ सहित विजयनगर, होयसल, चालुक्य जैसे प्राचीन राजवंश के हैं का परिचय पुस्तक में है। इसी प्रकार अयोध्या, तमिलनाडु, कर्नाटक और झालावाड़ के गंगधार से प्राप्त श्रीराम के प्राचीन शिलालेख पर एक अध्याय जोड़ा गया है ।
पुस्तक में किए गए शोध कार्य को आठ अध्यायों क्रमश: प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में श्रीराम, प्राचीन भारतीय मुद्राओं में श्रीराम, प्राचीन शिलालेखों में श्रीराम प्राचीन चित्रांकन परम्परा में श्रीराम, दक्षिण-पूर्व एशिया के शिल चित्रों में श्रीराम कथा, विश्वव्यापी लोकप्रियता में श्रीराम कथा, श्री रामयुगीन ऐतिहासिक स्थानावली एवं रहस्यमयी लीला में श्रीराम में लिपिबद्ध किया गया हैं।
इन अध्यायों में साहित्यिक कथानकों से हट कर पुरातात्विक साक्ष्यों तथा मृदपट्टिकाओं, शिखालेखों मूर्तियों, मुद्राओं और मंदिरों के साक्ष्यों के माध्यम से श्रीराम के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को वैज्ञानिक रूप को प्रस्तुत किया गया है। मध्य प्रदेश, हरियाणा और कौशाम्बी से प्राप्त पकी हुई ईंटों और मृदपट्टिकाओं (टेराकोटा) का विस्तृत विश्लेषण है, जो गुप्त काल से भी प्राचीन राम कथा के कला-शिल्प को दर्शाते हैं। रामायण के दृश्य, जैसे- रावण द्वारा भिक्षा मांगना और लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नासिका काटना, कैसे कला में उकेरे गए, इसका सुंदर विवरण है। भारत के बाहर समुद्र पार बसे देशों के प्राचीन मंदिरों में मौजूद राम कथा और शैल चित्रों को भी उजागर करती है, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार को दर्शाते हैं। प्राचीन मुद्राओं और शिलालेखों का उपयोग करके श्रीराम के अस्तित्व को तार्किक रूप से प्रमाणित किया गया है।
श्रीराम के जीवन के घटनाक्रम को भी कई साक्ष्यों का अध्ययन कर प्रामाणिक तिथियाँ लिखी गई हैं। भगवान राम के जीवन का तिथि क्रम इस प्रकार है-- श्रीराम जन्म - चैत्र शुक्ल-9, लक्ष्मण, शत्रुघ्न जन्म चैत्र शुक्ल-11, सीता का जन्म- बैसाख शुक्ल-9, सीता विवाह- पौष कृष्ण-7, राज्याभिषेक विघ्न-चैत्रशुक्ल-10, सीताहरण-माघ कृष्ण-8, हनुमान द्वारा लंका दहन-मार्गशीर्ष14, वानरसेना का श्रीराम के साथ समुद्रतट पर आगमन पौष शुक्ल 1 से 8, श्रीराम की विभिषण से भेंट पौष शुक्ल 9, सेतूबन्ध की पूर्णता-पौष शुक्ल-13, राक्षस वानर युद्ध आरम्भ माघ शुक्ल-2, श्रीराम रावण प्रथम युद्ध-माघ कृष्ण 2 से 4, कुम्भकरण वध माघ कृष्ण 14, इन्द्रजीत मेघनाद वध फागुन शुक्ल 8 से 13, लक्ष्मण शक्ति आधात चैत्र शुक्ल-9, श्रीराम रावण युद्ध (18 दिवस) चैत्र शुक्ल 12 से चैत्र कृष्ण 14, रावण वध-बैशाख कृष्ण 14 (कुल युद्ध दिवस 87) रावण दाह संस्कार- बैशाख कृष्ण 15, श्रीराम राज्याभिषेक-बैशाख शुक्ल-7, श्रीराम का साकेत धाम गमन-मार्गशीर्ष कृष्ण-12 है। श्रीराम के जीवन की ये प्रमुख तिथियां उनके जीवन की घटनाओं का सार समझने में सहायक हैं।
भगवान श्रीराम भारत वासियों में ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय हैं। विश्वव्यापी लोकप्रियता में श्रीराम अध्याय में लिखा है कि शोध ग्रंथों के माध्यम यह धारा पश्चिम में आगे बढ़ी। हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम शोधग्रन्थ इटली निवासी डॉ. रेसोटोरी का माना जाता है जिन्हें मानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन पर डॉक्टरेट की उपाधि मिली। दूसरा शोधग्रन्थ जे.एन. कापेण्टर का था थियोलॉजी ऑफ तुलसीदास' शीर्षक के तहत लन्दन विश्वविद्यालय में 1918ई. में प्रस्तुत किया था। इसी तरह श्रीराम कथा (रामायण) की विश्वव्यापी भूमिका प्रकाश में आ रही है और इसमें अनेक सांस्कृतिक, अध्यात्मिक एवं साहित्यिक धाराओं के साथ अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलनों की एक विराट धारा की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अन्तर्गत अब तक थाईलैण्ड, फिजी, मारीशस, सूरीनाम, ट्रिडीनाड व हॉलैण्ड आदि एक दर्जन से अधिक देशों में 16 से अधिक रामायण सम्मेलन हो चुके हैं।
पुस्तक की भूमिका में इन्दौर के प्रसिद्ध कला इतिहासकार नर्बदा प्रसाद उपाध्याय लिखते हैं, " मेरे अभिमत में यह छोटी सी कृति निश्चय ही एक विराट चिंतन का फलक पाठकों को उपलब्ध कराएगी जिसके आधार पर वे श्रीराम के समग्र परिप्रेक्ष्य से तो अवगत होंगे ही, इस तथ्य से भी अवगत होंगे कि वह कितना समर्थ चरित्र है जिसने भारतीय कला के विभिन्न अनुशासनों को अपनी परिधि में समाहित कर लिया और भारतीय कला के मानक के रूप में जिसने स्वयं को स्थापित किया।"यह भी लिखा, " इस क्रम में मैं यह कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिये कि अपनी भूमि के प्रति पूर्णतया समर्पित ललित शर्मा के कठोर और सतत् प्रयासों व निरन्तर लेखन के कारण ही 'जल दुर्ग गागरोन' को विश्व विरासत का दर्जा हासिल हो सका तथा उनके प्रयासों से इस दुर्ग पर भारतीय डाक टिकट भी जारी हुआ है। इनके लेखन प्रकाशन के ही कारण फिर 'राजर्षि संत पीपाजी' तथा 'गागरोन जलदुर्ग' को ऐतिहासिक और साहित्यिक रूप में पुष्ठता के साथ, कोटा विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी व स्नातक इतिहास के पाठ्यक्रमों में स्थान मिल पाया है।"
लेखक ललित गर्ग लेखकीय में लिखते हैं,
" प्रस्तुत कृति में पुरातत्व, इतिहास एवं कला के मूल स्त्रोतों, मृदपट्टिकाओं, कला चित्रों, मूर्तियों, मन्दिर स्थापत्य, शिलालेख व प्राचीन मुद्राओं तथा समुद्रपार बसे देशों के प्राचीन मन्दिरों की शिलाओं पर बने शिला चित्रों एवं वहाँ प्रसारित श्रीरामकथा के अनुशीलन द्वारा जनमानस के वंदनीय भगवान श्रीराम का श्रद्धाभाव से स्मरण किया गया है। इस मध्य समय गुजरता गया और आज बिजली के हाईमास्क लेम्पों ने ग्रामों के बाहर बरसों से निरन्तर पथवारी के पथप्रदर्शक ज्ञानदीप जलाने की सांस्कृतिक परम्परा को बिसरा दिया है, अतः ऐसी स्थिति में आज श्रीराम का स्मरण वह ज्ञान पुंज है जो सदियों से करोड़ों मानवों के मनदीपों को आलोकित किए हुए है। यह आलोक विराट भाव से प्रसारित हो इसी भावना से यह कृति उन सभी पाठकों के लिए हैं, जिन्हें श्रीराम के इस भारत देश में स्थित पुरातत्व, इतिहास, संस्कृति और कला से गहरा लगाव है, क्योंकि पुरातत्व और कला के विभिन्न प्राचीन स्त्रोतों द्वारा ही इसमें श्रीराम की महत्ता वैज्ञानिक अनुशीलन से समादृत की गई है।"
पुस्तक की मुख्य विशेषता है कि सभी अध्यायों में वर्णन के साथ उनके दुर्लभ चित्र भी दिए गए हैं जो राम के विश्व वैभव को कला और पुरातत्व की खोज के माध्यम से लिखा गया है। ऐसे पांच दर्जन से अधिक चित्र देश के विभिन्न संग्रहालयों, निजी संग्रहों और मंदिरों आदि से लिए गए हैं। इनके कालक्रम से लेखन आगे बढ़ता हैं। पुस्तक पश्चिमी भारत की वैष्णव रामानंदी परम्परा के महान उदगायक एवं गागरोन दुर्ग के अधिपति राजर्षी संत पीपा जी महाराज को समर्पित की गई है। एक पृथक पृष्ठ पर सहयोगियों की सूची दे कर आभार प्रकट किया है। अंत में उन सब संदर्भों को उल्लेखित किया गया हैं जो इस पुस्तक लेखन का आधार बने।