उदयपुर। देश के लिए मेडल जीतने का सपना देख रहे 11 वर्षीय बच्चे की सांसें जब अचानक उसका साथ छोड़ने लगें, तो यह महज एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सुनहरे भविष्य के टूटने जैसा होता है। इस मुश्किल घड़ी में पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) के चेस्ट एवं रेस्पिरेटरी विभाग के चिकित्सकों ने फरिश्ता बनकर न सिर्फ इस बच्चे की जान बचाई, बल्कि देश के एक उभरते हुए राष्ट्रीय जूडो खिलाड़ी के सपनों को फिर से उड़ान भरने का हौसला दे दिया।
बॉसवाड़ा निवासी यह 12 वर्षीय बच्चा पिछले डेढ़ साल से हर दिन एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा था, जिसका दुश्मन सामने था ही नहीं। उसे फेफड़ों की गंभीर बीमारी थी, लेकिन विभिन्न अस्पतालों में उसे कभी टीबी,निमोनिया तो कभी फंगल इन्फेक्शन समझकर दवाइयां दी जा रही थीं। लंबा इलाज चलने के बावजूद न तो उसका दर्द कम हो रहा था और न ही उसके दोबारा जूडो मैट पर लौटने की कोई उम्मीद नजर आ रही थी।
सांसों की इस टूटती डोर के साथ परिवार पीएमसीएच के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अतुल लुहाड़िया के पास पहुंचा। डॉ. लुहाड़िया ने नए सिरे से रेडियोलॉजिकल जांचें कराईं तो पता चला कि बच्चे के फेफड़ों में न तो टीबी थी और न ही फंगल इन्फेक्शन, बल्कि वहां पल्मोनरी हाइडेटिड सिस्ट अपनी जगह बना चुकी थी। चूंकि मरीज एक राष्ट्रीय स्तर का जूडो खिलाड़ी है, इसलिए डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उसकी शारीरिक क्षमता और खेल जीवन पर इस सर्जरी का कोई बुरा असर न पड़े। ट्रेडिशनल ओपन सर्जरी में छाती पर बड़ा चीरा लगाना पड़ता है, जिससे मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। ऐसे में डॉ. लुहाडिया ने सीवीटीएस सर्जन डॉ. अनुज मेहता की सलाह ली एवं मरीज का अत्याधुनिक यूनिपोर्टल वीडियो-असिस्टेड थोराकोस्कोपिक सर्जरी तकनीक का इस्तेमाल कर ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।
डॉ. मेहता ने मात्र 4 सेंटीमीटर का एक छोटा सा चीरा लगाकर फेफड़े से उस खतरनाक सिस्ट को सुरक्षित बाहर निकाला और कैपिटोनेज प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस तकनीक का फायदा यह हुआ कि बच्चे की छाती की मांसपेशियों को नुकसान नहीं पहुंचा, दर्द बेहद कम रहा और खून का रिसाव भी न के बराबर हुआ।
सीवीटीएस सर्जन डॉ. अनुज मेहता ने बताया कि यह सर्जरी जितनी बारीक थी, उतनी ही खतरनाक भी। कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. समीर गोयल के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि सिस्ट के अंदर का तरल पदार्थ (फ्लूइड) दूसरे फेफड़े में न फैले। अगर ऐसा होता, तो बच्चे की जान को गंभीर खतरा हो सकता था। डॉ. गोयल ने बच्चों में बेहद जटिल माने जाने वाले वन लंग वेंटिलेशन (एक फेफड़े को सुरक्षित रखते हुए वेंटिलेशन देना) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। डबल-ल्यूमेन एंडोट्रेकियल ट्यूब की मदद से उन्होंने दूसरे फेफड़े को पूरी तरह सुरक्षित रखा और ऑपरेशन टेबल पर ही बच्चे को एक्सट्यूबेट भी कर दिया।
इस सफल उपचार में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अतुल लुहाड़िया, सीवीटीएस सर्जन डॉ. अनुज मेहता, कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. समीर गोयल,डॉ.तिथि, डॉ. निश्चय, डॉ. आमिर, डॉ. रितेश, डॉ. सुप्रिया,डॉ. अभय के साथ ही पीडियाट्रिक आईसीयू से डॉ. पुनीत जैन एवं ओटी स्टाफ कुलदीप, ललित, संजय और परमेश्वर की टीम का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
इस सफलता पर पीएमसीएच के चेयरमेन राहुल अग्रवाल ने कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य हर मरीज को विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं और सटीक निदान उपलब्ध कराना है। इस होनहार बच्चे की कहानी हमारे चिकित्सकों की विशेषज्ञता, तकनीकी कौशल और टीम वर्क का जीवंत उदाहरण है। हमें गर्व है कि पीएमसीएच की इस उन्नत चिकित्सा प्रणाली के कारण यह बच्चा न केवल एक गंभीर बीमारी से मुक्त हुआ है, बल्कि देश के लिए मेडल जीतने के अपने सपने को पूरा करने के लिए फिर से मैदान में उतरने को तैयार है। पूरे पेसिफिक परिवार की ओर से इस बच्चे के उज्ज्वल और स्वस्थ भविष्य के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ है एवं उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है।
क्या होती है पल्मोनरी हाइडेटिड सिस्ट:-
पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अतुल लुहाड़िया ने बताया कि पल्मोनरी हाइडेटिड सिस्ट एक परजीवी से होने वाली बीमारी है, जो इकिनोकोकस नामक टेपवर्म के कारण होती है। यह संक्रमण आमतौर पर कुत्तों, भेड़, बकरी एवं अन्य पशुओं के माध्यम से फैलता है। संक्रमित जानवर के मल से दूषित भोजन, पानी या हाथों के जरिए इसके अंडे मनुष्य के शरीर में पहुंच सकते हैं। शरीर में प्रवेश करने के बाद ये अंडे विभिन्न अंगों में सिस्ट (पानी भरी थैली) बना सकते हैं। लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामलों में यह सिस्ट लीवर (यकृत) में पाई जाती है, जबकि 20 से 30 प्रतिशत मामलों में फेफड़ों में विकसित होती है। फेफड़ों में सिस्ट होने पर मरीज को लगातार खांसी, सीने में दर्द, सांस फूलना तथा खून की खांसी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय पर पहचान और उचित उपचार से इस बीमारी का सफल इलाज संभव है।