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लिम्का बुक रिकॉर्डधारी 'अपना संगठन' रचेगा इतिहास: 23,000 दीपकों से चांद पर उतरेंगे भगवान झूलेलाल

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19 Mar 26
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लिम्का बुक रिकॉर्डधारी 'अपना संगठन' रचेगा इतिहास: 23,000 दीपकों से चांद पर उतरेंगे भगवान झूलेलाल

उदयपुर। झीलों की नगरी में सिंधी समाज के सबसे बड़े पर्व चेटीचंड की पदचाप सुनाई देने लगी है। भक्ति, आस्था और कला के संगम के साथ इस बार उदयपुर एक ऐसे विहंगम दृश्य का गवाह बनने जा रहा है, जिसे देख कर आंखें खुलीं रह जाएंगी। अपनी रचनात्मकता के लिए मशहूर और तीन बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा चुके शहर के प्रतिष्ठित 'अपना संगठन' ने इस साल भक्ति का ऐसी "झांकी' तैयार किया है जो पूरे राजस्थान में चर्चा का विषय बना हुआ है।
वरुण अवतार: 600 स्क्वायर फीट की विशाल झांकी
संगठन के अध्यक्ष सुरेंद्र अरोड़ा ने बताया कि पिछले 25 वर्षों से 'अपना संगठन' चेटीचंड पर कुछ ऐसा करता आया है जो शहरवासियों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केंद्र रहता है। इस वर्ष 600 स्क्वायर फीट के विशाल आकार में भगवान श्री झूलेलाल साईं की मनमोहक झांकी सजाई जाएगी। इस झांकी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें भगवान झूलेलाल जी झिलमिलाते तारों के बीच 'चांद' पर विराजित नजर आएंगे। ऐसा लगेगा मानो स्वर्ग की आभा सीधे उदयपुर की धरा पर उतर आई हो।
          संगठन अध्यक्ष सुरेंद्र अरोड़ा ने बताया कि इस भव्य मास्टरपीस को तैयार करने के लिए संगठन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। खास बात यह है कि इस बार केवल संगठन के कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सदस्य—बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी इस सेवा कार्य में पूरी तन्मयता से जुड़ गए हैं। * 23,000 दीपकों का महासंगम: मिट्टी के कुल 23,000 दीपकों  को भक्ति के रंगों में रंगा जा रहा है। संगठन के सदस्यों के साथ परिवार ने भी इस कार्य को अपना बना लिया है। कोई दीपकों को साफ कर रहा है, तो कोई ब्रश और आकर्षक रंगों से भगवान के मुकुट, चंद्र और उनकी वेशभूषा (ड्रेस) को जीवंत करने में जुटा है।
मेहनत और लगन: यह सामूहिक श्रमदान इस बात का प्रतीक है कि यह आयोजन केवल एक संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज और परिवारों के आपसी जुड़ाव का उत्सव बन गया है।
             संगठन के प्रवक्ता वीरेंद्र खबरानी ने उदयपुर के सभी धर्मप्रेमियों को इस भव्य उत्सव का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है।20 मार्च, शुक्रवार (चेटीचंड पर्व)शक्तिनगर स्थित सनातन धर्म मंदिर, शाम 7:30 बजे से मध्यरात्रि 12:00 बजे तक सिंधी समाज की इस समृद्ध परंपरा और 'अपना संगठन' की इस अद्भुत मेहनत को निहारने के लिए सपरिवार पधारें। आस्था, पारिवारिक स्नेह और आधुनिक कला का यह मेल निश्चित रूप से आपके दिल को छू लेगा।


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