उदयपुर। लोकतंत्र के सैनानियों का गुरूवार को उदयपुर में सम्मान किया जायेगा। इसी कड़ी मंे लोकतंत्र सैनानी दलपतसिंह दोशी ने बताया कि 8 अगस्त 1975 की शाम लगभग 7 बजे मैं अपने टाइपिंग सेंटर, सूरजपोल रोड, उदयपुर पर मौजूद नहीं था। मेरी अनुपस्थिति में एक सिपाही आया और मेरे बहनोई से दुकान बंद करवाकर चाबी ले गया। मुझे थाने बुलाया गया, जहां सूरजपोल थाने के सी. आई. महेश चंद्र ने मुझसे संघ से संबंध और काम के बारे में पूछा। मैंने स्पष्ट किया कि मैं टाइपिस्ट हूं और हर पार्टी का कार्य करता हूं ।
दलपतसिंह दोशी ने बताया कि रात 12 बजकर 45 मिनट पर मुझे घंटाघर थाने ले जाया गया, जहां से थानेदार मुझे मेरे घर तलाशी के लिए ले गए। सुबह 4 बजे तक तलाशी हुई, कुछ नहीं मिला। फिर से मुझे सूरजपोल थाने लाया गया, रात वहीं एक खाट पर बिताई। अगले दिन मेरे बहनोई मिलने आए, लेकिन मिलने नहीं दिया गया। सीआईडी ने उन्हें धमकी दी व पैसों की मांग की ।
10 अगस्त को मेरी गिरफ्तारी दर्ज की गई। मुझ पर क्रिमिनल केस दर्ज किया गया जिसमें धारा 33(3), 33(5), 17(5) डीआईआर लगाई गईं। आरोप था कि मैंने “चिंगारी” नामक प्रतिबंधित पत्र साइक्लोस्टाइल मशीन से छापा और वितरित किया। पुलिस ने मेरी दुकान की तलाशी ली, लेकिन कुछ नहीं मिला। मेरी मशीनें जब्त कर ली गईं। थाने में मुझसे जबरन कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और मेरी घड़ी, चांदी की अंगूठी व पैसे भी ले लिए, जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं
रखा गया।
11 अगस्त को मुझे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मेरे इंकार के बावजूद, विचाराधीन बताते हुए केंद्रीय कारागृह भेज दिया गया। जेल अधीक्षक अंसारी का व्यवहार खराब था। मुझे अपराधियों के साथ बैरक नं. 2 में रखा गया। खाना बेहद खराब और अपमानजनक था, सड़े चने, जली रोटियां। गंदे शौचालयों के बीच रहना पड़ा। इन हालातों से तंग आकर हमने भूख हड़ताल की। बाद में हमें बालबंदी गृह में खुले में रखा गया। वहां हम खुद खाना बनाते, शाखा लगाते, गीता- रामायण पढ़ते और प्रार्थना करते। रक्षाबंधन पर मेरी बहन मिलने आई, लेकिन जेलर ने मिलने नहीं दिया। मेरे वकील अक्षय सिंह देवपुरा ने केस लड़ा और साबित किया कि पूरा मामला झूठा था। 1 नवंबर 1975 को मैं न्यायालय से दोषमुक्त होकर रिहा हुआ ।