बांसवाड़ा :   श्रीमद्भगवद्गीता  संसार में अध्यात्म विषयक श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ गीता के समान और कोई नहीं है गीता पर जितनी टीकाएँ, भाष्य और अनुवाद नाना प्रकार की भाषाओं और लिपियों में मिलते हैं उतने दूसरे किसी धार्मिक ग्रन्थ पर नहीं मिलते । 

गीताप्रेस, गोरखपुर में ही संस्कृत, हिंदी, गुजराती, बँगला, मराठी, उर्दू, अरबी, फारसी, गुरुमुखी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी आदि अनेक भाषाओं और लिपियों में मूल तथा भाषा टीका मिलाकर ९०० से अधिक गीताओं का संग्रह है । 

गीता की महिमा जो पद्मपुराण में मिलती है उसे देखने पर मालूम होता है कि गीता के सदृश महिमा दूसरे किसी ग्रन्थ की नहीं 

गीता की महिमा महाभारत में स्वयं वेदव्यास जी ने भी कही है 

यह कहना है आचार्य विश्व आत्मा दास प्रभु का।

वो भारत माता मन्दिर प्रांगण में गीता वितरण समारोह में जनजाति परिक्षेत्र बांसवाड़ा जिले के भक्तों को सम्बोधित कर रहे थे।

 

इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान सत्संग संकीर्तन भजन ओर विभिन्न अनुष्ठान करने में साधिका श्रीमति रचना व्यास ने 

कहा कि 

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः 

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनिःसृता 

       

गीता का ही अच्छी प्रकार से गान-श्रवण, कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण करना चाहिये। अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवान् के साक्षात् मुख कमल से निकली हुई है ।

 

सर्व शास्त्र मयी गीता सर्व देवमयो हरिः ।

 

सर्वतीर्थ मयी गंगा सर्व वेदमयो मनुः ।। 

        

 

जैसे मनु जी सर्व वेदमय हैं गंगा सकल तीर्थ मयी है और श्री हरि सर्वदेवमय हैं इसी प्रकार गीता सर्व शास्त्र मयी है । 

 

भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च  

सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् 

         

 

महाभारतरूपी अमृत के सर्वस्व गीता को मथकर और उसमें से सार निकालकर भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन के मुख में उसका हवन किया है ।

 

गीता सारे उपनिषदों का सार है । शास्त्र में बतलाया है :- 

 

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । 

पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् 

 

सम्पूर्ण उपनिषद् गायें हैं, गोपालनन्दन श्री कृष्ण उनको दुहने वाले ( ग्वाला ) हैं, अर्जुन बछड़ा हैं और गीता प्रेमी सात्त्विक बुद्धियुक्त भगवत्जन उनसे निकले हुए महान् गीतामृतरूपी दूध का पान करने वाले हैं ।

 

सम्पूर्ण शास्त्रों में गीता को सर्वोपरि माना गया है । कहा है कि 

 

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीत-मेको देवो देवकीपुत्र एव 

एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा 

 

श्री देवकीनन्दन श्री कृष्ण का कहा हुआ गीता ग्रन्थ ही एक सर्वोपरि शास्त्र है 

 

श्री कृष्ण ही एकमात्र सर्वोपरि देव हैं, उनके जो नाम हैं, वे ही सर्वोपरि मन्त्र हैं और उन परमदेव की सेवा ही एकमात्र सर्वोपरि कर्म है ।

 

गीता गंगा से भी बढ़कर है । गंगा में स्नान करने का तो अधिक-से-अधिक फल स्नान करने वाले की मुक्ति बताया गया है अतः गंगा में स्नान करने वाला तो स्वयं ही मुक्त हो सकता है वह दूसरों को मुक्त नहीं कर सकता 

 

 किंतु गीता रूपी गंगा में स्नान करने वाला तो स्वयं मुक्त होता है और दूसरों को भी मुक्त कर सकता है 

 

गीता की भाषा भी मधुर, सरल, अर्थ और भावयुक्त है अत एव सभी माता-बहिनों और भाइयों को प्रतिदिन कम-से-कम एक अध्याय का पाठ तो अर्थ और भाव समझते हुए अवश्य करना ही चाहिये 

समारोह को रतन,सुरेश,नैमिष, निखिल, नीरज पाठक, कृपाली भट्ट, कुशल, डिम्पल ,सुनील, किशोर पंड्या, अरुण व्यास, ओड्रिला, शिल्पा हिमानी पाठक ,अचिंत्य दृष्टि सहित कई साधक साधिकाओं श्रद्धालुओं ने संकीर्तन समागम में भाग लिया

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