उदयपुर का शैक्षणिक वातावरण उस क्षण में गर्व से भर उठा, जब राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय का 21वां दीक्षांत समारोह महाराणा प्रताप खेल मैदान, प्रतापनगर में अत्यंत भव्यता और गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। ज्ञान, संस्कृति और भारतीय मूल्यों की इस अनूठी संगम स्थली पर शिक्षा का वास्तविक अर्थ — संस्कार, जिम्मेदारी और सेवा के रूप में उभरा।


कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण और मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मुख्य अतिथि एनसीटीई, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. पंकज अरोड़ा, कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत, अतिथि प्रो. प्रतापसिंह चौहान, प्रो. कैलाश सोडाणी, कुल प्रमुख एवं कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर सहित अन्य गणमान्य विद्वानों की उपस्थिति ने समारोह को गरिमा प्रदान की।


छह हजार विद्यार्थियों की उपस्थिति में वह पल ऐतिहासिक बन गया जब प्रो. पंकज अरोड़ा को डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया गया। साथ ही 120 पीएच.डी. उपाधियाँ और 48 स्वर्ण पदक प्रदान किए गए, जिनमें से 80 उपाधियाँ और 34 पदक बेटियों के नाम रहे — यह नारी सशक्तिकरण और शिक्षा में उनके बढ़ते नेतृत्व का प्रतीक बना।

अपने प्रेरक उद्बोधन में प्रो. अरोड़ा ने कहा —

“भारत को अब नौकरी खोजने वालों की नहीं, बल्कि अवसर सृजन करने वाले युवाओं की आवश्यकता है। चरित्र, नवाचार और समाज सेवा — यही तीन संकल्प जीवन को सार्थक बनाते हैं।”

उन्होंने युवाओं से ‘टेक्नोलॉजी ऑफ भारत’ की भावना से कार्य करने का आह्वान किया, ताकि तकनीक और संवेदना का संतुलन गाँवों और समाज के हर कोने तक पहुँचे।

“जब तकनीक में मानवीय मूल्य जुड़ते हैं, तभी वह कल्याणकारी बनती है,” उन्होंने कहा।

नई शिक्षा नीति 2020 की चर्चा करते हुए उन्होंने विद्यापीठ को उसका जीवंत उदाहरण बताया —

“यहाँ की शिक्षा प्रणाली न केवल समग्र और बहुविषयक है, बल्कि भारतीय भाषाओं, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी है।”

कुलपति प्रो. सारंगदेवोत ने अपने प्रेरक शब्दों में कहा —

“दीक्षांत केवल प्रमाणपत्र का उत्सव नहीं, बल्कि गुरु के आशीर्वाद और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का प्रतीक है। यह वह क्षण है जब ज्ञान संस्कार में परिवर्तित होता है।”

उन्होंने नवदीक्षित स्नातकों से सत्य, सेवा और संयम को जीवन के तीन स्तंभ मानने और अपने संकल्पों से समाज को श्रेष्ठ बनाने का आग्रह किया।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति में कर्तव्यबोध, आत्मशक्ति और जमीनी जुड़ाव का विकास करे।

“शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्ति नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाना है। विद्यापीठ इसी सोच का प्रतीक है, जहाँ छात्र न केवल विद्वान बनते हैं, बल्कि सजग नागरिक के रूप में समाज की उन्नति में योगदान देते हैं।”

उन्होंने कहा कि विद्यापीठ के विद्यार्थी जहाँ भी जाएं, वहाँ अपने आचरण और कार्यों से भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों की पहचान बनाएं। उन्होंने प्रो. पंकज अरोड़ा को डी.लिट. उपाधि से सम्मानित किए जाने पर हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है कि उसे ऐसे शिक्षाविदों का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

विशिष्ट अतिथि प्रो. प्रतापसिंह चौहान और प्रो. कैलाश सोडाणी ने भी युवाओं को श्रम, कौशल और साइबर जागरूकता के साथ स्वदेशी चिंतन अपनाने की प्रेरणा दी।

समारोह का संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया, जबकि कार्यक्रम में शहर के अनेक शिक्षाविद, विद्या प्रचारिणी सभा, भूपाल नोबल्स संस्थान के प्रतिनिधि एवं विद्यापीठ परिवार के सदस्य उपस्थित रहे।

यह दीक्षांत केवल उपाधियों का नहीं, बल्कि शिक्षा के उस सतत प्रवाह का उत्सव था जो विद्यापीठ को राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक प्रेरणा स्रोत बनाता है —
जहाँ ज्ञान संस्कार बनता है, और शिक्षा सेवा का माध्यम। ✨

 

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