कभी संवाद सभ्यता की पहचान हुआ करता था।विचार टकराते थे, बहस होती थी, मतभेद उभरते थे और वहीं से समझ का जन्म होता था। आज दृश्य उलट है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ बोलना सहज है पर सुनना असहज। जहाँ सहमति आराम देती है और असहमति बेचैन करती है। जहाँ प्रश्न को विद्रोह और चुप्पी को शालीनता समझ लिया गया है। चारों ओर आवाज़ें हैं - तेज़, लगातार, आत्मविश्वास से भरी। पर ये आवाज़ें किसी दूसरे तक पहुँचती नहीं। बस लौट आती हैं अपनी ही गूँज बनकर। यह कोई संयोग नहीं बल्कि हमारी सामूहिक मानसिक अवस्था है। एक ऐसा अदृश्य घेरा, जहाँ विचार आगे नहीं बढ़ते केवल प्रतिध्वनित होते हैं। इसी घेरे का नाम है-इको चैंबर।
इको चैंबर कोई दीवारों से घिरा स्थान नहीं बल्कि सोच का बंद कमरा है। यहाँ व्यक्ति, समूह और सत्ता केवल उन्हीं विचारों से घिरे रहते हैं जो उनकी पहले से बनी धारणाओं को सहलाते हों। जो प्रश्न करता है वह असुविधा पैदा करता है। जो असहमत होता है वह संदेह के घेरे में आ जाता है। बाहर की हवा भीतर आने से पहले ही रोक दी जाती है और भीतर वही विचार घूमते रहते हैं-बिना परखे, बिना परिपक्व हुए।
यानि स्वमत-प्रतिध्वनि का कक्ष है जहाँ अपनी ही आवाज़ लौट-लौटकर सुनाई देती है। टकराव नहीं होता इसलिए परिष्कार भी नहीं होता।
डिजिटल युग ने इस बंद कमरे को सुविधाजनक और आकर्षक बना दिया है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हमारी पसंद-नापसंद पहचानकर वही सामग्री परोसते हैं जो हमें प्रिय हो। हम जिनसे सहमत होते हैं वही हमारी दुनिया बन जाते हैं। जिनसे असहमत होते हैं वे ‘अनफ़ॉलो’ या ‘ब्लॉक’ कर दिए जाते हैं।
धीरे-धीरे हमारी दृष्टि एक रंग में रंग जाती है। हमें लगने लगता है कि जो मैं देख रहा हूँ वही संपूर्ण सत्य है। यही भ्रम सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि यह हमें प्रश्नविहीन बना देता है।
मनोविज्ञान बताता है कि मन सुविधा का पक्षधर होता है। कन्फर्मेशन बायस के कारण हम वही तथ्य चुनते हैं जो हमारी राय को मज़बूत करें। समान सोच वाले लोगों के बीच रहकर विचार और कठोर हो जाते हैं। इसे ग्रुप पोलराइजेशन कहा जाता है। अलग दृष्टिकोण समझने में मानसिक श्रम लगता है। इसलिए हम उससे बचते हैं। यह बचाव धीरे-धीरे आलोचनात्मक विवेक को कुंद कर देता है। विचार जब कठोर होते हैं तो संवेदना सबसे पहले मर जाती है।
आज की राजनीति इको चैंबर का सबसे मुखर मंच बन चुकी है। एक विचारधारा का समर्थक केवल उसी धारा की खबरें पढ़ता और साझा करता है। दूसरी ओर की बात उसे बिना सुने ही “गलत”, “खतरनाक” या “देश-विरोधी” लगने लगती है। तर्क की जगह नारे और संवाद की जगह विवाद ले लेते हैं।
समाज पुल बनाने के बजाय दीवारें खड़ी करने लगता है वो भी ऊँची-मोटी और आत्मसंतोष से भरी। मतभेद शत्रुता में बदल जाते हैं और असहमति पहचान की लड़ाई बन जाती है।
सत्ता जब केवल प्रशंसा सुनने लगे तब वह ज़मीनी सच्चाइयों से कट जाती है। आलोचना ‘नकारात्मकता’ कहलाने लगती है और प्रश्न ‘अवरोध’। योजनाएँ काग़ज़ पर चमकती हैं, पर जीवन में धुंधली रह जाती हैं। इको चैंबर सत्ता को आराम देता है पर समाज को कमज़ोर बना देता है।
यह समस्या राजनीति तक सीमित नहीं। कॉरपोरेट और संस्थागत जगत में भी इसका असर गहरा है। जब नेतृत्व के चारों ओर केवल ‘हाँ’ कहने वाले लोग रह जाते हैं। तब चेतावनी देने वाली आवाज़ें दब जाती हैं। नवाचार रुकता है,आत्मसंतोष फलता-फूलता है। इतिहास गवाह है कि कई बड़ी असफलताओं की जड़ में यही वैचारिक बंदिश रही है। व्यक्ति के स्तर पर इसका आघात और भी गहरा है। इको चैंबर में बंद व्यक्ति स्वयं को सर्वज्ञ समझने लगता है। सुनने की क्षमता घटती है, सहिष्णुता सिकुड़ती है। परिवारों में मतभेद तीखे हो जाते हैं, दोस्ती में शर्तें जुड़ जाती हैं। संवाद टूटता है और संबंधों में खामोशी भर जाती है।
उन्नीसवीं सदी के महान दार्शनिक जॉन स्तुर्ट मिल ने बहुत पहले चेताया था कि “जो व्यक्ति केवल अपनी ही राय जानता है वह अपनी राय को भी ठीक से नहीं जानता।”
यह वाक्य आज के समय का आईना है। बिना विरोधी विचारों के हमारी सोच अधूरी और कमज़ोर रह जाती है।
कहा जाता है कि इको चैंबर अपनापन देता है, मानसिक सुरक्षा देता है। यह सच है पर क्षणिक। यह सुरक्षा बंद कमरे की गर्माहट जैसी है जो थोड़ी देर में घुटन बन जाती है। दीर्घकाल में इसके परिणाम गंभीर हैं- आलोचनात्मक विवेक का क्षरण, पूर्वाग्रहों का सुदृढ़ीकरण, सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संवाद का क्षय।
इस बंद कमरे से बाहर निकलना आसान नहीं पर जरूरी है। इसके लिए साहस चाहिए।सुनने का साहस, सहने का साहस और अपने ही विचारों पर प्रश्न करने का साहस।असहमति को शत्रु नहीं, शिक्षक मानना होगा। मीडिया को विविध दृष्टिकोणों का मंच बनना होगा। शिक्षा को उत्तर नहीं, प्रश्न सिखाने होंगे। और व्यक्ति को सबसे पहले सुनना सीखना होगा।
भारतीय परंपरा का सूत्र है— “वादे वादे जायते तत्त्वबोधः”। संवाद और विमर्श से ही सत्य का बोध होता है। यदि हम केवल अपनी ही गूँज सुनते रहेंगे, तो सत्य नहीं सिर्फ़ शोर पैदा होगा।
इको चैंबर से बाहर आना आज का सबसे बड़ा बौद्धिक संघर्ष है। यह संघर्ष केवल विचारों का नहीं समाज की आत्मा को बचाने का है। सुनने की पुनः आदत ही शायद वह पहला कदम है। जिससे विचार फिर से जीवित हो सकें और गूँज से आगे, अर्थ तक पहुँच सकें।
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जब समाज सुनना भूल जाए
- लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
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