राजस्थान की पहचान लंबे समय तक रेगिस्तान, कम वर्षा और जल संकट वाले प्रदेश के रूप में रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जल संरक्षण, सिंचाई परियोजनाओं, वनीकरण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए प्रयासों ने राजस्थान की तस्वीर बदलने का काम किया है। आज प्रदेश का बड़ा हिस्सा हरियाली की ओर बढ़ रहा है। यही कारण है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी पूरा राजस्थान मानसून की प्रतीक्षा कर रहा है। किसानों से लेकर शहरों के निवासियों तक, सभी की निगाहें आसमान पर टिकी हैं।राजस्थान की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार कृषि और पशुपालन है। प्रदेश के लाखों किसान खरीफ फसलों की बुवाई मानसूनी वर्षा पर निर्भर होकर करते हैं। बाजरा, मूंग, उड़द, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी फसलों की सफलता समय पर और पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती है। ऐसे में मानसून का आगमन केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार भी माना जाता है।इस वर्ष भी भारतीय मौसम विभाग ने राजस्थान में सामान्य से बेहतर मानसून की संभावना जताई है। हालांकि प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समान नहीं रहता। दक्षिणी राजस्थान, हाड़ौती और पूर्वी जिलों में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर जैसे क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा कम रहती है। फिर भी मानसून की पहली फुहार पूरे प्रदेश में उत्साह का वातावरण बना देती है।
राजस्थान सरकार ने पिछले वर्षों में जल संरक्षण के लिए अनेक महत्वपूर्ण योजनाएँ लागू की हैं। मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान, अमृत सरोवर, तालाबों और बांधों के पुनर्जीवन तथा नदियों को जोड़ने जैसी पहलों से जल संचयन क्षमता में वृद्धि हुई है। पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) और विभिन्न सिंचाई योजनाएँ भी प्रदेश की कृषि क्षमता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन प्रयासों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब मानसून भरपूर वर्षा प्रदान करेगा।प्रदेश में इस समय खरीफ सीजन की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही हैं। कृषि विभाग किसानों को उन्नत बीज, वैज्ञानिक खेती और जल संरक्षण तकनीकों के प्रति जागरूक कर रहा है। किसान भी खेतों की जुताई और बुवाई की तैयारी में जुटे हुए हैं। मानसून के समय पर आने से कृषि उत्पादन बढ़ेगा, ग्रामीण रोजगार में वृद्धि होगी और किसानों की आय में सुधार होगा।
शहरी क्षेत्रों के लिए भी मानसून का विशेष महत्व है। जयपुर, जोधपुर, अजमेर, कोटा और उदयपुर जैसे शहरों में पेयजल की उपलब्धता काफी हद तक वर्षा पर निर्भर रहती है। बांधों, जलाशयों और भूजल स्रोतों का पुनर्भरण मानसून के दौरान ही होता है। यदि अच्छी वर्षा होती है तो पूरे वर्ष जल संकट की आशंका कम हो जाती है। साथ ही गर्मी से राहत मिलने के कारण जनजीवन भी सामान्य होता है।
पर्यावरण की दृष्टि से भी मानसून राजस्थान के लिए जीवनदायी है। अरावली क्षेत्र, वन क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में हरियाली बढ़ती है। वन्यजीवों के लिए जल और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे "हरियालो राजस्थान" जैसे अभियान भी वर्षा के मौसम में अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं। लाखों पौधों के रोपण और उनके संरक्षण के लिए पर्याप्त वर्षा आवश्यक है।
हालांकि मानसून के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी रहती हैं। कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है तो कहीं कम वर्षा सूखे की चिंता पैदा कर देती है। इसलिए केवल वर्षा पर निर्भर रहने के बजाय जल प्रबंधन और संरक्षण की दीर्घकालिक रणनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल के विवेकपूर्ण उपयोग को जन आंदोलन का स्वरूप देना समय की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, हरियाली की नई पहचान बना रहे राजस्थान के लिए मानसून केवल मौसम नहीं बल्कि विकास, समृद्धि और खुशहाली का आधार है। किसानों की उम्मीदें, जलाशयों की प्यास, पर्यावरण की जरूरत और अर्थव्यवस्था की गति—सब कुछ मानसून से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पूरा राजस्थान एक बार फिर बादलों की दस्तक का इंतजार कर रहा है, ताकि धरती पर हरियाली और जनजीवन में खुशहाली का नया अध्याय लिखा जा सके।
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हरियालो राजस्थान को मानसून का इंतजार
गोपेन्द्र नाथ भट्ट
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