ऑस्ट्रेलिया इंडिया वॉटर सेंटर की अंतरराष्ट्रीय वेबिनार एआईडब्ल्यूसी वॉटर टॉक्स में डॉ. अनिल मेहता ने बताया जल-सुरक्षा, जल स्थायित्व का नया रास्ता मध्यम आकार के शहरों में जल संकट का समाधान पूरे जल-चक्र की सार-संभाल में : अनिल मेहता उदयपुर के जल-तंत्र, आयड नदी, भूजल, उभरते प्रदूषकों और जल-संस्कृति पर चर्चा ऑस्ट्रेलिया में घरेलू पेयजल टंकियां में पीएफएएस और धातु प्रदूषण पर डॉ. इयान राइट ने रखे शोध निष्कर्ष उदयपुर, भारत के मध्यम आकार के शहर आज एक नए जल विरोधाभास के सामने खड़े हैं—कभी कम बारिश और सूखा, कभी कम समय में अत्यधिक बारिश और बाढ़, और इनके बीच लगातार गिरती जल गुणवत्ता।
इसका समाधान केवल बांध, पाइपलाइन, नाले और उपचार संयंत्र बनाने में नहीं, बल्कि पूरे जल-चक्र और जल-तंत्र की सार-संभाल में है। जलग्रहण क्षेत्र, पहाड़ियां, नदियां, झीलें, आर्द्रभूमियां, भूजल, शहरी नियोजन, अपशिष्ट जल और समुदाय—इन सभी को एक साथ देखने की आवश्यकता है।
यह विचार विद्या भवन पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्राचार्य तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के सदस्य डॉ. अनिल मेहता ने ऑस्ट्रेलिया इंडिया वॉटर सेंटर (एआईडब्ल्यूसी) की अंतरराष्ट्रीय ‘वॉटर टॉक्स’ वेबिनार सीरीज़ में व्यक्त किए।
डॉ. मेहता ने भारत के मध्यम आकार के शहरों में जल स्थिरता की उभरती चुनौतियां : उदयपुर से सीखें और लें और अंतर्दृष्टियां” विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. इयान राइट ने ऑस्ट्रेलिया के ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू जल टैंकों में धातुओं और पीएफएएस प्रदूषण पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए।
वेबिनार के प्रारंभ में एआईडब्ल्यूसी के निदेशक एवं वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. बसंत माहेश्वरी ने कहा कि जल सुरक्षा को किसी एक नदी, झील, भूजल स्रोत अथवा पाइपलाइन की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता।
पूरे जल-तंत्र को एक साथ समझना और उसकी निरंतर देखरेख आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ‘वॉटर टॉक्स’ का उद्देश्य भारत, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों के शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं तथा जल क्षेत्र से जुड़े लोगों को साझा मंच देना है, ताकि वे जल से जुड़ी उभरती चुनौतियों, अनुभवों और समाधानों का आदान-प्रदान कर सकें।
डॉ. मेहता ने कहा कि भारत के एक लाख से दस लाख आबादी वाले सवा चार सौ से अधिक मध्यम आकार के शहर तेजी से बदल रहे हैं।
शहरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव, जलग्रहण क्षेत्रों और पहाड़ियों का क्षरण, भूजल पर बढ़ता दबाव, अत्यधिक वर्षा, शहरी बाढ़, लंबे शुष्क दौर और जल गुणवत्ता में गिरावट इन शहरों के सामने एक साथ उपस्थित हैं।
उन्होंने कहा कि इसे केवल बाढ़ अथवा सूखे की अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखने के बजाय एक अस्त-व्यस्त और बाधित जल-चक्र के रूप में समझना होगा।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों, पहाड़ियों, नदियों, जलधाराओं और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों के क्षरण तथा अनियोजित शहरीकरण से वर्षा का पानी जमीन में जाने के बजाय तेजी से बहने लगता है। इससे अत्यधिक वर्षा के समय बाढ़ की आशंका बढ़ती है, जबकि भूजल पुनर्भरण कम होने से सूखे और गर्मी के समय जल संकट गहराता है। इसलिए आवश्यकता केवल पानी को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि जल-चक्र को पुनर्स्थापित करने की है।
उदयपुर को उदाहरण बनाते हुए उन्होंने कहा कि उदयपुर अथवा कोई भी शहर एक अलग हाइड्रोलॉजिकल आइलैंड नहीं होता । नगर निगम की सीमा राजनीतिक और प्रशासनिक सीमा हो सकती है, लेकिन वह पानी , पानी प्रवाह की सीमा नहीं।
इसलिए शहरी जल प्रबंधन को केवल प्रशासनिक सीमाओं के आधार पर नहीं, बल्कि जलग्रहण क्षेत्र और नदी बेसिन के आधार पर देखना होगा। उन्होंने यहां तक सुझाव दिया कि शहरी नियोजन में वार्डों और अन्य इकाइयों का परिसीमन वाटरशेड आधारित होना चाहिए।
मेहता ने कहा कि अरावली की पहाड़ियां, जलग्रहण क्षेत्र, छोटी-बड़ी जलधाराएं, नदियां, झीलें, कुएं, बावड़ियां, भूजल और शहर एक ही परस्पर जुड़े जल-तंत्र के हिस्से हैं।
उदयपुर को केवल ‘झीलों का शहर’ कहना पर्याप्त नहीं है। यह एक जीवंतसामाजिक-पर्यावरणीय-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक और पुरातात्विक जल परिदृश्य है, जहां पानी ने शहर की पारिस्थितिकी, बसावट, अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया है।
उन्होंने कहा कि यदि झीलों को बचाना है तो केवल झील के पानी को नहीं, बल्कि उसके जलग्रहण क्षेत्र, नदी-नालों, जल प्रवाह मार्गों, भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों और आसपास के भू-उपयोग को भी सुरक्षित करना होगा।
उन्होंने कहा कि कोई भी झील केवल झील नहीं है; वह अपने जलग्रहण क्षेत्र, लोगों और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है।झील के किनारे सौंदर्यीकरण करने या उसमें पानी भरने से ही झील सुरक्षित नहीं होती। झील की वास्तविक सुरक्षा उसके पूरे बेसिन और उससे जुड़े प्राकृतिक तंत्र की सुरक्षा में है।
डॉ. मेहता ने जल प्रदूषण के बदलते स्वरूप को भी गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि प्रदूषण अब केवल सीवेज, ठोस कचरे और गंदले पानी तक सीमित नहीं है।
औषधियों, एंटीबायोटिक्स, हार्मोन, व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों और औद्योगिक रसायनों जैसे उभरते विषैले प्रदूषक जल तंत्र के लिए नई चुनौती हैं।
उन्होंने बताया कि उदयपुर के जल तंत्र में किए गए अध्ययनों में 41 उभरते प्रदूषकों की उपस्थिति तथा 30 की मात्रात्मक पहचान हुई थी। इनमें 19 सक्रिय औषधीय तत्व, 2 व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद, 6 स्टेरॉयड हार्मोन तथा 3 औद्योगिक प्रदूषक शामिल थे।
उन्होंने कहा कि ऐसे प्रदूषकों की चुनौती यह बताती है कि जल गुणवत्ता की सुरक्षा केवल उपचार संयंत्र में जाकर शुरू नहीं हो सकती। स्रोत पर प्रदूषण रोकना और जलग्रहण क्षेत्र को सुरक्षित रखना सबसे पहला उपचार है।
शहरी नदियों पर चर्चा करते हुए डॉ. मेहता ने कहा कि अनेक शहरों में नदी को केवल नाला अथवा सीवेज निकालने के माध्यम के रूप में देखा जाने लगा है।
जबकि स्वस्थ नदी बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और अंतर्संबंध, जल शुद्धिकरण, जैव विविधता, सूक्ष्म जलवायु तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि नदी को नाला बना देने से इंजीनियरिंग भले सरल हो जाए, लेकिन पारिस्थितिकी जटिल हो जाती है।
उदयपुर की आयड़ नदी के पारिस्थितिक पुनरुद्धार और ग्रीन ब्रिज के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रकृति और इंजीनियरिंग को आमने-सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है।
उपयुक्त तकनीक का उपयोग प्राकृतिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है। आहर नदी का अनुभव यह दिखाता है कि वैज्ञानिक समझ, नागरिक भागीदारी और पारिस्थितिक हस्तक्षेप से ही एक प्रदूषित नदी में सुधार संभव है।
डॉ. मेहता ने जल संरक्षण में नागरिकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समुदाय जल स्रोतों की निगरानी, संरक्षण और जन-जागरूकता में महत्वपूर्ण भागीदार बन सकते हैं। मारवी और भूजल जानकार जैसी पहलें यह दिखाती हैं कि वैज्ञानिक जानकारी और स्थानीय ज्ञान को जोड़कर जल प्रबंधन को अधिक सहभागी बनाया जा सकता है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि समुदाय सरकारी संस्थाओं का विकल्प नहीं हैं।
डॉ. मेहता ने जल के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष को भी जल स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में जल को केवल उपभोग की वस्तु अथवा आर्थिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि जीवन, संस्कृति और उत्तरदायित्व से जोड़ा गया है।
आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ इस जल-संस्कृति में निहित श्रद्धा, संयम, पारस्परिकता और उत्तरदायित्व को जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण गतिविधि की हरित एप्रोच को प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि विज्ञान हमें बताता है कि जल-तंत्र कैसे काम करता है, इंजीनियरिंग हमें समाधान के साधन देती है और पारिस्थितिकी बताती है कि क्या बचाना है; लेकिन नैतिकता यह तय करती है कि समाज जल के प्रति कितना संयम और उत्तरदायित्व दिखाता है।
दूसरे वक्ता डॉ. इयान राइट ने ऑस्ट्रेलिया के ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू वर्षाजल टैंकों की जल गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि प्रदूषक केवल टैंक के पानी में घुले रूप में ही नहीं रहते, बल्कि टैंक की तली में जमा तलछट में भी एकत्रित हो सकते हैं। इसलिए केवल घरेलू नल से लिए गए पानी के नमूने कई बार प्रदूषण की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते।
उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सीसा, आर्सेनिक और पीएफएएस जैसे प्रदूषकों के संदर्भ में निगरानी और नमूना लेने की पद्धतियों पर चर्चा की। उनके अनुसार प्रदूषण को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि “पानी में क्या है?”, बल्कि यह भी देखना होगा कि “प्रदूषक पानी तक पहुंचा कैसे?”
वेबिनार में राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. अरुण सावंत, सीएसआईआरओ ऑस्ट्रेलिया के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. पीटर डिलन , इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ हाइड्रोजियोलॉजिस्ट्स, इंडिया चैप्टर के अध्यक्ष एवं छत्रपति शिवाजी विश्वविद्यालय, मुंबई के पूर्व कुलपति प्रो. ए.के. सिन्हा , मैसूर की वैज्ञानिक प्रो. पुष्पा तप्पड़ तथा रायचूर के प्रो. देवानंद मस्की सहित अनेक विशेषज्ञों ने भाग लिया।
संचालन वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी की एडरीना चौधरी ने किया।