उदयपुर, राजस्थान विद्यापीठ का 90वां स्थापना दिवस शुक्रवार को प्रतापनगर स्थित परिसर के कंप्यूटर एवं आईटी सभागार में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। समारोह में विद्यापीठ के तीनों परिसरों के कार्यकर्ता, शिक्षक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
समारोह का शुभारंभ कुलपति प्रो. मंजु मांडोत, पूर्व कुल प्रमुख प्रफुल्ल नागर, पूर्व कुलपति प्रो. दिव्या प्रभा नागर, रजिस्ट्रार डॉ. तरुण श्रीमाली, आशीष नागर, प्रो. मलय पानेरी एवं प्रो. सरोज गर्ग ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन एवं संस्था के ध्वजारोहण के साथ किया। इससे पूर्व अतिथियों एवं कार्यकर्ताओं ने प्रतापनगर परिसर में स्थापित संस्थापक मनीषी पंडित जनार्दनराय नागर ‘जनुभाई’ की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।
जनुभाई के सपनों को पूरा करना ही सच्ची श्रद्धांजलि : प्रो. मंजु मांडोत
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. मंजु मांडोत ने कहा कि स्थापना दिवस केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, जिम्मेदारियों, मूल्यों और उस महान व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर है, जिसने राजस्थान विद्यापीठ के रूप में एक छोटे से पौधे का बीजारोपण किया था।
उन्होंने कहा कि जनुभाई के लिए शिक्षा केवल व्यक्तित्व विकास का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तीकरण और राष्ट्र निर्माण का आधार थी। विद्यापीठ आज भी उनके विचारों को आधार बनाकर बदलती सामाजिक आवश्यकताओं और नई चुनौतियों के अनुरूप आगे बढ़ रहा है।
प्रो. मांडोत ने कहा कि आधुनिक तकनीक एवं नवाचार आधारित पाठ्यक्रमों के साथ शिक्षक परंपराओं, मूल्यों और कृतज्ञता के भाव को आत्मसात करते हुए शैक्षिक उत्कृष्टता, शोध, सामाजिक उत्तरदायित्व, नवाचार और पारदर्शिता के साथ अपने दायित्व निभा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि आजादी से दस वर्ष पूर्व, 21 अगस्त 1937 को मात्र 26 वर्ष की आयु में पंडित जनार्दनराय नागर ने साक्षरता, बेहतर शिक्षा और मूल्यबोध के उद्देश्य से राजस्थान विद्यापीठ की स्थापना की थी। तीन रुपये से शुरू हुआ यह संस्थान आज 10 हजार से अधिक विद्यार्थियों, 75 से अधिक पाठ्यक्रमों और 50 से अधिक सर्टिफिकेट कोर्स के साथ एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। वर्तमान में संस्थान का वार्षिक बजट करीब 70 करोड़ रुपये है।
उन्होंने कहा कि जनुभाई को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके मिशन और विचारों को आगे बढ़ाएंगे।
संघर्ष, संस्कार और समर्पण से मजबूत होती हैं संस्थाएं : प्रो. दिव्या प्रभा नागर
पूर्व कुलपति प्रो. दिव्या प्रभा नागर ने कहा कि पंडित जनार्दनराय नागर का व्यक्तित्व शिक्षा, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए समर्पित था। उन्होंने उनके जीवन में उनकी माताजी के संस्कारों और सेवा भावना के प्रभाव को भी रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि निर्माण में समय लगता है और संघर्ष एवं अभावों के बीच नए पथ का निर्माण चुनौतीपूर्ण होता है। समाज एवं राष्ट्र निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर सहभागिता निभानी होगी। चरित्रवान, राष्ट्र समर्पित और संवेदनशील पीढ़ी का निर्माण ही राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में हमारी सार्थक आहुति है।
संघर्ष ही उन्नति का मार्ग : प्रफुल्ल नागर
विशिष्ट अतिथि एवं पूर्व कुल प्रमुख प्रफुल्ल नागर ने कहा कि संघर्ष ही उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने विद्यापीठ के प्रारंभिक दौर में शिक्षा और समाज निर्माण के लिए किए गए कार्यों तथा जनुभाई के विचारों एवं दर्शन को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि संस्थाएं विचारों और संस्कारों की शक्ति से मजबूत होती हैं तथा कार्यकर्ताओं के समर्पण एवं त्याग से उनकी विकास यात्रा आगे बढ़ती है। विद्यापीठ अपने सामाजिक दायित्वों और सामुदायिक सरोकारों को पूरा करते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है।
विशिष्ट अतिथि आशीष नागर ने कहा कि विद्यापीठ ने समय और आवश्यकता के अनुरूप बदलाव करते हुए रोजगारपरक कार्यक्रमों को अपनाया है। इससे संवेदनशील और सक्षम पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है।
राष्ट्र की शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति में विद्यापीठ की महत्वपूर्ण भूमिका
कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर के संदेश का वाचन करते हुए प्रो. सरोज गर्ग ने कहा कि स्थापना दिवस बीते वर्षों के कार्यों के मूल्यांकन के साथ नए दायित्वों के बोध का भी अवसर है। उन्होंने नई पीढ़ी से मेवाड़ के ग्रामीण समुदाय के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए जनुभाई के सपनों को साकार करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र की शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति में विद्यापीठ अपनी भूमिका निरंतर निभा रहा है। अच्छे समाज के निर्माण की जिम्मेदारी शिक्षक की है और शिक्षकों को छात्र निर्माण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना चाहिए।
समारोह में इतिहासविद् प्रो. हेमेन्द्र चौधरी, रजिस्ट्रार डॉ. तरुण श्रीमाली और पुरुषोत्तम शर्मा ने भी जनुभाई के जीवन, कार्यों एवं संस्मरणों को साझा किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया, जबकि आभार प्रो. मलय पानेरी ने व्यक्त किया।
इस अवसर पर प्रो. जीएम मेहता, प्रो. पारस जैन, प्रो. अमी राठौड़, प्रो. सुनीता मुर्डिया, प्रो. अवनीश नागर, प्रो. बलिदान जैन, प्रो. रचना राठौड़, डॉ. प्रकाश धाकड़, डॉ. भवानीपाल सिंह, डॉ. एसबी नागर, डॉ. बबीता रसीद, प्रो. लालाराम जाट, प्रो. धीरज प्रकाश जोशी, डॉ. मनीष श्रीमाली, डॉ. दिलीप सिंह चौहान, किशन सिंह राव, राजेन्द्र, आरिफ मोहम्मद, डॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. हीना खान, डॉ. नीरू राठौड़, डॉ. अमीया गोस्वामी, डॉ. आशीष डी. नंदवाना, डॉ. मोहसीन छीपा, राजन सुद, डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव, आशीष नंदवाना, उमराव सिंह राणावत, डॉ. अलक नंदा, उदय भान सिंह सहित विद्यापीठ के डीन, डायरेक्टर एवं शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।