प्रकृति के प्रतिबिंब पुस्तक का भी हुआ विमोचन उदयपुर , ,विश्व टाउन प्लानिंग दिवस (8 नवंबर ) के संदर्भ में रविवार को इंस्टीट्यूशन ऑफ टाउन प्लानर्स की ओर से आयोजित संगोष्ठी में पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सतीश शर्मा तथा विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य , डॉ अनिल मेहता ने कहा कि शहरों का भविष्य कंक्रीट से नहीं, प्रकृति के साथ तालमेल से तय होगा।
शहरों की प्लानिंग केवल सड़कों, भवनों, बाजारों और इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार तक सीमित नहीं रहे। वास्तविक नगर आयोजना वह है, जो प्रकृति की पारिस्थितिक सीमाओं का सम्मान करते हुए नागरिकों के लिए सुरक्षित, समावेशी, जलवायु-सहिष्णु और रहने योग्य शहरों का निर्माण करे।
श्रीमाली तथा डॉ मेहता ने कहा कि विकास की गुणवत्ता इस बात से तय होनी चाहिए कि शहर कितना निर्मित हुआ, इसके साथ यह भी देखा जाए कि उसने अपने जलस्रोतों, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को कितना संरक्षित किया।
दोनों विशेषज्ञों ने कहा कि कोई भी शहर अपने आसपास की पहाड़ियों, जंगलों, नदियों, झीलों,वेटलैंड और भूजल तंत्र से अलग नहीं है।
केचमेंट क्षेत्र का क्षरण, प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण, वेटलैंड का सिकुड़ना और हरित क्षेत्रों का विनाश अंततः शहरों में बाढ़, जलसंकट, भूजल पुनर्भरण में कमी और तापमान वृद्धि जैसी समस्याओं को बढ़ाते हैं।
इसलिए नगर नियोजन को केवल प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित रखने के बजाय संपूर्ण केचमेंट और पारिस्थितिक तंत्र को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
डॉ अनिल मेहता ने कहा कि नगर आयोजना में स्पाशियल इकोलॉजिकल जोन Spatial Ecological Zones (SEZ)—स्थानिक पारिस्थितिक क्षेत्रों की अवधारणा अपनाने की आवश्यकता है । इसके अंतर्गत भूमि उपयोग का निर्धारण केवल व्यावसायिक, आवासीय और औद्योगिक वर्गीकरण के आधार पर नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संवेदनशीलता, जल विज्ञान, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और प्राकृतिक जल निकासी के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
पहाड़ियों, वन क्षेत्रों, झीलों, वेटलैंड , और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों की पहचान कर उनके संरक्षण के अनुरूप विकास संबंधी निर्णय लिए जाएं। संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों का निर्धारण उनकी पर्यावरणीय वहन क्षमता तथा लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो।
डॉ मेहता ने कहा कि झीलें( वेटलैंड्स) , अरावली की पहाड़ियां, आयड़ नदी, और कुंवा, बावड़ियां पारंपरिक जल प्रणालियां शहर की पारिस्थितिक सुरक्षा तथा जल उपलब्धता की आधारशिला हैं। इनका संरक्षण अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय एकीकृत( समग्र( केचमेंट प्रबंधन और नगर आयोजना के माध्यम से किया जाना चाहिए।
आयड़ नदी के पुनर्जीवन में प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, सीवेज उपचार, नदी तटों की पारिस्थितिक बहाली और प्रकृति आधारित समाधानों को साथ लेकर चलना होगा। इसी तरह झीलों के संरक्षण के लिए उनके जलग्रहण क्षेत्रों, प्राकृतिक जलप्रवाहों, जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक वहन क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है। उदयपुर को प्राप्त रामसर वेटलैंड सिटी मान्यता भी झील संरक्षण को शहरी विकास की मुख्यधारा में लाने का महत्वपूर्ण अवसर है।
वहीं सतीश श्रीमाली ने जोर दिया कि शहरी समस्याओं का समाधान केवल कंक्रीट की नालियों, दीवारों और इंजीनियरिंग संरचनाओं से संभव नहीं है। प्राकृतिक जल निकासी मार्गों का संरक्षण, वर्षाजल का स्थानीय स्तर पर संचयन, झीलों का पुनर्जीवन, नदी किनारों पर प्राकृतिक वनस्पति, पारगम्य सतहें, हरित गलियारे और विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार जैसी प्रकृति आधारित समाधान प्रणालियां नगर आयोजना का अभिन्न हिस्सा बननी चाहिए।
श्रीमाली ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में शहरों के मास्टर प्लान में बाढ़ जोखिम, शहरी ताप द्वीप प्रभाव, जल उपलब्धता, हरित क्षेत्र और जलवायु-संवेदनशील आधारभूत ढांचे को प्राथमिकता देना आवश्यक है। विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल आर्थिक निवेश से नहीं, बल्कि उनके पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों से भी किया जाना चाहिए।
दोनों विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि नगर आयोजना में स्थानीय समुदायों, नागरिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों, विशेषज्ञों और स्थानीय निकायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से स्थानीय समस्याओं के अधिक प्रभावी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। नागरिकों को केवल विकास योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक और सहभागी नियोजक के रूप में देखा जाना चाहिए।
नगरों का भविष्य केवल निर्माण की गति से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ उनके संबंधों की गुणवत्ता से तय होगा। आवश्यकता ऐसे शहरों की है, जहां विकास पारिस्थितिकी के अनुरूप हो, जलस्रोत सुरक्षित रहें, नागरिकों को समान अवसर मिलें और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत संरक्षित रहे।
इस अवसर पर डॉ पी आर व्यास की पुस्तक प्रकृति के प्रतिबिंब का भी विमोचन हुआ