कोटा।भूखंडों के पट्टे, कैंसिल संपत्तियों को पुनर्जीवित कराने, दुकान-मकान आवंटन और फॉरेस्ट भूमि को डी-फॉरेस्ट कराने के नाम पर लाखों की ठगी के आरोप अख्तर खान अकेला, कोटा राजस्थान कोटा में गोलीबारी, चाकूबाजी, चेन स्नेचिंग और चोरी जैसी वारदातों से पुलिस लगातार निपट रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अपराध का एक ऐसा चेहरा भी सामने आया है, जो आम आदमी की मेहनत की कमाई पर सीधा वार कर रहा है।
यह है सरकारी विभागों में कथित सेटिंग, दस्तावेजों और अधिकारियों तक पहुंच का झांसा देकर संपत्ति संबंधी काम करवाने के नाम पर लाखों रुपये की ठगी का खेल।
भूखंडों के पट्टे दिलवाने, हाउसिंग बोर्ड, नगर विकास न्यास और केडीए में कैंसिल संपत्तियों, दुकानों, प्लॉट और मकानों को दोबारा आवंटित करवाने, विवादित जमीनों के पट्टे बनवाने तथा फॉरेस्ट भूमि को डी-फॉरेस्ट कराने के नाम पर लोगों से बड़ी रकम लेने के मामले सामने आते रहे हैं। इतना ही नहीं, कलर्ड जेरॉक्स या संदिग्ध दस्तावेज दिखाकर विवादित संपत्ति को बेचने के आरोपों में भी मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।
कोटा शहर के विभिन्न थानों में ऐसे मामलों में प्रकरण दर्ज हुए और आरोपियों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या कार्रवाई के बाद भी ठगी का यह नेटवर्क पूरी तरह खत्म हुआ है?
आश्वासनों के चक्कर में फंसे पीड़ित सबसे बड़ी समस्या उन लोगों की है, जो कथित बिचौलियों या एजेंटों को लाखों रुपये दे चुके हैं। रकम देने के बाद महीनों और वर्षों तक उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलते रहते हैं—“काम हो जाएगा”, “फाइल चल रही है”, “अधिकारी से बात हो गई है”, “अगले सप्ताह पट्टा मिल जाएगा।”
कई पीड़ित इसी उम्मीद में पुलिस में शिकायत या एफआईआर दर्ज कराने से भी बचते हैं। उन्हें डर रहता है कि मामला दर्ज हुआ तो रकम वापस मिलेगी या नहीं, आरोपी जमानत पर बाहर आ जाएगा या फिर लेन-देन का पर्याप्त सबूत नहीं होने से मामला कमजोर पड़ जाएगा।
यही चुप्पी कथित ठगों के हौसले को बढ़ाने का काम करती है।
‘लाखों के बदले करोड़ों’ का सपना ऐसे मामलों में कथित ठग सबसे पहले व्यक्ति की लालच और उसकी संपत्ति संबंधी जरूरत को पहचानते हैं। फिर उसे बताया जाता है कि संबंधित विभाग में उनकी “सेटिंग” है, अधिकारी उनके संपर्क में हैं और कुछ लाख रुपये खर्च करके करोड़ों रुपये कीमत की संपत्ति, प्लॉट, मकान या दुकान हासिल की जा सकती है।
यहीं से शुरू होता है ‘लाखों लगाओ और करोड़ों की संपत्ति पाओ’ का सपना।
लेकिन कई मामलों में सपना दिखाने वाले लोग रकम लेने के बाद पीड़ित को कार्यालयों और तारीखों के चक्कर लगवाते रहते हैं।
पुलिस को सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, नेटवर्क की तह तक जाना होगा कोटा पुलिस ने पिछले दो वर्षों में संपत्ति संबंधी ठगी के कई मामलों में कार्रवाई की है। आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन अब जरूरत सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि ऐसे मामलों की आर्थिक जांच और नेटवर्क की पहचान करने की है।
यदि किसी आरोपी पर गंभीर आर्थिक ठगी का आरोप है तो जांच के दौरान उसकी नामी-बेनामी संपत्तियों, बैंक खातों, लेन-देन और संपत्ति खरीदने के स्रोत की भी जांच होनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि उसने संपत्तियां किस आय से खरीदीं और कहीं ठगी की रकम से संपत्ति अर्जित तो नहीं की गई।
यदि कानूनन ऐसा पाया जाता है कि अपराध से अर्जित धन से संपत्ति बनाई गई है, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत संपत्ति जब्ती/कुर्की की कार्रवाई और पीड़ितों को राहत दिलाने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
कोटा में जागरूकता अभियान की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसी ठगी से आम आदमी को बचाने के लिए जागरूकता अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा?
पुलिस, प्रशासन, केडीए, नगर निगम और अन्य संबंधित विभाग संयुक्त रूप से लोगों को यह जानकारी दे सकते हैं कि संपत्ति से संबंधित किसी भी काम के लिए आधिकारिक प्रक्रिया क्या है, कौन से दस्तावेज वैध हैं और किन परिस्थितियों में किसी एजेंट या बिचौलिए को पैसा देना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद सावधानी जरूरी आज के समय में केडीए, पूर्व नगर विकास न्यास और नगर निगम सहित कई सरकारी सेवाओं में ऑनलाइन व्यवस्था उपलब्ध है। ऐसे में किसी अनजान व्यक्ति को अपनी जगह एसएसओ आईडी, मोबाइल नंबर या अन्य लॉगिन संबंधी जानकारी का इस्तेमाल करने देना भी जोखिमपूर्ण हो सकता है।
किसी संपत्ति संबंधी काम में यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि “आपको कार्यालय आने की जरूरत नहीं, हम सब करवा देंगे”, तो सावधान हो जाना चाहिए। संबंधित फाइल और आवेदन की स्थिति स्वयं आधिकारिक माध्यम से जांचना बेहतर है।
बुद्धिजीवी और आम नागरिक भी लालच से बचें इस पूरे मामले का दूसरा पहलू नागरिकों की जिम्मेदारी भी है। लाखों रुपये देकर करोड़ों की संपत्ति हासिल करने का लालच अक्सर व्यक्ति को बिना पर्याप्त जांच के फैसले लेने पर मजबूर कर देता है।
किसी भी विवादित जमीन, प्लॉट, मकान या दुकान के मामले में दस्तावेजों की स्वतंत्र कानूनी जांच कराए बिना रकम देना खतरनाक हो सकता है। दस्तावेज असली हैं या नहीं, संपत्ति का वास्तविक मालिक कौन है, उस पर कोई विवाद या प्रतिबंध तो नहीं, सरकारी रिकॉर्ड में उसकी स्थिति क्या है—इन सभी सवालों की जांच जरूरी है।
किसी भी बड़ी रकम के लेन-देन से पहले दस्तावेज किसी योग्य विधिक विशेषज्ञ को दिखाकर उनकी वास्तविकता और कानूनी स्थिति समझना चाहिए।
अब समय है ‘सेटिंग’ के दावों की जांच का कोटा में यदि कोई व्यक्ति या संस्था लगातार सरकारी विभागों में अपनी कथित पहुंच और सेटिंग के नाम पर लोगों से लाखों रुपये ले रही है, तो उसकी गतिविधियों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।
पुलिस को ऐसे मामलों में सिर्फ एक पीड़ित की शिकायत तक सीमित न रहकर यह भी पता लगाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने कितने लोगों से रकम ली, कितनी संपत्तियों का सौदा कराया, किन-किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और उसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क तो काम नहीं कर रहा।
आम नागरिकों को भी यह समझना होगा कि “लाखों रुपये देकर करोड़ों की संपत्ति हासिल करने” का दावा अवसर नहीं, बल्कि ठगी का संकेत भी हो सकता है।
इसलिए लालच में आकर पैसा देने के बजाय पहले दस्तावेजों की जांच करें, सरकारी रिकॉर्ड स्वयं सत्यापित करें, कानूनी सलाह लें और संदिग्ध गतिविधि सामने आने पर समय रहते पुलिस या संबंधित विभाग को सूचना दें।
सावधानी ही ऐसी संपत्ति संबंधी ठगी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।