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महाराणा प्रताप का संघर्ष सत्ता विरोध नहीं, राष्ट्र धर्म और सांस्कृतिक स्वाधीनता का शंखनाद था – प्रो. कर्नल एसएस सारंगदेवोत

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29 Jan 26
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महाराणा प्रताप का संघर्ष सत्ता विरोध नहीं, राष्ट्र धर्म और सांस्कृतिक स्वाधीनता का शंखनाद था – प्रो. कर्नल एसएस सारंगदेवोत

उदयपुर। महाराणा प्रताप का संघर्ष किसी सत्ता के विरुद्ध नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक स्वाधीनता की रक्षा के लिए था। यह संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता का व्यापक अर्थ समझाने वाला शंखनाद था। 
यह विचार जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. कर्नल एसएस सारंगदेवोत ने महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के अवसर पर व्यक्त किए। 29 जनवरी 1597 को 56 वर्ष की आयु में चावंड में महाराणा प्रताप के देहावसान की स्मृति में कुलपति सचिवालय परिसर में स्थित महाराणा प्रताप की प्रतिमा के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इसके पश्चात आयोजित स्मरण सभा को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. कर्नल एसएस सारंगदेवोत ने महाराणा प्रताप के जीवन, संघर्ष और आदर्शों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कुलपति प्रो. कर्नल एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि महाराणा प्रताप की स्वाधीनता की अवधारणा केवल उनके निजी स्वाभिमान तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समूचे समाज और भावी पीढ़ियों के सम्मान की रक्षा से जुड़ी थी। प्रताप का जीवन यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता तभी सार्थक मानी जा सकती है, जब वह अपने लिए जितनी सुरक्षित हो, उतनी ही दूसरों के अधिकारों और स्वाभिमान की भी रक्षक बने। उन्होंने आह्वान किया कि प्रताप के स्वाभिमान, त्याग और राष्ट्रप्रेम को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित न रखकर, अपने आचरण और सामाजिक जीवन में उतारा जाए।
स्मरण सभा को संबोधित करते हुए प्रो. कर्नल शिव सिंह सारंगदेवोत ने कहा कि महाराणा प्रताप ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध जो अदम्य साहस और अटूट प्रतिरोध दिखाया, वह सत्ता-विरोध नहीं बल्कि आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का संग्राम था। हल्दीघाटी के रण से लेकर चावंड को राजधानी बनाने तक प्रताप का सम्पूर्ण जीवन त्याग, संकल्प और राष्ट्रप्रेम की अखंड गाथा है।
उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप ने कभी ऐश्वर्य और वैभव का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने वनवास, अभाव और कठिन संघर्ष को स्वीकार किया, किंतु स्वतंत्रता के मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। प्रताप की आज़ादी की परिभाषा सर्वजन थी, जिसमें किसान, सैनिक, जनजाति और सामान्य प्रजा सभी का सम्मान समान रूप से सुरक्षित था।
अन्य वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में महाराणा प्रताप की चेतना को वर्तमान से जोड़ने और उनके आदर्शों को शिक्षा, समाज और सार्वजनिक जीवन में जीवित रखने की आवश्यकता है। प्रताप का स्वाधीनता-संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि सच्ची स्वतंत्रता वही है जो अपने लिए जितनी हो, उतनी ही दूसरों के लिए भी सुनिश्चित हो।
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. तरुण श्रीमाली, लेखाधिकारी भगवतीलाल श्रीमाली, निजी सहायक जितेंद्र सिंह चौहान, डॉ. यज्ञ आमेटा, राकेश गुर्जर, सहायक सांवरिया लाल धाकड़, नाथूलाल गायरी, शंकर लाल डांगी, ओंकार सिंह सहित विभिन्न विभागों-प्रभागों के अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे। 


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