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दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण समय की मांग - प्रो. सारंगदेवोत

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13 Feb 26
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दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण समय की मांग - प्रो. सारंगदेवोत

उदयपुर| दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण और व्यावहारिक हस्तक्षेप समय की मांग है।

यह बात शुक्रवार को जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के अंतर्गत डिपार्टमेंट ऑफ रिहेबिलिटेशन साइंसेज, माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी सांयकालीन महाविद्यालय द्वारा आरसीआई, नई दिल्ली से अनुमोदित तीन दिवसीय सतत पुनर्वास शिक्षा (सीआरई) कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रोफेसर (कर्नल) शिव सिंह सारंगदेवोत ने कही। 

कार्यक्रम के समन्वयक एवं डीन डॉ. एस.बी. नागर ने बताया कि कार्यक्रम का विषय “दिव्यांगता, हस्तक्षेप एवं समावेशन” रहा, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के अधिकार, मनोवैज्ञानिक पहलुओं और समावेशी शिक्षा के विभिन्न आयामों पर गहन चर्चा करना था।
 उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. सारंगदेवोत ने  समावेशी समाज की आवश्यकता पर बल दिया। 

प्रथम दिवस जोधपुर की डॉ. नीता जैन ने दिव्यांगजन को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक कारकों तथा भेदभाव के कारण उन पर पड़ने वाले भावनात्मक प्रभावों की विस्तृत व्याख्या की। डॉ. सुशील रोहिवाल ने समावेशन के लिए आवश्यक मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेपों तथा समाज के नकारात्मक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। डॉ. सुनील आग्रहारी ने समावेशी शिक्षा के उद्देश्य, मूल्यों और समावेशन में आने वाली बाधाओं को स्पष्ट किया।

आर.एन.टी. मेडिकल कॉलेज के डॉ. आर.के. शर्मा ने व्यक्तियों में चिंता तथा समाज द्वारा बहिष्कार के डर से उत्पन्न मानसिक प्रभावों की विस्तार से चर्चा की। झालावाड़ से आए प्रिंस कुमार ने दिव्यांगजनों के अधिकारों, सरकारी नीतियों, नियमों और उपनियमों की जानकारी दी। कोटा के विजेंद्र सिंह नरुका ने समाज में दिव्यांग व्यक्तियों के समावेशन के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. एस.बी. नागर ने दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाले कारकों पर प्रकाश डाला।

इसके अतिरिक्त डॉ. भावना देवी, ठाकुर वर्मा, किरण और प्रभा चतुर्वेदी ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में प्रदेश के सभी जिलों से प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी रही। महाविद्यालय की डॉ. नेहा, श्रीमती ममता शर्मा, श्रीमती नीलू वर्मा, पुरखा राम और  पुनीत जैन सहित अन्य कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे।

यह कार्यक्रम दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण, अधिकार जागरूकता और समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुआ।


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