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कैसे महिला फिल्ममेकर भारत की स्ट्रीमिंग और ग्लोबल सिनेमा पहचान को नया आकार दे रही हैं

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03 Feb 26
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कैसे महिला फिल्ममेकर भारत की स्ट्रीमिंग और ग्लोबल सिनेमा पहचान को नया आकार दे रही हैं

मुंबई, जहाँ दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट इंटरनेशनल रेड कार्पेट्स और ग्लोबल सुर्खियों में लगातार छाई रहती हैं, वहीं भारतीय एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में असली और कहीं अधिक गहरा बदलाव कैमरे के पीछे हो रहा है। महिला क्रिएटर्स शांत लेकिन प्रभावशाली तरीके से कहानी कहने, स्केल और महत्वाकांक्षा के नियमों को दोबारा लिख रही हैं और भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर नई दिशा दे रही हैं।

गुनीत मोंगा ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक मानचित्र पर नए सिरे से परिभाषित किया है। इंडिपेंडेंट आवाज़ों को मंच देने से लेकर द एलिफेंट व्हिस्परर्स के लिए ग्लोबल अवॉर्ड जीतने तक, मोंगा ने एक ऐसा प्रोड्यूसर मॉडल तैयार किया है, जो भारतीय जड़ों से जुड़ी कहानियों को यूनिवर्सल इमोशनल अपील के साथ प्रस्तुत करता है। कटहल: ए जैकफ्रूट मिस्ट्री जैसी फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि जब सच्चाई और मौलिकता को दृढ़ विश्वास के साथ पेश किया जाए, तो वह किसी भी भव्यता से आगे निकल सकती है।

भारत के ओटीटी रिवॉल्यूशन के केंद्र में कनिका ढिल्लों हैं, जिन्होंने यह पूरी तरह बदल दिया है कि मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स से कैसे जुड़ता है। लेखिका और निर्माता दोनों भूमिकाओं में, अपने प्रोडक्शन बैनर कथा पिक्चर्स के ज़रिए, कनिका ढिल्लों डिजिटल स्पेस की सबसे व्यावसायिक रूप से सफल और प्रभावशाली आवाज़ों में से एक बन चुकी हैं।

हसीन दिलरुबा, गिल्टी, फिर आई हसीन दिलरुबा और दो पत्ती जैसे ब्लॉकबस्टर टाइटल्स, जिसमें दो पत्ती नेटफ्लिक्स पर ग्लोबल स्तर पर टॉप परफॉर्म करने वाली फिल्मों में शामिल रही, यह साबित करते हैं कि महिला-केंद्रित थ्रिलर्स और भावनात्मक रूप से जटिल कहानियाँ न सिर्फ लोकप्रिय संस्कृति पर राज कर सकती हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों से भी गहरा जुड़ाव बना सकती हैं। उनकी अगली फिल्म गांधारी के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि वह आगे कौन-सी सीमाएँ तोड़ती हैं।

जोया अख्तर ने भी भारत की सांस्कृतिक पहुँच को वैश्विक स्तर पर विस्तारित करने में अहम् भूमिका निभाई है। गली बॉय ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के साथ भाषाई और सांस्कृतिक सीमाओं को तोड़ा, वहीं मेड इन हेवन ने पहचान, विशेषाधिकार और रिश्तों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बातचीत शुरू की।

रीमा कागती का काम लॉन्ग-फॉर्म स्टोरीटेलिंग पर उनकी मज़बूत पकड़ को दर्शाता है। तलाश से लेकर दहाड़ तक, उनकी कहानियाँ सामाजिक यथार्थ और ग्लोबल क्राइम-ड्रामा सेंसिबिलिटी का संतुलित मिश्रण पेश करती हैं। उनकी कमिंग-ऑफ-एज फिल्म सुपरबॉएज़ ऑफ मालेगाँव को दर्शकों और समीक्षकों, दोनों से भरपूर सराहना मिली।

मेघना गुलज़ार लगातार राजनीतिक संदर्भ और भावनात्मक सच्चाई के बीच संतुलन साधती रही हैं। राज़ी, तलवार और सैम बहादुर जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने सिनेमा की ऐसी परिभषा रची है, जो भारत में भी गहराई से जुड़ती है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव छोड़ती है। उनकी आगामी क्राइम थ्रिलर दायरा, जिसमें करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन नजर आएँगे, पहले से ही बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट्स में शामिल है।

ये सभी महिलाएँ सिर्फ भारत के ग्लोबल एंटरटेनमेंट मोमेंट का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे इसे सही दिशा भी दे रही हैं। उनकी फिल्में और सीरीज़ भारत की बदलती हुई सॉफ्ट पॉवर की रीढ़ बन चुकी हैं। साथ, ही यह साबित कर रही हैं कि भारतीय कहानी कहने का भविष्य न सिर्फ वैश्विक है, बल्कि निर्णायक रूप से महिला-नेतृत्व वाला, लेखक-केंद्रित और कंटेंट-फर्स्ट है।


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