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क्या विधवा होना गुनाह है?

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07 Jan 26
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क्या विधवा होना गुनाह है?

२००७ -११ जून
एक फ़ोन ने मेरी ज़िंदगी बदल कर रख दी। घर पर पार्टी चल रही थी। मैं और मेरी सहेलियाँ बच्चों के साथ खा पी कर गप्पें मार रहे थे । अचानक से मेरे मोबाइल की घंटी बजी । मैंने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ़ से एक घबरायी हुई आवाज़ में आदमी ने हेलो बोला। मैंने नंबर देखा तो वो मेरे हसबैंड का नंबर था पर आवाज़ किसी अजनबी की थी। उन्होंने कहा की मेरे हसबैंड का एक्सीडेंट हो गया है ।
उसने कहा, “मैडम, आपके पति का एक्सीडेंट हो गया है। वो बहुत बुरी तरह ज़ख़्मी हैं। हम उन्हें अभी पीजीआई ले जा रहे हैं। आप जल्दी आ जाइए।”
मेरा दिल जैसे ज़मीन में धंस गया। हाथ से फ़ोन छूटते-छूटते बचा। सहेलियाँ चुप हो गईं। बच्चों की हंसी एक पल में ग़ायब। मैंने बस इतना कहा, “मैं आ रही हूँ,” और दौड़ पड़ी। मैंने ड्राइवर को कॉल किया वो भागता हुआ घर आया , उसने कार निकाली और हम हॉस्पिटल की ओर चल पड़े । रास्ते भर दुआएँ मांगती रही। मन में बार-बार वही सवाल—क्यों? आज सुबह तो वो बिल्कुल ठीक थे।शोरूम जाते वक़्त मुस्कुरा कर बोले थे, “शाम को जल्दी आऊँगा, बच्चों के लिए चॉकलेट लाऊँगा।”
हॉस्पिटल पहुंची तो इमरजेंसी के बाहर भीड़ लगी थी। मैं अंदर घुसी। वहाँ बेड पर वो लेटे थे—शांत चेहरा आँखें बंद, हर जगह हड्डियां टूटी हुई । डॉक्टर ने कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालत गंभीर है।”
मैं उनके पास बैठ गई। हाथ पकड़ा। ठंडे थे। मैं फुसफुसाई, “उठो न… बच्चों को चॉकलेट लानी है न तुम्हें…”
दो घंटे कैसे बीते मुझे नहीं पता। डॉक्टर ने आकर कहा, “हमने सब कुछ कर लिया। वो ब्रेन डेड हैं। इंटरनल ब्रीडिंग की वजह से उनका बचना नामुमकिन था।
मेरा दिल टूट गया। आख़िर डॉक्टर ने उन्हें डेड डिक्लेअर किया। उनके साथ ही हमारे शोरूम की अकाउंटेंट का भाई भी था जिसकी ऑन द स्पॉट डेथ हो गई थी।
आज अठारह साल हो गए उस दिन को। बच्चे बड़े हो चुके हैं। मैंने उन्हें अकेले पाला। कभी-कभी शाम को चॉकलेट ख़रीदती हूँ और सोचती हूँ—वो आज होते तो यही ब्रांड लाते।
उस फ़ोन ने सचमुच मेरी ज़िंदगी बदल दी। दर्द दिया, लेकिन हिम्मत भी दी। मैंने सीखा कि ज़िंदगी बहुत नाज़ुक है, और प्यार बहुत गहरा।
मैंने अपने घर पर फ़ोन मिलाया।
मेरे पापा ने जैसे ही फ़ोन पर सुना, उनकी आवाज़ काँप उठी। “क्या कहा… नहीं… नहीं, ये नहीं हो सकता…” फ़ोन उनके हाथ से गिर गया। मैं दूसरी तरफ़ सुन रही थी—उनकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं। जैसे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। उनकी सबसे छोटी बेटी, उनकी लाड़ली, अब विधवा हो गई थी। वो बेटी जिसे वो गोद में उठाकर “मेरी राजकुमारी” कहते थे।
माँ-पापा ने सबसे जल्दी वाली फ्लाइट पकड़ी। रास्ते भर माँ रोती रहीं, पापा खामोश। जब वो घर पहुँचे, तो बाहर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। सहानुभूति देने वाले, रिश्तेदार, पड़ोसी—सबके मुँह पर वही शब्द: “भगवान की मर्ज़ी… सहन करना पड़ेगा…” लेकिन अंदर का माहौल ठंडा और ख़ाली था। मेरे पति का पोस्टमॉर्टम हॉस्पिटल में अभी चल रहा था। उनका शरीर वहाँ पड़ा था, जिस शरीर में कल तक जान थी, हँसी थी, मेरे बच्चों के लिए प्यार था।
मैं दरवाज़े पर खड़ी थी, आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी। पापा को देखते ही मेरी हिम्मत टूट गई। मैंने चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि वो मेरी लाल आँखें न देख लें। मैं नहीं चाहती थी कि वो मुझे इस हाल में देखें। मैं उनकी मज़बूत बेटी थी न… हमेशा से।
लेकिन तभी मेरा छोटा बेटा, जो अभी सिर्फ़ साढे तीन साल का था, दौड़ता हुआ आया। उसने पापा के पैर पकड़ लिए और मासूम आवाज़ में पूछा, “नाना, पापा कब आएँगे? वो तो बोले थे आज चॉकलेट लाएँगे…”
पापा ने उसे गोद में उठाने की कोशिश की। उनकी आँखें उस मासूम चेहरे पर टिक गईं—वो चेहरा जो अपने पापा का अक्स था। वही आँखें, वही मुस्कान। पापा का चेहरा पीला पड़ गया। उनके होंठ काँपे। वो कुछ कहना चाहते थे, लेकिन बोल न सके।
और फिर… वो ज़मीन पर गिर गए। पहले घुटनों के बल, फिर पूरी तरह। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। माँ चीख़ीं, “अरे, क्या हुआ?!” मैं दौड़ी। लोगों ने उन्हें सहारा दिया। लेकिन पापा की आँखें बंद हो चुकी थीं। उनका दिल, जो इतना बड़ा था कि पूरी दुनिया का दुख सह लेता था, अपनी बेटी और नाती का ये दर्द न सह सका।
डॉक्टर आए। चेक किया। फिर सिर झुका लिया। “ हार्ट अटैक और ब्रेन हेमरेज… । वो चले गए।” माँ बुत बन गई।
एक ही दिन में मैंने अपना पति खोया, और फिर अपने पापा। जैसे मेरी ज़िंदगी का आधा हिस्सा एक पल में उजड़ गया। माँ अकेली रह गईं। मैं अकेली। बच्चे अनाथ जैसे।
अब हर साल ११ जून को मैं दो चॉकलेट ख़रीदती हूँ। एक उनके लिए—मेरे पति के लिए। एक पापा के लिए। दोनों की तस्वीरों के सामने रखती हूँ। और धीरे से कहती हूँ, “देखो, मैं लाई हूँ। अब आप दोनों साथ हो न… तो साथ में खा लेना।”
आँसू गिरते हैं, लेकिन दिल को सुकून भी मिलता है। क्योंकि मुझे पता है—वो दोनों कहीं दूर नहीं गए। वो मेरे अंदर हैं। मेरी हिम्मत में, मेरी साँसों में, मेरे बच्चों की हँसी में।
और मैं जीती हूँ। उनके लिए। उनके नाम पर।

उस भयानक दिन के बाद, जब मेरे पति और पापा दोनों एक साथ चले गए, मेरी दुनिया जैसे अंधेरे में डूब गई। मैंने खुद को अपने आप में समेट लिया—नहीं, समाज ने मुझे समेत दिया। लोग फुसफुसाते, “अब विधवा हो गई हो… रंगीन कपड़े मत पहनो, गहने उतार दो, मंगलसूत्र तोड़ दो। त्योहारों में मत आना, अपशकुन लगेगा।” किसी से हंस कर बात कर लो तो बुरी तरह सुनाया जाता।
मेरी आँखों से आँसू बहते, दिल चीख़ता—क्या विधवा होना मेरा गुनाह है? क्या मैंने कोई पाप किया था जो ये सजा मिली? मैं तो बस प्यार करती थी, जीती थी… और एक पल में सब छिन गया। लेकिन सजा तो मुझे मिल रही थी—उम्र भर की।
और सबसे दर्दनाक तो ये कि जान-पहचान के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी, कभी-कभी तो अपने ही परिवार के मर्द—मुझे एक इंसान नहीं, बस एक सेक्स ऑब्जेक्ट समझते। जैसे पति के जाने से मेरी इंसानियत भी चली गई हो। वो गंदी नज़रों से देखते, फब्तियाँ कसते, “अकेली हो अब, कुछ चाहिए तो बता देना…” कहकर हँसते।
कई विधवाएँ तो बताती हैं कि नौकरी पर, घर में, यहाँ तक कि आश्रमों में भी यौन शोषण का शिकार होती हैं। वृंदावन जैसी जगहों पर तो युवा विधवाओं को मजबूरन देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। लोग सोचते हैं कि बिना मर्द के औरत की कोई इज्ज़त नहीं, कोई जरूरत नहीं—बस शरीर है, जिसका इस्तेमाल कर लो। कितना घिनौना है ये! हमारा दर्द देखकर सहानुभूति नहीं, बल्कि मौक़ा देखते हैं शोषण का।
मैं सोचती, वृंदावन की उन माँओं की तरह, जो घर से निकाल दी गईं। सफ़ेद कपड़ों में, ठंडी ज़मीन पर बैठी भजन गातीं, हाथ फैलाकर भीख मांगतीं। उनकी आँखों में वही दर्द—अकेलापन, उपेक्षा। वो भी कभी किसी की बेटी थीं, किसी की पत्नी, किसी की माँ। क्या उन्होंने कोई अपराध किया? नहीं। बस उनका साथी चला गया, और समाज ने कहा, “अब तुम बोझ हो, अपशकुन हो। तुम्हारी हँसी बंद, तुम्हारी ज़िंदगी बंद।” बाल काट दो इनके। जूते चप्पल मत पहनने दो ।
चलो चंडीगढ़ में ये तो नहीं हुआ पर इससे कुछ कम भी नहीं था। वेस्टर्न कपड़े क्यों पहने। घर पर बैठो। बाहर मत जाओ। किसी आदमी से हंस लिया या घूमने चले गए तो उसे एक गुनाह की तरह पेश कर घर पर ही अदालत लगा ली।
बच्चे हमें दे दो और दूसरी शादी करलो ।
इससे अच्छी सलाह मैंने कभी नहीं सुनी । मैंने माना किया और अपने बच्चों के साथ ही जीने की सोची। परिवार में बहुत लोगो ने बात करनी बंद कर दी। मुझे अछूत की तरह तो कभी कैरेक्टरलेस की तरह बताया जाने लगा ।
मेरा दिल रोता जब बच्चे पूछते, “मम्मी, क्यों लोग आपको अलग रखते हैं? क्यों आप त्योहारों में नहीं नाचतीं?” मैं उन्हें गले लगाती और चुप रह जाती। लेकिन अंदर से टूटती। कितना दर्द सहती हैं हम विधवाएँ—घर से निकल दो क्यूँकि पति मार गया , रिश्तेदार मुँह फेर लें, समाज कलंक लगा दे, और ऊपर से ये यौन शोषण का डर। आँसू पोछते-पोछते मैंने फैसला किया—नहीं, मैं हार नहीं मानूँगी। बच्चों के लिए जीऊँगी, खुद के लिए जीऊँगी।
मैंने नौकरी की, संघर्ष किया, रोईं रातें अकेले काटीं। और आज… आज मेरे बच्चे मुझे देखकर कहते हैं, “माँ, तुम हमारी हीरो हो।”
मैंने सीखा कि विधवा होना दुख है, बहुत गहरा दुख। लेकिन इसे सजा बनाना, औरत को उसकी गलती समझना, उसे सेक्स ऑब्जेक्ट मानकर शोषण करना—ये सबसे बड़ा पाप है।
समाज, अब जागो। विधवा को अपशकुन मत कहो, उसे इंसान समझो। उसकी आँखों में दर्द देखो, लेकिन उसकी हिम्मत को भी सलाम करो। उसे त्योहारों में बुलाओ, उसकी हँसी को जगह दो, उसका पुनर्विवाह स्वीकार करो। वो बोझ नहीं, एक माँ है, एक बेटी है, एक औरत है—जो जीने लायक है, प्यार करने लायक है, इज्ज़त पाने लायक है।
उसकी जंजीरें तोड़ो। उसे आज़ाद करो। क्योंकि एक विधवा की मुस्कान में न सिर्फ़ उसका दर्द छिपा है, बल्कि पूरी दुनिया को बदलने की ताकत भी। बदलो ये सोच, समाज। ये तुम्हारा गुनाह है—उसे औरत की गलती समझना, उसे शोषण का शिकार बनाना बंद करो। अब और नहीं।
अब मेरी बहू है जो बेटी ज़्यादा है। उसके अधिकार मेरे बेटों से ज़्यादा है। उसने मज़बूती के साथ मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे कहा है “ माँ तुम आज़ाद हो , ऊँचा उड़ो , अपने सपने पूरा करो । हम सब तुम्हारे साथ हैं।”
“सर उठा कर जीना हमारा हक़ है। नहीं चाहिए किसी का सहारा हम तो अपने में ही काबिल हैं। ना हौंसला तोड़ो किसी मासूम का। तुम्हारा भाई और बेटा था, दामाद तुम्हारा था पर हमारा भी तो कुछ था।”


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