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कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने दिए व्यापक सुधारों के संकेत

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06 Feb 26
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कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने दिए व्यापक सुधारों के संकेत

उदयपुर: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (एमएलएसयू) के कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने एक विस्तृत, स्पष्ट और तथ्यपूर्ण संवाद में विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति, लंबित विवादों, छात्र हितों, पेंशन व्यवस्था तथा उच्च शिक्षा के भविष्य को लेकर अपनी दूरदर्शी सोच सामने रखी। जिम्मेदारी संभालने के तुरंत बाद सक्रिय निर्णय लेने की उनकी कार्यशैली ने यह संकेत दिया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अब लंबित समस्याओं के समाधान और संस्थागत मजबूती की दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।

भूमि विवादों के समाधान पर प्राथमिकता

संवाद के दौरान कुलगुरु ने विश्वविद्यालय की जमीन से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों को सबसे गंभीर मुद्दों में शामिल बताया। उन्होंने कहा कि चंपा बाग सहित अन्य संपत्ति विवादों में न्यायालय के आदेशों के पालन हेतु आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है ताकि विश्वविद्यालय की संपत्तियों की सुरक्षा हो सके। उनके अनुसार, भूमि और संसाधनों की रक्षा केवल कानूनी आवश्यकता ही नहीं बल्कि विश्वविद्यालय की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए भी अनिवार्य है।

पेंशन संकट पर राज्य स्तर समाधान की जरूरत

सेवानिवृत्त शिक्षकों और कर्मचारियों की पेंशन को कुलगुरु ने अत्यंत संवेदनशील विषय बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालय अपने सीमित संसाधनों के आधार पर लंबे समय तक पेंशन दायित्व वहन नहीं कर सकता। इस मुद्दे को राज्य स्तर पर उठाया गया है और अपेक्षा है कि सरकार विश्वविद्यालय कर्मियों की पेंशन जिम्मेदारी को उसी प्रकार स्वीकार करे जैसे राज्य कर्मचारियों के मामले में किया जाता है। साथ ही, लंबित वेतन आयोग एरियर के भुगतान की दिशा में हुई प्रगति को उन्होंने विश्वास बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

फीस, परिणाम और सेमेस्टर प्रणाली पर स्पष्टता

छात्रों में फैली फीस वृद्धि संबंधी आशंकाओं को कुलगुरु ने पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाल के वर्षों में कोई फीस वृद्धि नहीं की गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत लागू सेमेस्टर प्रणाली, सतत मूल्यांकन, कौशल विकास और व्यावहारिक शिक्षा जैसे बदलाव प्रारंभिक असहजता पैदा कर सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में यही परिवर्तन विद्यार्थियों को अधिक सक्षम, आत्मनिर्भर और रोजगारोन्मुख बनाएंगे।

उन्होंने यह भी बताया कि कई बार संबद्ध महाविद्यालयों द्वारा आंतरिक अंक या प्रायोगिक अंक समय पर न भेजने के कारण कुछ विद्यार्थियों के परिणाम रोके जाते हैं। जैसे ही आवश्यक जानकारी प्राप्त होती है, परिणाम जारी कर दिए जाते हैं। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए पुनर्मूल्यांकन, बहु-परीक्षक जांच और त्रुटि सुधार की प्रक्रियाएं सुदृढ़ की जा रही हैं।

डिजिटल शिकायत निवारण और खुला प्रशासन

प्रो. सारस्वत ने छात्र-हितैषी प्रशासन को अपनी प्राथमिकता बताया। उन्होंने कहा कि कुलगुरु कार्यालय विद्यार्थियों के लिए सदैव खुला है और समस्याओं के समाधान हेतु डिजिटल शिकायत निवारण प्रणाली भी लागू की गई है। इससे परीक्षा, प्रवेश, विभागीय कार्यवाही और अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया संभव हो रही है। प्रारंभिक तकनीकी चुनौतियों के बावजूद यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी।

उच्च शिक्षा की व्यापक चुनौतियां

कुलगुरु ने राज्य में बिना पर्याप्त संसाधनों के नए महाविद्यालय खोलने की प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षक, आधारभूत ढांचा और प्रशासनिक व्यवस्था के बिना संस्थानों का विस्तार शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संतुलित विस्तार ही दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।

कौशल, उद्यमिता और भविष्य की दिशा

संवाद के अंत में प्रो. सारस्वत ने कहा कि भारत की युवा जनसंख्या देश की सबसे बड़ी शक्ति है। विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री प्रदान करने वाली संस्थाएं न रहकर कौशल विकास, नवाचार, उद्यमिता और रोजगार सृजन के केंद्र बनना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसी दिशा में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है, जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक क्षमता और प्रतिस्पर्धी सोच विकसित कर सकें।

समग्र रूप से यह संवाद प्रशासनिक दृढ़ता, पारदर्शिता और दूरदर्शी नेतृत्व का स्पष्ट संकेत देता है। लंबित विवादों के समाधान, पेंशन व्यवस्था, छात्र समस्याओं के निवारण और शैक्षणिक सुधारों की दिशा में उठाए जा रहे कदमों से मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में सकारात्मक परिवर्तन की नई उम्मीद दिखाई दे रही है। यदि इन प्रयासों को संस्थागत सहयोग और नीतिगत समर्थन मिलता है, तो आने वाले समय में विश्वविद्यालय एक मजबूत, आधुनिक और छात्र-केंद्रित शैक्षणिक मॉडल के रूप में उभर सकता है।


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