उदयपुर | लोकनेते व्यंकटराव हिराय आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स कॉलेज, नासिक (महाराष्ट्र) द्वारा एक दिवसीय नेशनल ऑनलाइन कांफ्रेंस ऑन इंडियन नॉलेज सिस्टम इन बॉटनी: रूट्स ऑफ़ विजडम का आयोजन ज़ूम प्लेटफार्म पर सोमवार दिनांक 23 मार्च, 2026 को किया गया. प्रारम्भ में कॉलेज के प्राचार्य डॉ. बी. एस. जगदाले ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए इंडियन नॉलेज सिस्टम की अवधारणा पर उत्कृष्ट शोधकार्यों की आवश्यकता को बताया.
कांफ्रेंस के एक तकनीकी सत्र में डॉ. वर्तिका जैन, सह आचार्य, वनस्पति शास्त्र विभाग, राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान को 'भारतीय ज्ञान तंत्र में सेमल वृक्ष ' विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया.
डॉ. वर्तिका ने बहुपयोगी सेमल वृक्ष के आध्यात्मिक, व्यावसायिक, पारिस्थितिक, लोक-औषधीय तथा सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से बताते हुए कहा की सेमल वृक्ष का प्रत्येक भाग जड़, तना, पत्ती, फूल, फल. गोंद, बीज, रुई, कांटे, छाल औषधीय महत्व रखता है. विभिन्न शोध निष्कर्षों में वर्तमान में बहुप्रचलित मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों में भी इसके उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं. सेमल, प्रदर रोग, नपुंसकता, मधुमेह, दस्त-पेचिश, उदर रोग, मुहांसे आदि कई व्याधियों के उपचार में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में उपयोग लिया जाता रहा है. डॉ जैन ने बताया की इस पारम्परिक ज्ञान की पुष्टि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों में हुई है. सेमल वृक्ष से कई उपयोगी रासायनिक तत्त्व निकाले गए हैं जैसे मैंगीफेरिन, शेमिमिसिन, एपिजेनिन, कैम्प्फेरोल, बीटा-सीटोस्टेरॉल, लुपीओल इत्यादि जो विभिन्न रोगों के उपचार में औषधीय रूप से महत्वपूर्ण हैं तथा विभिन्न फार्माकॉलॉजिकल गुणों पर भी शोध कार्य हुआ है जो सेमल के विभिन्न औषधीय गुणों की पुष्टि करता है
डॉ. वर्तिका ने वर्चुअल मोड में हुए अपने व्याख्यान में कहा की सेमल एक छत्रक वृक्ष की तरह विभिन्न जीव-जंतुओं और पक्षियों को आश्रय प्रदान करता है. पंचवटी के पांच वृक्षों में शामिल देव वृक्ष सेमल धनात्मक मायक्रोवायटा को आकर्षित कर आस-पास के परिवेश को मानसाध्यात्मिक साधना के अनुकूल बनाता है तथा इसकी जड़ें पानी को रोकने में सहायक होती है. इसकी लकड़ी माचिस उद्योग, नावें, ताबूत, चम्मच, कृत्रिम पावँ इत्यादि बनाने में देश के विभिन्न राज्यों में इस्तेमाल होती है. इसकी रेशमी रुई, गद्दे-तकिए भरने के अलावा ध्वनिरोधी दीवारें, सोफे, कुशन, रजाईयां आदि भरने में काम आती है, साथ ही प्राचीन समय में दुर्ग की दीवार बनाने में भी इस्तेमाल की जाती थी. इसके बीजों से तेल निकाला जाता है और सूखे हुए फूल भी औषधीय रूप से महत्व रखते हैं. इसके अतिरिक्त विभिन्न समुदाय अपने उत्सवों, प्रथाओं, पहेलियों, लोक-गीतों इत्यादि में सेमल वृक्ष का प्रयोग करते हैं. नेजा उतारने जैसी रोचक प्रथा भी दक्षिणी राजस्थान में सेमल वृक्ष पर आधारित है परन्तु उदयपुर शहर में प्रतिवर्ष प्रह्लाद का प्रतीक मानते हुए हजारों की संख्या में होलिका-दहन हेतु औषधीय वृक्ष सेमल को जलाया जाता है जिसके सरंक्षण हेतु सोसाइटी फॉर माइक्रोवाइटा रिसर्च एंड इंटीग्रेटेड मेडिसिन (स्मरिम), उदयपुर, विगत 18 वर्षों से सेमल सरंक्षण अभियान में लगी है, इसके तहत सेमल के बीजों को एकत्र कर उनसे नए पौधे बनाना और विभिन्न स्थानों पर पौधारोपण करने के साथ ही वर्ष 2011 से लोह-स्तम्भ पर पर्यावरण-सरंक्षी होलिका दहन करने की पहल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है. डॉ. जैन ने कहा की सेमल जैसे बहुउद्देशीय वृक्ष की उपेक्षा होती रही है अतः इसे उचित सम्मान देने हेतु सोसाइटी द्वारा माघी पूर्णिमा, 16.2.2022 को सेमल दिवस पर ऑनलाइन राष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित किया गया.
इस राष्ट्रीय कांफ्रेंस में भारत के विभिन्न स्थानों से प्रबुद्धजन और शोधार्थी शामिल हुए. अंत में आयोजन समिति सदस्य डॉ प्रवीण पाटिल ने डॉ. वर्तिका को धन्यवाद ज्ञापित किया