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विश्व रंगमंच दिवस पर विशेष 

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27 Mar 26
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विश्व रंगमंच दिवस पर विशेष 

जनमत मंचक के तत्वाधान में विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर अपने विचार रखते हुए,डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि विश्व रंगमंच दिवस (World Theatre Day) हर साल 27 मार्च को मनाया जाता है। इसकी स्थापना 1961 में  lnternational Theatre Institute द्वारा की गई थी और यह दिवस पहली बार 27 मार्च 1962 को मनाया गया था।

मुख्य विवरण:

• संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (ITI), जो यूनेस्को (UNESCO) के सहयोग से काम करता है।

• उद्देश्य: रंगमंच कला के महत्व को बढ़ावा देना। सांस्कृतिक आदान-प्रदान और समाज में रंगमंच की भूमिका को रेखांकित करना।

• प्रथम संदेश: 1962 में जीन कॉक्ट्यू (Jean Cocteau) द्वारा पहला अंतर्राष्ट्रीय संदेश दिया गया था। 

यह दिन थिएटर (नाटक) के जरिए मनोरंजन, शिक्षा और सामाजिक बदलाव को बढ़ावा देने वाला उत्सव है। जो कला की इस पुरानी विधा को सम्मानित करने, रंगमंच के माध्यम से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने, मनोरंजन के साथ-साथ जागरूकता पैदा करने, सामाजिक मुद्दों पर बात करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए रंगमंच की भूमिका पर जोर देता है।

डॉ. महावर ने बताया कि भारत में रंगमंच का।  सबसे प्रारंभिक उल्लेख ऋषि भरत मुनि के लेखन में मिलता है। भरत मुनि ऋषि वाल्मीकि के समकालीन थे,  जिनका समय 5100 ईसा माना जाता है। इसका अर्थ है कि भारत में रंगमंच 7000 वर्ष पूर्व से अस्तित्व में था।

ऋषि भरत मुनि प्राचीन भारतीय रंगमंचविद् थे, जिन्होंने 36 अध्यायों वाले लोकप्रिय ग्रंथ नाट्य शास्त्र की रचना की। प्राचीन भारतीय नृत्य और संगीत इसी शास्त्र पर आधारित थे।  

नाट्य शास्त्र को केवल नृत्य ग्रंथ के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। यह कई विषयों पर चर्चा करता है।

1. नृत्य

2. नाटक

3. संगीत

4. सौंदर्यशास्र

5. स्टेज की तैयारी

6. स्टेज प्रवेश

और रंगमंच से संबंधित सभी पहलू।

भरत मुनि को आज न केवल भारत में, बल्कि विश्व भर में नाट्य कला के जनक के रूप में पूजा जाता है। 

उन्होंने आगे बताया कि महाराणा कुंभा (1433 से 1468 ई.)का रंगमंच और नाट्य कला में महत्वपूर्ण योगदान था। वे न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि संगीत, साहित्य और नाट्यशास्त्र के भी मर्मज्ञ ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित 'सूड प्रबंध' जैसे ग्रंथ और गीतगोविन्द पर टीका, उनके नाट्यकला-संबंधी ज्ञान को दर्शाते हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) को आधुनिक हिंदी रंगमंच और साहित्य का जनक माना जाता है उन्होंने 19वीं शताब्दी में हिंदी नाटकों को नई दिशा दी और रंगमंच के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक प्रमुख नाटककार, कवि और लेखक थे।

पृथ्वीराज कपूर

1906 में जन्मे पृथ्वीराज कपूर भारतीय रंगमंच और फिल्म उद्योग के अग्रदूत थे। वे लोकप्रिय अभिनेता राज कपूर के पिता थे। 1944 में, पृथ्वीराज कपूर ने पृथ्वी थिएटर्स नामक अपना थिएटर समूह शुरू किया, जिसने भारत में अनगिनत नाट्य प्रस्तुतियों को सहयोग दिया।

रंगमंच, भारतीय विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसलिए भारत में रंगमंच एक जीवंत कला रूप रहा है, जो समय के साथ और देश भर में, लोक स्तर पर, गांवों और गलियों में खेले जाने वाले नाटकों के माध्यम से, और साथ ही दरबारी स्तर पर भी अभिव्यक्ति के एक तरीके के रूप में मौजूद रहा है।

भारतीय संस्कृति में रंगमंच को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था।

रंगमंच न केवल मनोरंजन का साधन है,बल्कि जीवन जीने का एक तरीका भी है।

ग्रामीण लोग थिएटर में सक्रिय रूप से भाग लेते थे, और दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद शाम को समय बिताने का उनका यह एक आदर्श तरीका था।

लेकिन आधुनिक युग में मीडिया,सिनेमा के आगमन ने रंगमंच की कमर तोड़ दी है।

थिएटर को उसकी पुरानी शान में वापस लाने की जरूरत है यह एक  सांस्कृतिक ममनोरंजन के साथ-साथ आर्थिक स्थिति का भी जरिया है। अतः सरकार एवं समाज का इस और ध्यान आकर्षित किया जाना अति आवश्यक है ताकि हम हमारी प्राचीन विरासत रंगमंच को बचा सके।

 

    इस अवसर पर जनमत मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया कि, भारत में थिएटर, प्लेटफॉर्म और स्टेज को रंगमंच के नाम से जाना जाता है, यह शब्द अभी भी भारत में स्टेज के लिए प्रयोग में होता है।  

इस भूमि पर पुरातत्वीय खुदाई में रंगमंच के कई खंडहर खोजे गए हैं। धोलावीरा स्थित रंगभूमि का निर्माण और उपयोग 3000 ईसा पूर्व यानी लगभग 5000 वर्ष पहले हुआ था।

कालानुक्रमिक परिप्रेक्ष्य से देखने पर, यह आंकड़ा धोलावीरा की रंगभूमि को ग्रीस और रोम के प्रसिद्ध प्राचीन स्टेडियमों की तुलना में दोगुनी प्राचीन स्थिति में रखता है।

रंग का अर्थ है रंग, भूमि का अर्थ है ज़मीन और मंच का अर्थ है मंच। ये मैदान और मंच रंगों के अद्भुत धोलावीरा की खुदाई का श्रेय पुरातत्वविद आर.एस.बीष्ट को दिया जाता है।उन्होंने लिखाकि है कि-

मैदान के दो मीटर गुणा दो मीटर के एक छोटे से हिस्से में सैकड़ों गहनों के मोती बिखरे हुए पाए गए है। बिष्ट कल्पना करते हुए कहते हैं, "आप कल्पना कीजिए कि कलाकार सिर से पैर तक मोतियों से सजे बिखरे हुए हैं, स्वतंत्र रूप से नृत्य कर रहे हैं और मोती हर जगह गिर रहे हैं।"

इस रंगभूमि से प्राप्त कलाकृतियों में से एक टेराकोटा का बना थिएटर मास्क है, जिसका इस्तेमाल संभवतः कलाकारों द्वारा किया जाता था।

• जगह-जगह खूंटियों के छेद मिले है जिससे पता चलता है कि इनका इस्तेमाल प्रदर्शन के दौरान स्टॉल बनाने के लिए किया जाता था।

• रंगभूमि के चारों ओर सीढ़ियाँ खोदी गईं - जो दर्शकों के लिए बने स्टैंड के स्थान को दर्शाती हैं।

• खुदाई से पता चला कि उस समय के लोग हर साल अपनी रंगभूमि पर मिट्टी की एक नई परत चढ़ाते थे। यह मिट्टी धोलावीरा के बाहर से लाई जाती थी। मिट्टी की इस वार्षिक परत चढ़ाने से पूरे स्टेडियम और मंच को एक अनोखी ध्वनि और मधुरता मिलती थी।

• रंगभूमि  के ये सभी विवरण हमें बताते हैं कि यह कोई साधारण स्थल नहीं था, बल्कि नाट्य प्रदर्शनों की सभी सुविधाओं से सुसज्जित एक पूर्ण विकसित स्टेडियम था।

इन रंगमंचों में प्रदर्शन और खेल एक साथ प्रदर्शित किए जाते थे। सुबह के समय खेल होते थे, जबकि शाम ढलते ही रंगभूमि रंगमंच में परिवर्तित हो जाती थी।

मंच के सहायक सचिव डॉ .प्रियदर्शी ओझास ने बताया कि भूमि पर रंगमंच सर्वत्र विद्यमान था। भवन के भीतर रंगमंच होता था, खुले आसमान के नीचे रंगमंच होता था, और घर में भी रंगमंच होता था। रंगमंच की ये सभी किस्में कई सहस्राब्दियों पुरानी हैं और हजारों वर्षों से इनमें निखार आता रहा है। उस समय के साहित्य में हमें रंगमंच और रंगभूमि का उल्लेख मिलताहै।

• विश्व रंगमंच दिवस के मुख्य महत्त्व और उद्देश्य:

• सांस्कृतिक विविधता और एकता: यह रंगमंच के माध्यम से दुनिया भर के कलाकारों को एकजुट करता है और संस्कृतियों के बीच संवाद को बढ़ावा देता है।

• सामाजिक सुधार का माध्यम: रंगमंच सामाजिक समस्याओं को उजागर करने और दर्शकों की सोच को बदलने का एक सशक्त माध्यम है।

• कला और कलाकारों का सम्मान: यह रंगमंच से जुड़े सभी कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों और तकनीशियनों को सम्मानित करने का दिन है।

• मानवीय भावनाओं का चित्रण: नाटक के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों को सीधे दर्शकों तक पहुँचाया जाता है।

• जागरूकता: यह सरकारों और संस्थाओं को रंगमंच के महत्त्व और इसके आर्थिक विकास की क्षमता के प्रति जागरूक करने का अवसर है। 

विश्व रंगमंच दिवस के प्रकार (आयोजन के रूप):

• अंतर्राष्ट्रीय संदेश: इस दिन दुनिया के किसी प्रसिद्ध रंगकर्मी द्वारा रंगमंच और शांति की संस्कृति पर एक संदेश दिया जाता है।

• नाट्य प्रदर्शन: दुनिया भर में रंगशालाओं में नाटकों का मंचन किया जाता है।

• नुक्कड़ नाटक: सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए नुक्कड़ प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं।

विश्व रंगमंच दिवस का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि दर्शकों को जागरूक करना और समाज में रंगमंच की शक्ति को पुनर्स्थापित करना है। 

आज के सिनेमाघर इस कला का नवीनतम रूप मात्र हैं, जो विश्व भर में विभिन्न रूपों में प्रचलित रही है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत में रंगमंच सबसे लोकप्रिय घटकों में से एक रहा है, जो शिक्षा और मनोरंजन दोनों की जरूरतों को पूरा करता है |

 

आज आवश्यकता इस बात की हे की लुप्त होती संस्कृति एवं कलाकारों को पुनः मुख्य धारा से जोड़ा  जाये एवं पर्यटन विकास के रूप मैं एक नयी पहचान बनकर विश्व पटल पर राष्ट्र निर्माण में सहायक बने |

 

 

  मंच के सहायक सचिव विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि,भारत में नाट्य कलाओं का व्यापक और समृद्ध भंडार है। पूर्व में असम और अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में पंजाब और सिंध तक, और उत्तर में लेह और लद्दाख तक, भारत नाट्य विधाओं से समृद्ध है।

भारत में रंगमंच में नाटक, नृत्य और कठपुतली कला शामिल हैं। इस प्रकार रंगमंच एक व्यापक क्षेत्र है।

मंच की सदस्य डॉ. पूनम पठक ने बताया कि रामायण और महाभारत , अनादिकाल से नाट्य कला के रूपों में प्रयुक्त होते रहे हैं। साथ ही प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सुंदर नाट्य शैलियाँ हैं।उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

• असम में भाओना

• पश्चिम बंगाल में जात्रा

• मध्य प्रदेश में माछ

• उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में नौटंकी

• राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में स्वांग

• उत्तर प्रदेश में रास लीला

• गोवा और कोंकण में दशावतार

• केरल में थेय्यम, कृष्णट्टम और कथकली

• आंध्र प्रदेश में वैधी नाटकम

• आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में बुराकथा और हरिकथा

• कर्नाटक में यक्षगान

कालिदास को भारत में महानतम नाटककारों में से एक माना जाता है जिनके अनेक  नाटक इस देश में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। जिमम हत्वपूर्ण और प्रसिद्ध नाटक हैं: अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम्, और मालविकाग्निमित्रम्। इनमें अभिज्ञान शाकुन्तलम्' को उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है, जो राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी पर आधारित है। ये नाटक संस्कृत साहित्य में अपनी भावनात्मक गहराई और काव्य शैली के लिए जाने जाते हैं।

कालिदास के प्रमुख नाटक:

• अभिज्ञान शाकुन्तलम्: यह नाटक राजा दुष्यंत और ऋषि पुत्री शकुंतला के प्रेम, विवाह, विछोह और पुनर्मिलन की कहानी है, जिसे विश्व साहित्य में स्थान प्राप्त है।

• विक्रमोर्वशीयम्: इस नाटक में राजा पुरूरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेम कथा का वर्णन है।

• मालविकाग्निमित्रम्: यह कालिदास का पहला नाटक माना जाता है, जिसमें राजा अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कहानी वर्णित है।

इन नाटकों के अलावा, कालिदास ने 'रघुवंशम्' और 'कुमारसंभवम्' महाकाव्य तथा 'मेघदूतम्' और 'ऋतुसंहारम्' खंडकाव्य भी लिखे हैं।  

मंच के कोषाध्यक्ष विशाल माथुर ने बताया कि, राजा हरिश्चंद की कहानी है, जिसे बाणभट्ट ने लिखा था और जिसका उपयोग नाट्य रूपों में किया गया है। तंजौर के तेलुगु कवि त्यागराज ने थिएटर के लिए प्रहलाद भक्ति विजयम लिखा।

दक्षिण में, इलंगो ने दो नाटक लिखे हैं, जिन्हें थिएटर के लिए रूपांतरित किया गया है, जिनका नाम है थलपथी मरम और मणिमेगलाई। साथ ही बौद्ध जातक कथाएँ बौद्ध परंपराओं की लोकप्रिय कहानियाँ हैं। सदियों से इन कहानियों को नाट्य रूपों में भी प्रस्तुत किया जाता रहा है। विश्व रंगमंच दिवस के अंत में माथुर ने बताया कि रंगमंच केवल कला ही नहीं , बल्कि समाज का दर्पण है। हमे रंगमंच की साधना का सम्मान करने और इससे मिलने वाली सामाजिक जागरूकता की सीख को जीवन में उतारने का संकल्प लेना चाहिए ।

हम सभी जीवन रूपी मंच पर अपनी भूमिकाएँ  निभा रहे हैं, और यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कितनी ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाते हैं।

रंगमंच को उसके उस गौरवशाली अतीत में पुन: लाने की आवश्यकता है।


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