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दोगली राजनीति : लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा

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12 Jul 26
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दोगली राजनीति : लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा

लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है, बल्कि यह विश्वास, जवाबदेही और जनसेवा की भावना पर आधारित एक व्यवस्था है। जब राजनीतिक दल और नेता जनता के सामने एक बात कहें और व्यवहार में दूसरी करें, तब उसे सामान्यतः "दोगली राजनीति" कहा जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है और जनता के विश्वास को आघात पहुंचाती है।

भारत में लगभग 97 करोड़ से अधिक मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। चुनावों के दौरान राजनीतिक दल रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई नियंत्रण और विकास के अनेक वादे करते हैं। किंतु कई बार चुनाव समाप्त होने के बाद इन वादों को पूरा करने की गति धीमी पड़ जाती है या वे पूरी तरह भुला दिए जाते हैं। यही स्थिति जनता के मन में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा करती है।

दोगली राजनीति का सबसे सामान्य उदाहरण तब देखने को मिलता है जब कोई राजनीतिक दल विपक्ष में रहते हुए किसी नीति, योजना या कानून का तीव्र विरोध करता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसी नीति को जारी रखता है या उसका समर्थन करने लगता है। लोकतंत्र में नीति परिवर्तन गलत नहीं है, परंतु बिना स्पष्ट कारण और बिना जनता को विश्वास में लिए हुए विचार बदलना राजनीतिक अवसरवाद का संकेत माना जाता है।

एक अन्य उदाहरण भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देखा जा सकता है। जब किसी विरोधी दल का नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरता है तो उसके खिलाफ तीखी बयानबाजी की जाती है, लेकिन यदि वही व्यक्ति किसी अन्य दल में शामिल हो जाए तो उसके प्रति दृष्टिकोण अचानक बदल जाता है। जनता अक्सर ऐसे घटनाक्रमों को देखकर यह प्रश्न पूछती है कि क्या नैतिकता केवल विरोधियों के लिए है?

दोगली राजनीति का प्रभाव केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर समाज पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, चुनावों के समय सामाजिक एकता, भाईचारे और विकास की बातें की जाती हैं, लेकिन कई बार वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने का प्रयास भी किया जाता है। इससे सामाजिक सौहार्द कमजोर होता है और आपसी विश्वास में कमी आती है।

आज सोशल मीडिया ने राजनीतिक दावों और वास्तविकताओं के बीच के अंतर को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले नेताओं के पुराने भाषणों और बयानों को याद रखना कठिन होता था, लेकिन अब कुछ ही क्षणों में वर्षों पुराने वीडियो और वक्तव्य सामने आ जाते हैं। इससे जनता राजनीतिक कथनों और कार्यों की तुलना आसानी से कर सकती है।

दोगली राजनीति का एक और उदाहरण दल-बदल की संस्कृति है। चुनावों के दौरान एक नेता किसी दल की विचारधारा को सर्वश्रेष्ठ बताता है और प्रतिद्वंद्वी दल की तीखी आलोचना करता है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बदलते ही वही नेता दूसरे दल में शामिल होकर उसी विचारधारा की प्रशंसा करने लगता है, जिसकी वह कल तक आलोचना कर रहा था। ऐसे घटनाक्रम मतदाताओं के मन में भ्रम उत्पन्न करते हैं।

यह भी एक तथ्य है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास घटने से मतदान प्रतिशत और नागरिक सहभागिता प्रभावित हो सकती है। जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि नेता केवल चुनावी लाभ के लिए वादे करते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठने लगते हैं। इसलिए राजनीतिक ईमानदारी केवल नैतिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्थिरता के लिए भी अनिवार्य है।

हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी राजनीति ही दोगलेपन से ग्रस्त है। देश में अनेक जनप्रतिनिधि ऐसे भी हैं जो अपने वादों को निभाने, जनता से संवाद बनाए रखने और विकास कार्यों को प्राथमिकता देने का ईमानदार प्रयास करते हैं। ऐसे नेताओं के कारण ही लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास बना हुआ है।

दोगली राजनीति पर अंकुश लगाने में जागरूक मतदाताओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। नागरिकों को केवल भाषणों और नारों के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के पिछले कार्यों, सार्वजनिक जीवन की पारदर्शिता और जनहित के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता सबसे बड़ी शक्ति है और वही राजनीतिक संस्कृति को दिशा दे सकता है।

मीडिया, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों में तथ्यपरक सोच और राजनीतिक जागरूकता विकसित करें। यदि जनता प्रश्न पूछना शुरू कर दे और नेताओं से उनके वादों का हिसाब मांगे, तो राजनीतिक दलों को भी अधिक जिम्मेदार बनना पड़ेगा।

निष्कर्ष
दोगली राजनीति लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह जनता के विश्वास को कमजोर करती है और राजनीतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाती है। आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति में कथनी और करनी के बीच सामंजस्य हो, जनप्रतिनिधि अपने वादों के प्रति जवाबदेह रहें और नागरिक सजग होकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लें। जब राजनीति सिद्धांत, सेवा और पारदर्शिता पर आधारित होगी, तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत और जनहितकारी बन सकेगा।


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