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चंपाबाग भूमि अवाप्ति प्रक्रिया पुनः प्रारंभ, उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका का निस्तारण

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16 Jul 26
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चंपाबाग भूमि अवाप्ति प्रक्रिया पुनः प्रारंभ, उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका का निस्तारण

उदयपुर,  लगभग 43 वर्षों से लंबित मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की चंपाबाग भूमि अवाप्ति प्रक्रिया में गुरुवार को महत्वपूर्ण कानूनी प्रगति हुई। राजस्थान उच्च न्यायालय में विश्वविद्यालय द्वारा दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान यह तथ्य न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड पर आया कि माननीय उच्च न्यायालय के 30 मई 2024 के निर्णय की अनुपालना में राज्य सरकार द्वारा भूमि अवाप्ति अधिनियम, 1894 की धारा 5-ए के अंतर्गत नई कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है तथा भूमि अवाप्ति अधिकारी एवं तहसीलदार, गिरवा द्वारा संबंधित खातेदारों को धारा 5-ए के नोटिस जारी कर दिए गए है। इस तथ्य को न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड पर लिए जाने के पश्चात अवमानना याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
43 वर्ष पुराना है मामला
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विस्तार एवं भविष्य की विकास योजनाओं के लिए वर्ष 1981 में चंपाबाग क्षेत्र की भूमि की अवाप्ति प्रक्रिया प्रारंभ की गई थी। प्रारंभिक वैधानिक कार्यवाही के बाद विभिन्न न्यायिक वादों तथा अंतरिम स्थगन आदेशों के कारण यह प्रक्रिया लगभग चार दशकों तक लंबित रही।
राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 30 मई 2024 को पारित अपने निर्णय में एकलपीठ के आदेश को सिद्धांततः बरकरार रखते हुए निर्देश दिया कि प्रभावित खातेदारों को धारा 5-ए के अंतर्गत पुनः आपत्तियाँ प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए तथा संपूर्ण भूमि अवाप्ति की कार्यवाही भूमि अवाप्ति अधिनियम, 1894 के प्रावधानों के अनुसार पूरी की जाए ।
क्यो आवश्यकता पड़ी अवमानना याचिका दर्ज कराने की ?
राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 30 मई 2024 को पारित निर्णय को लगभग 2 वर्ष बीत जाने तथा सुखाड़िया विश्वविद्यालय द्वारा अवाप्ति प्रक्रिया प्रारम्भ करने हेतु लगातार पत्राचार करने के पश्चात् भी भूमि  अवाप्ति अधिनियम, 1894 के प्रावधानों के तहत अवाप्ति प्रक्रिया प्रारंभ नहीं होने की स्थिति में माननीय न्यायालय के आदेश की अवहेलना होने पर अवमानना याचिका संख्या 685/2026 सुखाड़िया विश्वविद्यालय द्वारा दर्ज करवानी पड़ी 
धारा 5-ए क्यों है महत्वपूर्ण?
भूमि अवाप्ति अधिनियम, 1894 की धारा 5-ए के अंतर्गत प्रभावित खातेदारों को प्रस्तावित भूमि अवाप्ति के संबंध में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। सक्षम अधिकारी इन आपत्तियों की सुनवाई कर अपनी अनुशंसा सहित रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजता है, जिसके आधार पर भूमि अवाप्ति की आगे की वैधानिक प्रक्रिया संचालित की जाती है।
*वर्ष 2007 में  धारा 5-ए की कार्यवाही के तहत खारिज हो चुकी है आपत्तिया *
माननीय एकलपीठ के वर्ष 2007 के आदेश की अनुपालना में भूमि अवाप्ति अधिकारी एवं तहसीलदार, गिरवा द्वारा धारा 5-ए के अंतर्गत विस्तृत सुनवाई की गई थी। उस समय संबंधित सभी खातेदारों की आपत्तियों पर विचार कर आपत्तियों को खारिज किया जा चुका है  तथा भूमि अवाप्ति अधिकारी  द्वारा अपनी रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के पक्ष में भूमि अवाप्ति की कार्यवाही आगे बढ़ाने की अनुशंसा राज्य सरकार को की जा चुकी है। 
बाद में उक्त आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अपीलों में वर्ष 2008 में अंतरिम स्थगन आदेश पारित होने के कारण भूमि अवाप्ति की प्रक्रिया पुनः रुक गई और अंतिम निर्णय आने तक मामला न्यायालय में लंबित रहा।
स्थगन अवधि में हुए अतिक्रमण
विश्वविद्यालय का कहना है कि न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम स्थगन आदेश के दौरान संबंधित भूमि पर व्यापक स्तर पर अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण हुए। इस अवधि में अनेक आवासीय भवन, रिसोर्ट , वाटिकाएँ तथा अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हो गए।स्थगन के दौरान उक्त भूमि पर प्लॉट्स की रजिस्ट्रिया भी की गई तथा निर्माण स्वीकृती भी प्रदान की गई । साथ ही प्रशासन द्वारा विद्युत, पेयजल, सड़क एवं अन्य आधारभूत सुविधाएँ भी उपलब्ध करा दी गईं।
विश्वविद्यालय का यह भी पक्ष रहा है कि न्यायालय का स्थगन आदेश दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू था और उसकी अवधि में किसी प्रकार का नया निर्माण या अतिक्रमण नहीं होना चाहिए था। विश्वविद्यालय ने समय-समय पर जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार को पत्र लिखकर इन गतिविधियों पर रोक लगाने तथा आवश्यक कार्रवाई का आग्रह भी किया।
अब आगे क्या होगा?
अवमानना याचिका के निस्तारण के साथ अब उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार धारा 5-ए की नई कार्यवाही आगे बढ़ेगी। संबंधित खातेदारों की आपत्तियों की सुनवाई के बाद सक्षम अधिकारी अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा, जिसके आधार पर भूमि अवाप्ति की आगामी वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
लगभग 43 वर्षों से लंबित यह प्रकरण अब पुनः विधिसम्मत प्रक्रिया में आगे बढ़ने लगा है। विश्वविद्यालय के लिए इसे एक महत्वपूर्ण कानूनी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से रुकी भूमि अवाप्ति प्रक्रिया को फिर से गति मिली है और विश्वविद्यालय के विस्तार एवं भविष्य की विकास योजनाओं के लिए रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है।
प्रकरण में विश्वविद्यालय की ओर से पैरवी
इस प्रकरण में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की ओर से राजस्थान उच्च न्यायालय में अधिवक्ता श्री अंकुर माथुर ने पैरवी की


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