जैसलमेर। पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय जनभावनाओं का सम्मान करते हुए राज्य सरकार ने जैसलमेर जिले के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए ओरण भूमि के आरक्षण हेतु महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
संरक्षण और आस्था का संगम
ओरण प्राचीन काल से चली आ रही एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं के कारण स्थानीय लोग इन पवित्र उपवनों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन क्षेत्रों में पेड़ों को काटना या कुल्हाड़ी का उपयोग करना वर्जित है, जिससे यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र स्वतः ही सुरक्षित रहता है।
राज्य सरकार द्वारा जैसलमेर जिले के विभिन्न गांवों में ओरण के लिए कुल 22648.12 बीघा (3666.2139) हैक्टेयर भूमि आरक्षित की गई है, जिसमें रामगढ़ तहसील के ग्राम दिलावर का गांव में 771.18 बीघा भूमि (124.9502 हैक्टेयर), कुछड़ी ग्राम में 6701.11 बीघा भूमि (1084.8043 हैक्टेयर) और पूनमनगर ग्राम में 3607.14 बीघा भूमि (583.9876 हैक्टेयर), फतेहगढ़ तहसील के ग्राम भीमसर में 5882.16 बीघा भूमि (952.2752 हैक्टेयर) और बींजोता में 1583.1 बीघा भूमि (256.2511 हैक्टेयर) भूमि ओरण क्षेत्र के लिए आरक्षित की गई है। । जैसलमेर तहसील के ग्राम मोकला के तीन खण्डों में क्रमशः 1583.1 बीघा भूमि (187.364, 256.2511) और 1565.9 बीघा भूमि (253.4034 हैक्टेयर) तथा बीरमा काणोद 780.18 बीघा भूमि (126.4065 हैक्टेयर) भूमि आरक्षित की जा चुकी है।
इसके अतिरिक्त जैसलमेर तहसील के ग्राम मोकला में 9003.18 बीघा भूमि (1457.4991 हैक्टेयर), नाचना तहसील के ग्राम आसकन्द्रा में बीघा भूमि 1350.18 बीघा भूमि(225.03 हैक्टेयर) एवं ग्राम दिधू में 1417.16 बीघा भूमि (229.5067 हैक्टेयर), ग्राम मोहनगढ़ बारानी/पन्नोधराय में 2062.16 बीघा भूमि (333.9165 हैक्टेयर) क्षेत्रों को भी ओरण के रूप में आरक्षित करने की कार्यवाही की जा रही है।
‘ओरण‘ जो संस्कृत शब्द ‘अरण्य‘ से बना है और जिसका अर्थ ‘बिना छेड़ा हुआ जंगल‘ होता है। यह न केवल हमारी प्राचीन धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है बल्कि मरुस्थलीकरण को रोकने में भी सहायक है।
यह पहल न केवल जैसलमेर के पारंपरिक आस्था स्थलों का संवर्धन करेगी बल्कि मरुस्थलीय क्षेत्र में हरियाली और जैव विविधता को भी नई मजबूती प्रदान करेगी।