जैसलमेर। थार हेरिटेज म्यूजियम, जैसलमेर के संस्थापक लक्ष्मीनारायण खत्री की पुस्तक ‘जैसलमेर की सांस्कृतिक सुरम’ प्रकाशित हुई है।
उल्लेखनीय है कि 128 पृष्ठों की इस पुस्तक में मरु क्षेत्र जैसलमेर के इतिहास, लोक संस्कृति, विरासत, जनजीवन एवं स्थापत्य कला पर आधारित 37 शोधपरक लेख प्रकाशित किए गए हैं।
पुस्तक के प्रथम लेख में घुमंतू जोगी जाति के रहन-सहन एवं रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है। दूसरे लेख में टोने-टोटकों में उलझी जोगी जाति के कष्टमय जीवन की गाथा प्रस्तुत की गई है। इसी प्रकार ‘लोक देवता क्षेत्रपाल’ लेख में बड़ा बाग स्थित मंदिर से जुड़ी लोक आस्था का उल्लेख है। ‘दीपावली पर मरु महिलाओं का सृजन’ लेख में जैसलमेर की महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों एवं आंगनों में बनाए जाने वाले मांडणों का कलात्मक चित्रण किया गया है।
‘जैसलमेर की शाही गवर’ में स्थानीय राजघराने द्वारा मनाए जाने वाले गणगौर पर्व का वर्णन है। ‘परंपरागत लोक हस्तशिल्प’ लेख में स्थानीय जातियों द्वारा निर्मित उत्कृष्ट शिल्पकला का विवरण प्रस्तुत किया गया है। ‘मरु लोक संस्कृति और पर्यटन’ में ग्रामीण लोक संस्कृति के महत्व को स्पष्ट करते हुए उसे पर्यटन व्यवसाय से जोड़ने के नवाचारों पर प्रकाश डाला गया है।
इसी प्रकार ‘विरासत के खजाने को बचाएँ’ लेख में जैसलमेर के प्राचीन शिल्प-सौंदर्य, किलों एवं शिलालेखों का वर्णन करते हुए उनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। ‘मूर्ति खंडन क्यों?’ में मूर्तिकला का महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
एक अन्य लेख में राजस्थान की नारियों की वेशभूषा, आभूषण एवं श्रृंगार का सुंदर वर्णन किया गया है। ‘मूमल की मेड़ी’ लेख में मूमल-महेंद्र के अमर प्रेम की लोककथा का वर्णन है। एक लेख प्राचीन लोद्रवा पर आधारित है। ‘अनूठी है एक वेश्या की पोल’ में जैसलमेर की इतिहास-प्रसिद्ध वेश्या टीलों की सूझबूझ एवं संघर्ष से निर्मित पोल की सच्ची कहानी प्रस्तुत की गई है। इसी प्रकार एक लेख जैसलमेर के महारावल श्री बृजराज सिंहजी के विवाह पर आधारित है।
पुस्तक में ‘जैसलमेर के लक्ष्मीनाथजी’, ‘न जाने कहाँ खो गया जैसलमेर का ऐतिहासिक परकोटा’, ‘जैसलमेर की आजादी की क्रांति’, ‘जैसलमेर का स्वर्ण युग’, ‘शिल्प कला’, ‘लोकप्रिय महाराज जवाहर सिंह’, ‘पालीवालों की संपन्नता एवं स्वाभिमान की मिसाल’, ‘इतिहासकार माहेश्वरीजी’, ‘कवि श्याम सुंदर श्रीपत’ तथा ‘चित्रकार लक्ष्मण गोयल’ जैसे विषयों के माध्यम से लोक-सांस्कृतिक जीवन एवं उनके योगदान को स्मरण किया गया है।
अन्य लेखों में ‘दीपावली पर पूजी जाने वाली हटड़ी’, ‘जैसलमेर के जैन मंदिरों में नारी सौंदर्य’ तथा ‘पहचान करें पगड़ी’ जैसे लोक-सांस्कृतिक विषयों को शामिल किया गया है।
उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक की भूमिका जैसलमेर के पूर्व जिला कलेक्टर एवं विद्वान डॉ. कृष्णकांत पाठक ने लिखी है। पुस्तक में आकर्षक श्वेत-श्याम (ब्लैक एंड व्हाइट) छायाचित्र भी प्रकाशित किए गए हैं।