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1857 की क्रान्ति और कोटा का कब्र विवाद ; तथ्य - कथ्य

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10 Apr 26
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1857 की क्रान्ति और कोटा का कब्र विवाद ; तथ्य - कथ्य

प्रो. बी.के. शर्मा
इतिहासकार, जयपुर

कोटा की 1857 की क्रान्ति का राजस्थान में ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान है? कोटा में क्रान्ति तब हुई जब सम्पूर्ण भारत में क्रान्ति का दमन कर अंग्रेजों की सत्ता पुनर्स्थापित हो चुकी थी! कोटा क्रांति में सेना और आम जनता ने भी अपनी भागीदारी बखूबी निभाई? कोटा राज्य पर छः माह तक क्रांतिकारियों का शासन रहा जहां कोटा अंग्रेजों की सत्ता से पूर्णतः मुक्त हुआ वहीं कोटा महाराव अपने गढ़ में क्रांतिकारियों का बन्दी बनकर रह गया?
तत्कालीन राजपूताना की रियासतों ने क्रांति के दमन में अंग्रेजों का सहयोग और समर्थन ही नहीं किया बल्कि सक्रिय साथ दिया? यह कलंक हमेशा इतिहास में दिखता रहेगा! इतिहासकारों का मानना है कि यदि राजपूताना और पंजाब की रियासतें 1857 की क्रान्ति का सहयोग और समर्थन करतीं तो भारत तभी आज़ाद हो गया होता!!?
कोटा के क्रांतिकारियों के बहादुराना कृत्य को उजागर करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया और अभी भी इसकी दरकार है कि कोटा में क्रान्ति का स्मारक और क्रांतिकारियों के नेताओं की प्रतिमा स्थापित की जातीं? क्रांति और क्रांतिकारियों के योगदान को चिरस्थाई बनाने के लिए कोई पनोरमा बनाया जाता?
अंग्रेजों के नस्लीय दम्भ और भारतीयों के साथ किए गए भेदभाव, दुर्व्यवहार और अत्याचारों का प्रतिकार करते हुए   क्रांतिकारियों ने कोटा रेजिडेंसी पर आक्रमण कर के तत्कालीन ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर बर्टन को उसके दो पुत्रों के साथ मौत के घाट उतार दिया!! उस समय रेजिडेंसी में उपस्थित दो डॉक्टर भी मारे गए। कोटा में मेजर बर्टन की कब्र पर लगी पट्टिका विवाद का विषय बनी हुई है?
इस विवाद पर विचार करने के पूर्व कोटा क्रांति की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम पर संक्षिप्त विवरण देना उपयुक्त होगा। कोटा राज्य की सेना को लेकर मेजर बर्टन नीमच की ब्रिटिश छावनी में हुई क्रांति का दमन करने गया था। उस दौरान बर्टन के व्यवहार से कोटा के सैनिक नाराज़ थे? जब नीमच में शान्ति स्थापित हो गई तो कोटा की सेना को वापस कोटा भेज दिया गया और बर्टन वहां रुक गया। कोटा के सैनिकों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था और उनमें क्रांति की भावना का तीव्र प्रसार हो रहा था? 12 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन कोटा अपने दो बड़े पुत्रों के साथ कोटा आया जबकि अपनी पत्नी, बेटी और दो छोटे पुत्रों को नीमच में ही छोड़ दिया क्योंकि उसे आशंका थी कि कोई वारदात उसके साथ हो सकती है? कोटा महाराव ने बर्टन का विजेता की तरह भव्य स्वागत किया और 13 अक्टूबर को महाराव स्वयं बर्टन से मिलने रेजिडेंसी गए । उसी दिन भारत में क्रांति के दमन और  ब्रिटिश सत्ता पुनर्स्थापित होने की खुशी में कोटा में तोपें दागी गईं और उत्सव मनाया गया जिससे क्रांतिकारी और उद्वेलित हो गए?14 अक्टूबर को मेजर बर्टन ने गढ़ पैलेस जाकर महाराव से भेंट की तथा उसने कोटा महाराव को कोटा के सैनिकों और अधिकारियों की शिकायत करते हुए कुछ को फौज़ से बर्खास्त करने की सिफारिश की! जब यह जानकारी सेना के पास पहुंची तो उन्होंने विद्रोह  की योजना को मूर्त रूप देने का दृढ़ निश्चय कर लिया?
15 अक्टूबर को कोटा में धनतेरस के त्यौहार की हल चल थी। उसी दिन सांय काल में संभवतः 6 बजे के आस पास सैनिकों ने महाराव और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए विद्रोह कर दिया और क्रांति का बिगुल बजा दिया। विद्रोही सैनिक जुलूस बनाकर आगे बढ़े और उन्होंने रेजिडेंसी को घेर लिया जहां बर्टन और उसके पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया। बर्टन का सिर काटकर शहर में घुमाया गया तथा क्रांतिकारियों ने गढ़ पैलेस को घेर लिया और किसी की भी अन्दर और बाहर आवाजाही को रोक दिया! महाराव गढ़ में ही बन्दी बनकर रह गए? लगभग छः माह तक कोटा राज्य महाराव और अंग्रेजी नियंत्रण से स्वतंत्र रहा? प्रारम्भ में क्रान्तिकारी अंग्रेजों के खिलाफ थे और महाराव के प्रति उनके मन में कोई कटुता और बैर नहीं था किन्तु जब महाराव क्रांति के विरुद्ध अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करने की कोशिश करने लगे तो वे महाराव के विरुद्ध भी हो गए। महाराव समर्थक जागीरदार और राजपूत समुदाय के लोग महाराव के पक्ष में संगठित होने लगे तो क्रांतिकारियों और महाराव समर्थकों में खुली लड़ाई छिड़ गई जिसने संग्राम का रूप धारण कर लिया! महाराव पक्ष के कमज़ोर साबित होने की स्थिति में महाराव और क्रांतिकारियों के बीच फ़रवरी1858 के अंत में मथुराधीश मन्दिर के मंहत(गुसाईं )की मध्यस्थता में युद्ध विराम की संधि हो गई! यथा स्थिति बनाए रखने और एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करने का करार हुआ? किंतु क्रांतिकारियों के साथ धोखा करते हुए रात्रि काल में गढ़ पैलेस में पिछले दरवाजे से चम्बल पार करवा कर करौली के महाराज मदनपाल (कोटा महाराव के नज़दीकी रिश्तेदार) को सेना सहित गढ़ में घुसा लिया? इसी बीच राजपूताना के ए जी जी जॉर्ज लारेंस ने कोटा क्रान्ति के दमन के लिए बॉम्बे से फ़ौज बुलवा ली? करौली की सेना क्रांतिकारियों से मुकाबला करने लगी और इसी बीच मेजर जनरल एच जी रॉबर्ट्स ने कोटा क्रांतिकारियों पर मार्च,1858 में आक्रमण कर दिया और अंततः क्रान्ति को बेरहमी से कुचलते हुए 30 मार्च 1858 को कोटा पर अंग्रेजों और महाराव का पुनः अधिकार स्थापित हो गया?
 20 अप्रैल 1858 को क्रांतिकारियों के नेताओं क्रमशः  जयदयाल, मेहराब खां और नबी शेर खां को रेजिडेंसी के पास नीम के पेड़ों पर लटका कर सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई! दुर्भाग्यवश आज तक इन क्रांतिकारियों की स्मृति को चिरस्थाईएवं अक्षुण्ण बनाने का कोई प्रयास समाज और सरकार की ओर से नहीं हुआ है?
अब हम बात करते हैं मेजर बर्टन की कब्र पर हाल ही पैदा हुए विवाद पर?6, मार्च 2026 को एक दैनिक समाचार पत्र के स्थानीय संस्करण में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें बताया गया कि कोटा में 1857 की क्रान्ति के समय क्रांतिकारियों का निशाना बने कोटा के ब्रिटिश रेजिडेंट की कब्र पर लगी पट्टिका में क्रांतिकारियों को बर्बर और रक्तपिपासु कहा गया है जो क्रांतिकारीयों का अपमान है। कब्र पर 169 वर्ष पहले से यह अपमान जनक लिखी गई भाषा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया?अतः इस पट्टिका को हटवाया जाय क्योंकि यह अपमानजनक है? इसी के साथ अनेक संगठन और नागरिक आंदोलन पर उतर आए?
 इस कब्र पर पर लगी पट्टिका की भाषा से कोई भारतीय सहमत नहीं हो सकता क्योंकि यह वास्तव में अपमान जनक है? किन्तु तत्कालीन सत्ता अर्थात महाराव और अंग्रेजों की मिली जुली सरकार से क्या अपेक्षा हो सकती थी?उनके लिए क्रांतिकारी अपराधी थे जिन्हें सजा भी दी गई अपराधी करार देकर? किन्तु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर है और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य भी! अतः इसको अविचल रूप में सुरक्षित और संरक्षित किया जाना अपेक्षित है? यह हमारे क्रांतिकारियों की वीरतापूर्ण कार्य का ऐतिहासिक साक्ष्य है? मैं एक इतिहासकार होने के नाते इसकी पट्टिका बदलने, कब्र को हटाने या कोई क्षति पहुंचाने को उचित नहीं मानता बल्कि वहां कोटा के क्रांतिकारियों का महिमामंडन करते हुए विशाल शिलालेख लगवाया जाय? क्रांतिकारियों के दाह स्थल और कब्रों पर श्रृद्धांजलि स्वरूप स्मारक बनवाए जा सकते हैं? आहुवा में 1857की क्रांति के स्मारक के रूप में 18 मार्च 2018 को एक पैनोरमा बनवाया गया है और वहां के क्रांति के नेता ठाकुर कुशल सिंह जी की आदम कद प्रतिमा स्थापित की गई है। उसी तर्ज़ पर कोटा में भी क्रांति का स्मारक बनाया जा सकता है कोटा की क्रांति का कोई संस्थान अथवा ट्रस्ट बनाया जा सकता है जो क्रांतिकारियों के बलिदान दिवस पर आयोजन करता रहे!
अब अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि भारत के क्रांतिकारियों जैसे भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खान, रोशन सिंह, खुदीराम बोस आदि को हत्यारे, लुटेरे, आतंकी, राजद्रोही आदि करार देकर फांसी पर लटकाया, अनेक को कालेपानी की सजा, आजीवन कारावास, कारावास की सज़ा आदि दी गईं? इनके मुकदमों पर हजारों हजार पृष्ठ लिखे गए हैं जो अभिलेखागारों में सुरक्षित रखे गए हैं ? अब यदि कोई कहे कि इन दस्तावेजों में क्रांतिकारियों के लिए अपमानजनक भाषा लिखी गई है इसलिए इनको नष्ट कर दिया जाए तो यह राष्ट्रीय अपराध होगा! हम अपने इतिहास को स्वयं नष्ट नहीं कर सकते? आम जनता, पत्रकार, राजनीतिज्ञ इनका महत्व नहीं समझते किन्तु पढ़े लिखे बुद्धिजीवी, लेखक और खास तौर पर  इतिहासकार ही इनके ऐतिहासिक महत्व को समझ सकते हैं। ऐतिहासिक साक्ष्य किसी भी रूप में हों वे पवित्र होते हैं? उनको नष्ट करना राष्ट्रीय अपराध है!?
राजस्थान के क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी, केशरी सिंह बारहठ, गोपाल सिंह खरवा आदि को काले पानी की सजा अपराधी के रूप में ही दी गई थी नाकि क्रांतिकारी करार देकर! इनके मुकदमों के दस्तावेज भी सुरक्षित हैं?तत्कालीन सत्ता का विरोध करने वाले सत्ता की नजरों में अपराधी थे किन्तु आम जनता के लिए वे सम्मानजनक हैं?


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