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प्राकृतिक खेती - वर्तमान समय की आवश्यकता -डॉ. शर्मा

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23 Jan 26
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प्राकृतिक खेती - वर्तमान समय की आवश्यकता -डॉ. शर्मा

 

उदयपुर,  महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के द्वारा आयोजित एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा स्वीकृत प्राकृतिक खेती में नवीनतम तकनीकें एवं नवाचार का 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण (03 जनवरी से 23 जनवरी 2026 तक) के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए डॉ. शांति कुमार शर्मा, सहायक महानिदेशक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली ने बताया कि पिछले पचास वर्षो में हमारे देश की मिट्टी में नत्रजन, फाॅस्फोरस, सल्फर, जिंक तथा लोहे की कमी हुई है, जो यह बताता है कि हमें वर्तमान कृषि पद्धति को बदलना होगा। इसके लिए प्राकृतिक खेती का विकल्प न केवल ग्रीन फूड के लिए उपयुक्त है, अपितु बदलते जलवायु, पानी की कमी तथा कृषि में आदानों की बढ़ती लागतों के कारण इस शताब्दी में हमें प्राकृतिक कृषि को अपनाना होगा।
डॉ. शर्मा ने बताया कि प्रधानमंत्री का विजन 2047 में भारत वर्ष को प्राकृतिक खेती का वैश्विक हब बनाने के लिए अध्ययन, अनुसंधान एवं प्रसार द्वारा व्यापक स्तर पर अपनाना होगा। आज हमारे देश में 375 लाख हैक्टेयर में किसान प्राकृतिक खेती कर रहे हैं जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है। रसायन मुक्त अनाज, दलहन, तिलहन, फल, सब्जी, शहद, मशरूम आदि की विश्व बाजार में मांग है। अतः प्राकृतिक कृषि की किसानों को सही जानकारी पहुँचाना आवश्यक है। डॉ. शर्मा ने प्राकृतिक खेती प्रमाणीकरण हेतु हिमाचल प्रदेश का सितारा तंत्र एवं पीजीएस तंत्र के सरल रूप के बारे में जानकारी दी। हमें प्राकृतिक कृषि में जैव-विविधता, पशुपालन तथा जल एवं मृदा संरक्षण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए तभी हम देश के संसाधनों को बचा सकते है।
डॉ. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान एवं कोर्स डायरेक्टर ने अतिथियों का स्वागत किया । डॉ. वर्मा ने बताया कि यह 21 दिवसीय प्रशिक्षण वैज्ञानिकों के लिए प्राकृतिक खेती के विभिन्न घटकों पर चिंतन, मनन एवं विश्लेषण के लिए एक मंच के रूप में सहायक सिद्ध हुआ। जिसमें वैज्ञानिक ज्ञान एवं विचारों का आदान-प्रदान किया। वर्तमान परिस्थिति में प्राकृतिक खेती के समक्ष मानव स्वास्थ्य सुधार, प्रर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ लाभप्रदता एक बडी चुनौती है।
पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. रविकांत शर्मा ने प्रशिक्षणार्थीयों को दिये गये प्रशिक्षण का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। डॉ. शर्मा ने बताया कि पूरे प्रशिक्षण में 41 सैद्धान्तिक व्याख्यान, 7 प्रयोग प्रशिक्षण एवं 6 प्रशिक्षण भ्रमणों द्वारा प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया। प्राकृतिक खेती पर सुदृढ़ साहित्य विकसित कर प्रतिभागियों को उपलब्ध कराया गया। इस प्रशिक्षण में 6 राज्यों (गुजरात, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब एवं झारखण्ड) के विभिन्न संस्थानों के 27 वैज्ञानिकों ने भाग लिया।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों द्वारा बारानी कृषि अनुसंधान केन्द्र, भीलवाडा, शिवम जैविक कृषि फार्म, भीलवाड़ा, त्रिपाठी प्राकृतिक एवं जैविक केन्द्र, बनेडा, शाश्वत यौगिक खेती केन्द्र, माउण्ट आबु, जलग्रहण क्षेत्र, पीपलांत्री तथा विभिन्न प्रयोगशालाओं का भम्रण करवाया गया। प्रशिक्षण के अन्तर्गत जिनमें गोमूत्र तथा गोबर के पदार्थ बनाना, जीवामृत, बीजामृत, नीम आधारित बायोपेस्टीसाइड पंचगव्य, कम्पोस्ट टी, वर्मीवाॅश, बी.डी. खाद, प्रोम खाद, जीवाणु खाद, नेनो फोर्मूलेशन, बायोपेस्टीसाइड तथा देशी द्रव्य घोल आदि तकनीकों पर प्रशिक्षण दिया गया है। कार्यक्रम के दौरान् प्रशिक्षण पुस्तिका का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में डॉ. आर. एल. सोनी, निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, डॉ. एम.के. महला, अधिष्ठाता, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, डॉ. एस. एस. लखावत, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, उदयपुर आदि सहित विभागाध्यक्ष एवं परियोजना प्रभारी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. बी. जी. छीपा ने किया।


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