GMCH STORIES

*चेटीचंड (20 मार्च) पर विशेष* *सिंधी समाज की आस्था, संस्कृति और नववर्ष का उत्सव*

( Read 1973 Times)

20 Mar 26
Share |
Print This Page

*चेटीचंड (20 मार्च) पर विशेष*    *सिंधी समाज की आस्था, संस्कृति और नववर्ष का उत्सव*

*वासुदेव देवनानी*

भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व ऐसे हैं जो केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक भी हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है चेटीचंड जो सिंधी समाज का प्रमुख त्योहार और नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से भगवान झेलेलाल के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सिंधी समाज के लिए यह दिन आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

*चेटीचंड का धार्मिक महत्व*

चेटीचंड का पर्व हिंदू पंचांग के चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। यह वही समय होता है जब वसंत ऋतु अपने पूरे सौंदर्य के साथ प्रकृति को नई ऊर्जा देती है। इसी दिन सिंधी समाज के आराध्य देव भगवान झूलेलाल का अवतरण हुआ माना जाता है।

सिंधी मान्यता के अनुसार भगवान झूलेलाल जल के देवता और मानवता के रक्षक माने जाते हैं। उनका अवतार उस समय हुआ जब सिंध क्षेत्र में अत्याचार और धार्मिक उत्पीड़न बढ़ गया था। तब वहां के लोगों ने जल देवता से प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान झूलेलाल ने जन्म लिया। उन्होंने अत्याचारियों को संदेश दिया कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए और मानवता सबसे बड़ा धर्म है। इस प्रकार झूलेलाल केवल एक धार्मिक प्रतीक ही नहीं बल्कि भाईचारे और सहिष्णुता के भी संदेशवाहक हैं।

*ऐतिहासिक पृष्ठभूमि*

इतिहास के अनुसार सिंध क्षेत्र में एक शासक मिर्ख शाह था, जिसने वहां के हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने सिंधु नदी के तट पर 40 दिन तक प्रार्थना और तपस्या की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर जल देवता ने झूलेलाल के रूप में अवतार लिया।

किंवदंती के अनुसार उनका जन्म सिन्ध के नसरपुर नगर में हुआ था। बालक झूलेलाल बचपन से ही चमत्कारी थे और उन्होंने शासक को न्याय और सहिष्णुता का संदेश दिया। अंततः शासक को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार देने की घोषणा की।

*सिंधी समाज का नववर्ष*

चेटीचंड केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सिंधी समाज का नववर्ष भी है। इस दिन लोग नए वर्ष की शुरुआत उत्साह और उल्लास के साथ करते हैं। घरों में साफ-सफाई की जाती है, नए वस्त्र पहने जाते हैं और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। मंदिरों और सामुदायिक स्थलों पर झूलेलाल की झांकियां सजाई जाती हैं और भजन-कीर्तन किए जाते हैं।

इस दिन सिंधी समाज के लोग “आयो लाल झूलेलाल और जेको चवंदो झूलेलाल, तहिंजा थींदा बेड़ा पार”जैसे जयघोष करते हैं। इन जयघोषों के पीछे विश्वास है कि भगवान झूलेलाल अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जीवन की कठिनाइयों से उन्हें पार लगाते हैं।

बहाराणा साहिब की परंपरा

चेटीचंड के अवसर पर सबसे महत्वपूर्ण परंपरा “बहाराणा साहिब” की होती है। इसमें एक थाल या कलश में दीपक, नारियल, फूल, फल, मिठाई, गेहूं और पत्तियां सजाई जाती हैं। इस बहाराणा को भगवान झूलेलाल का प्रतीक माना जाता है।

सामूहिक रूप से लोग इसे लेकर जुलूस निकालते हैं और किसी नदी, तालाब या समुद्र के किनारे जाकर पूजा करते हैं। यह परंपरा जल देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का प्रतीक है। जल को जीवन का आधार माना जाता है, इसलिए झूलेलाल की पूजा में जल का विशेष महत्व होता है।

*सांस्कृतिक कार्यक्रम और झांकियां*

चेटीचंड के अवसर पर देश और विदेश में बसे सिंधी समुदाय के लोग बड़े उत्साह से कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इन कार्यक्रमों में भजन, लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होती हैं। कई स्थानों पर भगवान झूलेलाल की भव्य झांकियां निकाली जाती हैं।

भारत के विभिन्न शहरों जैसे अजमेर , जयपुर,उदयपुर ,मुम्बई आदि में सिंधी समाज के लोग शोभायात्राएं निकालते हैं। इनमें पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और भक्ति गीतों के माध्यम से समाज की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया जाता है।

*विभाजन के बाद भी जीवित परंपरा*

1947 में भारत  विभाजन के बाद सिंधी समाज का बड़ा हिस्सा भारत के विभिन्न भागों में आकर बस गया। उस समय उनके सामने पहचान और संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती थी। ऐसे समय में चेटीचंद जैसे त्योहारों ने समाज को एक सूत्र में बांधे रखा।

आज भी यह पर्व सिंधी समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है। चाहे भारत हो या विदेश, जहां भी सिंधी समाज रहता है, वहां चेटीचंद बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

*सामाजिक एकता का संदेश*

चेटीचंड केवल एक समुदाय का त्योहार नहीं बल्कि सामाजिक एकता और सहिष्णुता का संदेश देने वाला पर्व है। भगवान झूलेलाल की शिक्षाओं में मानवता, समानता और धर्मनिरपेक्षता की भावना निहित है। उनका संदेश था कि सभी धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान किया जाना चाहिए।

आज के समय में जब दुनिया में कई जगह धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्ष देखने को मिलते हैं, तब झूलेलाल का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। चेटीचंड हमें याद दिलाता है कि विविधता में ही भारत की असली शक्ति है।

चेटीचंड सिंधी समाज की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह पर्व भगवान झूलेलाल की शिक्षाओं को स्मरण करने और समाज में प्रेम, भाईचारे तथा सद्भाव को बढ़ाने का अवसर देता है। नए वर्ष के स्वागत के साथ यह त्योहार जीवन में आशा, उत्साह और सकारात्मकता का संदेश भी देता है।

इस प्रकार चेटीचंड केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक एकता और मानवता के मूल्यों को जीवित रखने का पर्व है। यही कारण है कि सिंधी समाज इस दिन को अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और गर्व के साथ मनाता है।

——-

*(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं )*


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories :
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like