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कोरोना जैसे हालातों के लिए तैयार रहे देश: सर्वदलीय सहमति की जरूरत

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26 Mar 26
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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान और इजरायल तथा ईरान के मध्य युद्ध और खाड़ी देशों के वर्तमान हालातों तथा तेल के विश्वव्यापी भावी संकट को देखते हुए लोकसभा और राज्यसभा में दिए अपने भाषण मेवदेश को आगाह करते हुए कहा है कि कोविड-19 जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए भारत को हर समय तैयार रहना चाहिए। यह बयान केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति का संकेत भी है। विशेष रूप से राजस्थान सहित सभी राज्यों में सर्वदलीय बैठकों के आयोजन की पहल इस बात को रेखांकित करती है कि आपदा प्रबंधन अब केवल सरकारी दायरे तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें व्यापक राजनीतिक और सामाजिक सहभागिता आवश्यक है। हालांकि उन्होंने किसी प्रकार के लोकडाउन अथवा वाहनों के लिए ओड और ऑन पद्धति के बारे में संकेत नहीं दिए है लेकिन देश में कई जमाखोर और देश विरोधी ताकते इन परिस्थितियों का भी फायदा उठा कर अफवाहों के बाजार को गर्म करना चाहते है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार को और अधिक सतर्कता के साथ ऐसे तत्वों के विरुद्ध कार्यवाही के लिए आगे आना चाहिए।


हालांकि भारत में कोरोना महामारी ने यह साबित कर दिया कि किसी भी वैश्विक संकट के सामने विकसित और विकासशील देशों के बीच का अंतर काफी हद तक धुंधला हो जाता है। भारत ने शुरुआती चुनौतियों के बावजूद जिस प्रकार वैक्सीनेशन अभियान, लॉकडाउन प्रबंधन और स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार में तेजी दिखाई, वह सराहनीय रहा। फिर भी, इस महामारी ने स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियों, आपूर्ति श्रृंखला की सीमाओं और प्रशासनिक समन्वय की चुनौतियों को उजागर किया।

प्रधानमंत्री का यह कथन कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां फिर उत्पन्न हो सकती हैं, पूरी तरह यथार्थवादी है। वैश्विक स्तर पर बदलते पर्यावरणीय हालात, शहरीकरण और अंतरराष्ट्रीय आवागमन की बढ़ती गति नई बीमारियों के जोखिम को बढ़ा रही है। ऐसे में पूर्व तैयारी ही सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।राजस्थान जैसे बड़े और भौगोलिक दृष्टि से विविध राज्य के लिए यह चुनौती और भी जटिल है। राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों की बड़ी आबादी, सीमित स्वास्थ्य संसाधन और दूर-दराज के इलाके आपदा प्रबंधन को कठिन बनाते हैं। ऐसे में सर्वदलीय बैठकों के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाना एक सकारात्मक कदम है। इससे न केवल नीतिगत निर्णयों में व्यापक सहमति बनती है, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन में भी सहयोग मिलता है।

सर्वदलीय बैठकों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह लोकतंत्र की मूल भावना को सशक्त बनाती हैं। संकट के समय राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर सामूहिक निर्णय लेना ही सच्ची राजनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। यदि सभी दल मिलकर स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने, दवाइयों और ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने, तथा आपातकालीन सेवाओं के लिए एक समन्वित रणनीति तैयार करते हैं, तो इससे आम जनता का विश्वास भी बढ़ता है। हालांकि, इस पहल के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। अक्सर देखा गया है कि सर्वदलीय बैठकों के निर्णय केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। यदि इन बैठकों को प्रभावी बनाना है, तो आवश्यक है कि उनके निष्कर्षों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए और उनकी नियमित समीक्षा भी हो। इसके अलावा, स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाना, चिकित्सा कर्मियों की संख्या और प्रशिक्षण में सुधार करना, तथा डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करना भी उतना ही जरूरी है।
राजस्थान में यदि जिला स्तर तक सर्वदलीय समितियां बनाई जाएं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया जाए, तो यह मॉडल और अधिक प्रभावी हो सकता है। पंचायत और नगर निकाय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर जनता को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जा सकता है। कोरोना काल में यह देखा गया था कि जब जनभागीदारी बढ़ती है, तो संकट से उबरने की क्षमता भी मजबूत होती है।

यदि विश्वव्यापी तेल संकट बढ़ता है तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। देश के कई शहरी में अभी से पेट्रोल डीजल सीएनजी पीएनजी आदि की कमी देखी जा रही है और कई स्थानों पर लंबी कतारें भी देखी जा रही है। ऐसे में होटल रेस्टोरेंट तथा अन्य कई क्षेत्रों जैसे जैसे परिवहन आदि पर असर पड़ना भी शुरू हुआ है। महंगाई बढ़ने की संभावना भी बनी हुई है। इन परिस्थितियों का जमाखोर फायदा उठाने की कोशिश में है जिससे सरकारों को सावधान रहने तथा आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है।

कुल मिला कर प्रधानमंत्री का संदेश एक दूरदर्शी सोच का परिचायक है। यह युद्ध की विभीषिका के कारण संभावित उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय हालातों में केवल संभावित महामारी से निपटने की तैयारी नहीं, बल्कि एक मजबूत और लचीली स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण की दिशा में उठाया गया कदम भी है। यदि केंद्र और राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और समाज मिलकर इस दिशा में काम करें, तो भारत भविष्य में किसी भी आपदा का सामना अधिक मजबूती से कर सकेगा ऐसा विश्वास किया जा रहा हैं।
 


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