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एस्ट्रो-वास्तु विशेषज्ञ मनोज जैन का दावा: गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में ही दे दिया था नौ ग्रहों को संतुलित करने वाला सबसे संपूर्ण जीवन-विधान 

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22 Jun 26
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एस्ट्रो-वास्तु विशेषज्ञ मनोज जैन का दावा: गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में ही दे दिया था नौ ग्रहों को संतुलित करने वाला सबसे संपूर्ण जीवन-विधान 

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त एस्ट्रो-वास्तु सलाहकार, ऑरा रीडर एवं लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन मेंटर मनोज जैन ने अपने नवीन विचार-लेख "गुरु का विधान" में एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा है कि गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा 1699 में स्थापित खालसा परंपरा केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा समग्र जीवन-विधान है जो मानव जीवन को प्रभावित करने वाले नौ ग्रहों के प्रभावों को संतुलित करने की क्षमता रखता है।
वास्तुशास्त्र और ज्योतिष के क्षेत्र में दो दशकों से अधिक समय से कार्य कर रहे मनोज जैन का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक लोगों को ग्रहों के असंतुलन दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय सुझाए हैं। इनमें रत्न, धातुएँ, दिशाएँ, समय, मंत्र और अन्य ज्योतिषीय उपचार शामिल रहे हैं। किंतु सिख परंपरा का गहन अध्ययन करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने सैकड़ों वर्ष पहले ही एक ऐसा जीवन-मॉडल स्थापित कर दिया था जो ग्रहों के संतुलन को दैनिक जीवन का हिस्सा बना देता है।
अपने लेख में जैन ने पाँच ककारों को ज्योतिषीय दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया है।
उनके अनुसार:
• पगड़ी (दस्तार) केतु ग्रह से संबंधित है, जो आध्यात्मिक चेतना, कर्म-मुक्ति और उच्चतर जागरूकता का प्रतिनिधित्व करता है।
• केश (दाढ़ी और बाल) राहु से जुड़े हैं, जो सांसारिक शक्ति, तीव्रता और संकल्प का ग्रह माना जाता है।
• कड़ा शनि ग्रह का प्रतीक है, जो कर्म, अनुशासन, उत्तरदायित्व और धैर्य का प्रतिनिधित्व करता है।
• कृपाण मंगल ग्रह की ऊर्जा को दर्शाती है, जो साहस, रक्षा और न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक है।
• कंघा बुध ग्रह से जुड़ा है, जो बुद्धि, व्यवस्था और स्पष्ट चिंतन का प्रतिनिधित्व करता है।
• कच्छा शुक्र ग्रह से संबंधित है, जो जीवन-शक्ति, सृजनात्मकता और संयमित इच्छाओं का कारक माना जाता है।
• गुरु को मानना और उनके प्रति समर्पण बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है, जो ज्ञान, गुरु-कृपा और दिव्य मार्गदर्शन का ग्रह है।
मनोज जैन ने यह भी उल्लेख किया है कि पारंपरिक रूप से सिख विवाह रविवार को दोपहर के समय सम्पन्न होते हैं। उनके अनुसार यह सूर्य ग्रह से जुड़ा हुआ है, जिसे ज्योतिष में आत्मा, नेतृत्व, अधिकार और जीवन-शक्ति का प्रतिनिधि माना जाता है।
लेख में जैन लिखते हैं कि पाँच ककार केवल धार्मिक पहचान के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति का हिस्सा हैं जो अनुशासन, साहस, आत्म-नियंत्रण, जिम्मेदारी और आध्यात्मिक विकास को निरंतर सक्रिय रखती है।
वे लिखते हैं, "मेरे अनेक मुवक्किल वर्षों तक अलग-अलग ग्रहों के उपाय करते रहते हैं, जबकि खालसा परंपरा में दीक्षा लेने वाला व्यक्ति जीवन के प्रारंभ से ही उन सिद्धांतों को अपने दैनिक व्यवहार में शामिल कर लेता है।"
हालाँकि जैन स्पष्ट करते हैं कि उनका उद्देश्य यह कहना नहीं है कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने पाँच ककारों की रचना ज्योतिषीय उपायों के रूप में की थी। उनके अनुसार यह उस गहन और बहुआयामी ज्ञान का प्रमाण है कि जब सिख परंपरा को वास्तु और ज्योतिष के दृष्टिकोण से देखा जाता है तो वह एक पूर्ण और संतुलित प्रणाली के रूप में दिखाई देती है।
लेख के अंत में जैन लिखते हैं कि महान परंपराएँ इसलिए महान होती हैं क्योंकि वे एक साथ अनेक ज्ञान-परंपराओं की कसौटी पर खरी उतरती हैं। उनके अनुसार खालसा जीवन-पद्धति इसका एक अद्वितीय उदाहरण है।
 


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