उदयपुर। पेसिफिक स्कूल ऑफ लॉ, पेसिफिक यूनिवर्सिटी में “क्या जघन्य अपराध करने वाले किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए?” विषय पर एक प्रभावशाली समूह चर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा में विधि संकाय के प्राध्यापकों ने विषय के पक्ष एवं विपक्ष में अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के दौरान डीन इंचार्ज डॉ. अनुराग मेहता ने अपने संबोधन में कहा कि किशोर अपराध जैसे संवेदनशील विषय पर केवल भावनात्मक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानून, मनोविज्ञान एवं सामाजिक परिस्थितियों को समान रूप से समझना आवश्यक है। उन्होंने न्याय और मानवता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. मनोज जोशी ने कहा कि जघन्य अपराधों में पीड़ितों को समयबद्ध न्याय मिलना अत्यंत आवश्यक है। कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी है।
डॉ. मंजू कुमावत ने कहा कि किशोरों का मानसिक एवं भावनात्मक विकास पूर्ण नहीं होता, इसलिए उनके प्रति सुधारात्मक एवं पुनर्वास आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। वही डॉ. पूजा सिसोदिया ने कहा कि किशोर अपराधों की रोकथाम में परिवार, विद्यालय एवं समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि समय पर उचित मार्गदर्शन एवं नैतिक शिक्षा मिले तो अनेक अपराधों को रोका जा सकता है।
डॉ. ध्रुवल शाह ने कहा कि यदि कोई किशोर गंभीर एवं जघन्य अपराध करता है, तो प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसकी मानसिक परिपक्वता, अपराध की प्रकृति एवं परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
चर्चा के दौरान भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी एवं ऑस्ट्रेलिया की किशोर न्याय प्रणालियों की तुलनात्मक समीक्षा भी प्रस्तुत की गई। डॉ. भानुप्रिया कुमावत ने विद्यालयों में नियमित मनोवैज्ञानिक सहायता एवं काउंसलिंग की व्यवस्था को आवश्यक बताते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना समय की आवश्यकता है।
कृपा जैन ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को कानून की जानकारी होना आवश्यक है तथा समाज में कानून के प्रति सम्मान और पालन की भावना विकसित की जानी चाहिए। परवीन कौसर के अनुसार न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि उसे सुधारकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना भी होना चाहिए।
निशित गोखरू ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जघन्य अपराधों में पीड़ितों के अधिकारों एवं न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वही चिराग भटनागर ने कहा कि कठोर कानूनों के साथ-साथ समाज में विधिक जागरूकता, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी समान रूप से आवश्यक है। परिवार, विद्यालय एवं समाज मिलकर बच्चों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन, संवेदनशीलता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करें।
परिचर्चा में इस बात की अनुशंसा की गई कि अपराधों की रोकथाम का सबसे प्रभावी माध्यम विद्यालय स्तर से विधिक शिक्षा प्रदान करना है। विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही कानून, उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी दी जानी चाहिए, जिससे वे कानून का सम्मान करना सीखें और अपराध की ओर बढ़ने से बचें।