उदयपुर। देवेन्द्रधाम में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचनमाला के अंतर्गत डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कहा कि धर्म मनुष्य जीवन का मूल आधार है। धर्म के अभाव में मनुष्य का जीवन केवल भोग-विलास और स्वार्थ तक सीमित होकर पशुवत बन जाता है। उन्होंने कहा कि गुणों का विकास धर्म से होता है और यही मनुष्य को देवत्व की ओर अग्रसर करता है।
प्रवचन में डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कहा कि मनुष्य और पशु में सबसे बड़ा अंतर धर्म है। धर्म व्यक्ति के भीतर दया, करुणा, क्षमा, विनम्रता और आत्मसंयम जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास करता है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ उसे मजबूती प्रदान करती है, उसी प्रकार धर्म जीवन को स्थिरता और सार्थकता देता है। धर्म से दूर होने पर जीवन दिशाहीन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय आत्मा की शुद्धता को प्रभावित करते हैं। जब तक इन विकारों पर विजय नहीं पाई जाती, तब तक आत्मकल्याण और जीवन परिवर्तन संभव नहीं है। धर्म केवल सुनने या पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि उसे व्यवहार और आचरण में उतारना ही सच्ची साधना है।
डॉ. राजेन्द्र मुनि ने प्रकृति का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश देना, चन्द्रमा का शीतलता प्रदान करना और अग्नि का स्वभाव उष्णता देना है, उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव भी शुद्धता और चेतना है। कषायों के कारण आत्मा का वास्तविक स्वरूप छिप जाता है, जिसे धर्म साधना के माध्यम से पुनः प्रकाशित किया जा सकता है।
सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन समाज के पदाधिकारियों ने किया। अंत में श्रद्धालुओं से धर्म को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान करते हुए बताया गया कि 2 अगस्त, रविवार को विश्वशांति एवं समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना से विशेष धार्मिक कार्यक्रम एवं प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाएगा।