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यशोदा मैया और बाल कृष्ण के मिलन में दिखी वात्सल्य की झलक

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28 Mar 26
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उदयपुर। तुलसी परिवार व नन्दी वन वैदिक गौशाला धाम भुज के तत्वावधान में ब्रह्मऋषि किरिट भाई के मुखारबिन्द से भुवाणा रोड़ स्थित देेवेन्द्र धाम में आयोजित भागवत कथा का आयोजन हो रहा है। जिसका समापन 31 मार्च को होगा।  
श्रीमद्भागवत कथा के चैथे दिन श्री किरिट भाईजी ने ब्रह्म यशोदा के घर आए जैसा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि यह एक अत्यंत भावुक और प्रेम से भरा प्रसंग है। यशोदा मैया और बाल कृष्ण का मिलन पूरी की पूरी वात्सल्य लीला है यह प्रसंग भगवान के बाल स्वरूप और माता के निश्छल और हृदयस्पर्शी प्रेम को दर्शाता है। गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण अपने बाल रूप में लीला कर रहे थे। उनकी माता माता यशोदा उन्हें अत्यंत स्नेह करती थीं। कृष्ण की बाल लीलाएँ इतनी मनमोहक थीं कि पूरा गोकुल उनसे मोहित था। भगवान केवल भक्ति और प्रेम से ही बंधते हैं, किसी शक्ति या ज्ञान से नहीं। यशोदा का प्रेम निष्काम, शुद्ध और मातृभाव से भरा था। यह लीला बताती है कि परमात्मा भी अपने भक्त के प्रेम के सामने झुक जाते हैं।
सच्चा प्रेम और भक्ति भगवान को भी बाँध सकती है। अहंकार नहीं, बल्कि सरल हृदय ही ईश्वर तक पहुँचाता  है। भगवान का बाल स्वरूप हमें अपनापन और निकटता का अनुभव कराता है। उन्होंने कहा कि हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए संकल्प लेना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बच्चों को अपने माता-पिता की बातों का सम्मान करने की सलाह दी, क्योंकि माता-पिता ही सबसे बड़े भगवान होते हैं। जिन पर माता-पिता का आशीर्वाद होता है, उन्हें संसार में सब कुछ प्राप्त होता है। हर माता-पिता को अपने बच्चों को भागवत कथा, सत्संग और कीर्तन जैसे धार्मिक आयोजनों में साथ लाना चाहिए। धर्म की कथाएं सुनने से बच्चों में अच्छे संस्कार आते हैं और वे अपने जीवन को सार्थक करने के लिए भगवान के प्रति अटूट विश्वास रखते हैं।
महाराजजी ने कहा कि अगर आपके जीवन में कोई शुभ या अशुभ घटित होता है तो इसमें किसी ग्रह का कोई दोष नहीं होता है, यह दोष आपके स्वयं के कर्मों का होता है। कई बार दुरूख की घड़ी में हम भगवान को कोसते हैं, जबकि इसमें भगवान का कोई कसूर नहीं होता है। कर्मों के बन्ध से तो भगवान भी बचे हुए नहीं है।


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