GMCH STORIES

माहेश्वरी सेवासदन में नानी बाई को मायरो कथा का विश्राम

( Read 711 Times)

19 May 26
Share |
Print This Page
माहेश्वरी सेवासदन में नानी बाई को मायरो कथा का विश्राम

उदयपुर। माहेश्वरी सेवासदन में माहेश्वरी परिवार की ओर से आयोजित तीन दिवसीय नानी बाई को मायरो कथा के अंतिम दिन मंगलवार  को कथावाचक डॉ. पं. मिथिलेश नागर ने भगवान द्वारिकाधीश द्वारा श्यामल सेठ के रूप में नानी बाई का मायरा भरने के प्रसंग का भक्ति भाव के साथ बहुत ही करुण अंदाज में मार्मिक वर्णन किया तो पंडाल में मौजूद श्रद्धालु धर्मावलंबियों भक्तों के मन द्रवित हो गए। सभी बड़े उत्साह से भगवान द्वारिकाधीश की जय जयकार करने लगे। पं. नागर ने कथा प्रवचन के माध्यम से सनातन ही नहीं समग्र मनुष्य जाति को यह संदेश दिया कि मन में विश्वास, आस्था, दृढ़ संकल्प त्याग, समर्पण है तो लक्ष्य दूर नहीं रहता। उन्होंने कहा कि कर लिया सो काम और भज लिया सो नाम; इसलिए भक्ति कर लो मंजिल जरूर मिलेगी।

उन्होंने नानी बाई की पुत्री के विवाह के अवसर पर उसके ससुराल से मायरे के निमंत्रण की पत्रिका भक्त शिरोमणि नरसी मेहता के पास जूनागढ़ पहुंचाने  के प्रसंग से कथा प्रवचन शुरू किया और कहा कि नरसी मेहता की पुत्री नानी बाई के यहां उसकी पुत्री के विवाह का शुभ अवसर आया। ससुराल पक्ष द्वारा परंपरा अनुसार मायरे का निमंत्रण पीहर भेजने का निर्णय हुआ। नानी बाई की सास और ननंद उसके गरीब पिता का नरसी मेहता का उपहास उड़ाते थे। उन्होंने जानबूझकर भारी भरकम मायरे की सूची तैयार करवाई, जिसमें सोना, चांदी, वस्त्र, आभूषण, धन-दौलत और अनेक प्रकार की सामग्री लिखवाई गई।

कुमकुम पत्रिका लेकर विप्र कोकल्या जोशी जूनागढ़ पहुंचे। वहां उन्होंने एक पणिहारी से नरसी मेहता के घर का पता पूछा। पणिहारी ने सरलता से कहा — “जहां हरिनाम कीर्तन की ध्वनि सुनाई दे, वही नरसी भगत का घर है।”

जब कोकल्या जोशी नरसी मेहता के घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां न धन था, न वैभव। केवल टूटे-फूटे तुम्बे, तुलसी की माला और गोपीचंदन रखे थे। विप्र ने व्यंग्य करते हुए नरसी मेहता को पानड़ी दी और मायरे की लंबी सूची पढ़कर सुनाई। साथ ही उनकी गरीबी और श्रीकृष्ण भक्ति का मजाक उड़ाया। परंतु नरसी मेहता तनिक भी क्रोधित नहीं हुए। उनके चेहरे पर केवल भक्ति और विनम्रता थी।


प्रभु चरणों में रखी पत्रिका, कहा — “हे श्याम, मेरी लाज रखना”


नरसी मेहता ने कुमकुम पत्रिका को भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह के चरणों में रख दिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि “हे मेरे प्रभु द्वारिकाधीश! यह मायरा मेरी नहीं, आपकी लाज है।”

उन्होंने नगरवासियों से मायरे में साथ चलने का आग्रह किया, पर किसी ने साथ देना स्वीकार नहीं किया। तब उन्होंने पड़ोसी से बैलगाड़ी मांगी। बैलगाड़ी टूटी-फूटी थी। भक्त नरसी ने स्वयं उसे ठीक किया और थोड़े बहुत सामान के साथ मायरे के लिए अंजार की ओर रवाना हो गए।

रात्रि के समय जंगल में कीचड़ के बीच बैलगाड़ी फंस गई। चारों ओर अंधकार था। तभी भक्त की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण एक खाती (बढ़ई) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सहजता से गाड़ी को कीचड़ से बाहर निकाला और नरसी मेहता को आगे रवाना किया। भक्त समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, स्वयं उनके ठाकुरजी हैं।


अंजार में गरीब पिता का उपहास


जब नरसी मेहता अंजार पहुंचे तो ससुराल पक्ष और नगर के लोग उनके साधारण वेश और निर्धनता को देखकर तरह-तरह की बातें करने लगे। नानी बाई की सास ने उन्हें तिलक लगाया और नेग मांगा। जब नरसी कुछ न दे सके तो उसने क्रोध में तिलक तक पोंछ दिया। लेकिन नरसी मेहता शांत रहे। उनके मुख पर हरिनाम था और हृदय में विश्वास। उधर, नानी बाई अत्यंत व्याकुल हो उठीं। वह जलाशय पर पानी लेने के बहाने गईं और वहां अपने धर्मभाई द्वारिकाधीश को स्मरण कर अपनी विपत्ति सुनाने लगीं।


श्यामल सेठ बनकर आए भगवान श्रीकृष्ण


भक्त की पुकार सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण राधा, रुक्मिणी और अक्रूर के साथ प्रकट हुए। उन्होंने नानी बाई को दर्शन देकर विश्वास दिलाया कि मायरा अवश्य भरेगा, चिंता न करो।

मायरे का समय आया तो पूरा अंजार नगर आश्चर्यचकित रह गया। श्यामल सेठ के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अकूत संपत्ति, हाथी-घोड़े, रथ, वस्त्र, आभूषण और धन-संपदा लेकर पहुंचे। केवल नानी बाई के ससुराल पक्ष ही नहीं, पूरे अंजार नगर को मायरा ओढ़ाया गया। जिस किसी ने जो मांगा, वह सब मिला। नगर के लोग विस्मित रह गए। नानी बाई की आंखों में आनंद और भक्ति के अश्रु छलक उठे। सभी समझ गए कि यह कोई साधारण व्यापारी नहीं, स्वयं द्वारिकाधीश हैं जिन्होंने अपने भक्त की लाज रख ली।


श्यामल सेठ का प्रस्थान और सत्य का उद्घाटन


मायरा पूर्ण होने के बाद श्यामल सेठ के रूप में आए भगवान श्रीकृष्ण अंतर्धान हो गए। कुछ समय बाद नरसी मेहता भी वहां से प्रस्थान कर गए। नगरवासियों को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह चमत्कार वास्तव में भगवान ने किया है। परंतु धीरे-धीरे सभी को सत्य ज्ञात हुआ और नरसी मेहता की भक्ति की महिमा चारों ओर फैल गई।

इसके बाद नरसी मेहता ने अपनी अनेक भक्ति रचनाओं में भक्त की लाज रखने वाले भगवान और भक्ति की महिमा का वर्णन किया। आज भी गुजरात और राजस्थान में “नानी बाई का मायरा” आस्था, विश्वास, श्रद्धा और भगवान की कृपा का अद्भुत प्रसंग भक्तिभाव से सुना सुनाया जाता है। 

  मीडिया प्रवक्ता हेमंत लड्ढा और आयोजन समिति के अनिल पलोड़ ने बताया कि अंतिम दिन भीलवाड़ा के सुरेशचंद्र समदानी, बजरंगबली मित्रमंडल सेक्टर 4 के पदाधिकारियों और अन्य अतिथियों, समाजसेवियों, का व्यासपीठ से पं.नागर ने सम्मान किया। लड्ढा और पलोड़ के अनुसार कथा के प्रारंभ में और अंत में तीसरे दिन के यजमान राजेश गदिया, राजेश मूंदड़ा, राकेश देवपुरा, रामगोपाल लावटी, रमेश अजमेरा, कैलाश कालाणी, श्यामलाल ईनाणी, श्यामलाल सोमानी, सुरेश मूंदड़ा,  सुरेशचंद्र लावटी और विनोद मूंदड़ा ने आरती की। 

कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। इनमें भी मातृशक्ति की संख्या ज्यादा थी। सभी श्रद्धालु भक्ति रस से सराबोर हो गए। कथा स्थल पर श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के भजनों पर खूब झूमे, नृत्य किया। महिलाएं ही नहीं पुरुष भी भक्तिरस में डूब कर झूमते रहे। मायरे की झांकी भी सजाई गई। सभागार का वातावरण भगवान कृष्ण के जयकारों से गूंजता रहा। 

सुंदरकांड पाठ

इसके बाद रात आठ बजे बाद पं. डॉ. मिथिलेश मेहता (नगर) ने संगीतमय सुंदरकांड पाठ किया। इस दौरान बड़ी संख्या में मौजूद श्रद्धालु भगवान श्री रामचंद्र के परम भक्त हनुमान की भक्ति, आराधना में लीन हो गए और श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सुंदर कांड का पाठ किया। 


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories :
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like