उदयपुर | विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर जनमत मंच द्वारा व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जनमत मंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्रीनिवास ने बताया कि विश्व आदिवासी दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के अधिकारों, उनकी विशिष्ट संस्कृति, भाषा और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के लिए संकल्प लेने का अवसर है।
विश्व आदिवासी दिवस हर वर्ष 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की अनूठी संस्कृति, भाषा, पारंपरिक ज्ञान और अधिकारों का संरक्षण करना तथा उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग ने जेनेवा में आदिवासी आबादी के लिए 'वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजिनस पॉपुलेशन' का गठन किया, जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को आयोजित की गई थी।
इसी ऐतिहासिक बैठक की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को संकल्प पारित कर आधिकारिक रूप से प्रतिवर्ष 9 अगस्त को 'विश्व आदिवासी दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की।
इसके बाद यूएनओ ने 1995 से 2004 तक के समय को पहला 'अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दशक' घोषित किया ताकि दुनिया भर में जनजातीय समुदायों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें। आगे चलकर 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 'आदिवासी लोगों के अधिकारों पर घोषणापत्र' अपनाया गया, जिसने आदिवासियों की जल, जंगल, जमीन, भाषा और संस्कृति के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से स्थापित किया।
जनमत मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया कि- इस व्याख्यानमाला का मुख्य उद्देश्य जनजातीय अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के अंतर्संबंधों पर जन-जागरूकता फैलाना है। उन्होंने कहा कि मंच भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से आदिवासी समाज की आवाज को बुलंद करने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर प्रयासरत रहेगा।
कार्यक्रम में जनमत मंच के सह-सचिव डॉ. प्रियदर्शी ओझा, विनोद चौधरी एवं डॉ. कुणाल आमेटा आदि वक्ताओं ने जनजातीय अधिकारों और उनकी अनूठी संस्कृति के संरक्षण पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के अंत में विशाल माथुर द्वारा सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं सहभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया गया।