उदयपुर। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की ओर से विस्तार व्याख्यान एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराओं, संवैधानिक अधिकारों तथा वर्तमान चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष डॉ. एकता हुसैन के स्वागत उद्बोधन से हुई। मुख्य वक्ता प्रोफेसर जी. एस. कूंपावत ने विश्व आदिवासी दिवस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1994 में पहली बार विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया था। उन्होंने कहा कि विश्व के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट परंपराएं, जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान है।
प्रो. कूंपावत ने कहा कि जनजातीय समुदाय लंबे समय से मुख्यधारा से अलग परिस्थितियों में जीवन यापन करते रहे हैं। इनके सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर विभिन्न योजनाएं संचालित की जाती रही हैं। जनजाति उप योजना क्षेत्र (टीएसपी), टाडा और माडा जैसी योजनाओं से जनजातीय समाज को लाभ मिल रहा है। उन्होंने भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों तथा पांचवीं अनुसूची में जनजातीय समुदायों को दिए गए संवैधानिक अधिकारों की भी जानकारी दी।
कार्यक्रम में अधिष्ठाता प्रोफेसर मलय पानेरी ने आदिवासी संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनजातीय समाज केवल अपने परिवार तक सीमित न रहकर पूरे समुदाय के हितों और कल्याण के बारे में सोचता है। उन्होंने कहा कि समाज को आदिवासियों से एकजुटता, सामुदायिक भावना और परस्पर सहयोग की सीख लेनी चाहिए।
भूगोल विभाग के प्रो. डॉ. पंकज रावत ने जनजातियों की परिभाषा एवं उनकी सामाजिक संरचना पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया।
विभाग के डॉ. सी. एल. भगोरा ने आदिवासी समाज से जुड़े समसामयिक एवं ज्वलंत मुद्दों पर अपने विचार रखे तथा सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन हिमानी खारोल ने किया।
इस अवसर पर डॉ. राजेश शर्मा, डॉ. ममता पानेरी, डॉ. कुसुम, डॉ. रानी प्रभा, डॉ. ममता पुरबिया, डॉ. शैली मेहता, डॉ. शाहिद हुसैन, डॉ. आरती, प्रीति यादव, डॉ. बिंदिया, शोधार्थी ज्योति डामोर सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।