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दुर्लभ मनुष्य जीवन को पहचानें, असंतोष नहीं कृतज्ञता का भाव रखेंःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

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06 Aug 26
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दुर्लभ मनुष्य जीवन को पहचानें, असंतोष नहीं कृतज्ञता का भाव रखेंःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने गुरुवार को कहा कि अनंत जीवों को जो दुर्लभ मनुष्य जीवन प्राप्त नहीं होता, वह हमें मिला है।

परमात्मा की वाणी सुनने और धर्म साधना का अवसर मिलना स्वयं में महान सौभाग्य है।

इसलिए जीवन में जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें, न कि जो नहीं मिला उसके लिए पीड़ा और तनाव पालें।उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग अपने जीवन की खुशियों को देखने के बजाय दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना करते रहते हैं।

यही कारण है कि संतोष के स्थान पर असंतोष बढ़ता जा रहा है।

मनुष्य जीवन इतना अनमोल है कि इसके माध्यम से नर से नारायण और आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त होता है।साध्वी श्री ने कहा कि हर वाहन में इंजन होता है, लेकिन उसकी पहचान और मूल्य उसकी गुणवत्ता से तय होता है।

इसी प्रकार आत्मा तो सभी प्राणियों में होती है, किंतु मनुष्य शरीर सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसी शरीर के माध्यम से आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना संभव है।उन्होंने कहा कि मनुष्य की रीढ़ सीधी होती है, जो सरलता और सच्चाई का संदेश देती है।

यदि हमारी आकृति तो सीधी हो, लेकिन प्रकृति टेढ़ी हो जाए, तो मनुष्य होकर भी हमारा आचरण पशु समान हो जाता है।

इसलिए जीवन में सरलता, विनम्रता और सदाचार को अपनाना आवश्यक है।साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने भगवान महावीर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे देशना देने से पहले ष्णमो तीर्थस्सष् कहकर संघ को नमन करते थे।

संघ के चारों अंग धर्म की आधारशिला हैं। उन्होंने ज्ञान और क्रिया के संतुलन पर बल देते हुए कहा कि केवल ज्ञान या केवल क्रिया पर्याप्त नहीं है, बल्कि दोनों का समन्वय ही जीवन को सार्थक बनाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जो संतान अपने माता-पिता की अंतिम घड़ी में उनकी सेवा करते हुए उन्हें विदा करती है, वह वास्तव में सौभाग्यशाली होती है।प्रवचन के प्रारंभ में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मयरुचि श्रीजी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।

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