मेले और पर्व हमारी सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक विरासत के अभिन्न अंग हैं जो सदियों से लोक जीवन में प्रवाहमान सामाजिक, धार्मिक और अर्थ व्यवस्था से जुड़ी परम्पराओं का जीवन्त दिग्दर्शन कराते हैं। परिवेश एवं समाज की सम-सामयिक धड़कन की बखूबी अभिव्यक्ति के साथ ही मेला संस्कृति से मिलते हैं बदलाव और भविष्य के संकेत।

बेणेश्वर सहित जनजाति क्षेत्रों में पहाड़ों, नदियों और संगम स्थलों के इर्द-गिर्द लगने वाले तमाम मेलों में ‘लोकल फॉर वॉकल’ का पुरातन स्वरूप दिखाई देता है।

इन मेलों में जहाँ श्रद्धा व आस्था का सागर लहराता है वहीं परंपरागत मेला बाजार इंगित करते हैं- अँचल विशेष की हस्तकला, उत्पादों की मांग और आपूर्ति प्रबन्धन, उत्पादन व लघु व कुटीर उद्योगों की क्रमिक विकास गाथा को।

प्राकृतिक उत्पादों का दिग्दर्शन

राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती वनवासी अँचल ‘‘वागड़‘‘ की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था में पारम्परिक ग्राम्य लघु एवं कुटीर उद्योग मूलाधार रहे हैं। प्राकृतिक उपहारों की प्रचुरता वाले इस वनवासी अँचल में घरेलू एवं ग्रामीण दोनों ही दृष्टियों से परंपरागत उद्योगों का महत्त्व बरकरार रहा हैं। यही सब बताता है लघु उद्योगों का विराट मेला- बेणेश्वर।

परम्परागत हस्तशिल्प की झांकी

बांसवाड़ा एवं डूँगरपुर दोनों जिलों के मध्य माही, सोम एवं जाखम नदियों के जल से घिरे बेणेश्वर टापू पर हर वर्ष माघ पूर्णिमा पर लगने वाले मेले में करीब तीन-चार किलोमीटर फैले बाजारों में जनजाति अँचल के लघु उद्योगों, हस्तशिल्प एवं स्थानीय हस्त कलाओं की प्रतिदर्शीय झलक देखने को मिलती हैं। इस बार यह मेला 29 जनवरी से लगातार जारी है। 1 फरवरी को मुख्य मेला भरेगा, जबकि मेले का समापन 6 फरवरी को होगा।

लोक जीवन का सटीक प्रतिदर्श

इस मेले को देख वागड़ में उद्योगों के विकास तथा औद्योगिक परिदृश्य को अच्छी तरह जाना जा सकता है। यहां मुख्य रूप से काष्ठ, चर्म, पाषाण, वनौषधियों, लोकवाद्य यंत्रों, श्रृंगार प्रसाधन, खाद्य सामग्री, रस्सी, वानस्पतिक उपादान, हथियार, हथकरघा उद्योग और इनसे संबंधित तरह-तरह की पुरातन व नवीन हस्तकलाओं से परिपूर्ण सभी प्रकार की सामग्री के सहज ही दर्शन होते हैं।

इनमें ठेठ ग्रामीण अँचल से लेकर कस्बाई व शहरी व्यवसायी अपने स्थानीय उत्पादनों के साथ काफी संख्या में आते हैं वहीं बाहर से भी बड़ी संख्या में स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादक व्यवसायी हिस्सा लेते हैं। जो कुछ भी वागड़ अंचल के जनजीवन के लिए उपयोगी रहता है, वह सब कुछ बेणेश्वर मेले के बाजारों में देखने को मिलता है।

इस मेले में स्थानीय उत्पादों के बाहुल्य के कारण मेलार्थियों को सामग्री चयन और क्रय करने का विस्तृत फलक उपलब्ध होता है और स्थानीय उद्यमी भी परस्पर हुनर को सीखने का प्रयास करते हैं।

पखवाड़े भर तक चलता है मेला बाजार

यही वह मेला है जिसमें वागड़ अँचल के तमाम स्थानीय छोटे-बड़े ग्रामीण उद्यमियों को अपने द्वारा उत्पादित या निर्मित माल को प्रदर्शित करने व बेचने के लिए बहुत बड़ा व कई दिनों तक लगातार चलने वाला बाजार मिलता है।

स्थानीय उत्पादों में रुचि रखने वाले लोगों को भी सामान खरीदने के लिए चयन की व्यापक संभावनाएं दिखती हैं। इसी में नई पीढ़ी के लोग रूबरू होते हैं अपने अँचल की उद्यम संस्कृति व परम्परागत उद्योगों से। इनके खरीदार न केवल वागड़ अँचल बल्कि आस-पास व दूरदराज के मेलार्थी भी होते हैं।

देशी-विदेशी पर्यटन भी हैं दीवाने

देशी-विदेशी पर्यटकों का तो ख़ासा रुझान वागड़ के परम्परागत उद्योगों व उत्पादों की ओर होता ही है। प्रकृति से वनवासियों का रिश्ता अत्यधिक निकट का एवं प्रगाढ़ होता है। यहाँ के लोगों को प्रकृति के बीच रहने तथा प्रकृति प्रदत्त सामग्री के उपभोग में जितना आनन्द आता है उतना ही शायद कहीं।

फैशनपरस्ती और सुविधा भोगी जीवन से कोसों दूर यहाँ के आम आदमी की रोजमर्रा की ज़िन्दगी में स्थानीय सामग्री का समावेश यह स्पष्ट निरूपित करता है कि वागड़ के लोग देशी वस्तुओं के कितने हिमायती हैं।

काष्ठ व पाषाण उत्पादों की भरमार

स्वदेशी का मोह यहाँ लोक जीवन की रग-रग में रमा हुआ है। बेणेश्वर मेले में काष्ठ उद्योग के अन्तर्गत लकड़ी के खिलौने, कुम्हारी का सामान, पारम्परिक खाटले(पलंग), धोणे(कपड़े धोने के लिए), बैठक हेतु पाटले, रवाड़(छाछ-बिलौनी), पाण्णं(बच्चों को पालने), बाँस के टोपले, हूपड़े, बंसियाँ, छींकें, कृषि के औजार आदि की कलात्मकता देखने को मिलती है।

वनवासियों का सदियों पुराना धनुष-बाण आज भी घर-घर में देखा जा सकता है। मेले में तरह-तरह के तीर-कमान भारी पैमाने पर बिकते हैं। वागड़ के कई गांवों में बसे हुए तीरगरों के लिए तीर-कमान का निर्माण ही आजीविका का मुख्य स्रोत है।

पाषाण से बने बर्तनों का प्रचलन यहां की पुरातन परंपरा का हिस्सा है। पत्थरों को घड़ कर बनाए गए वाटलों(पाषाण की गहरी प्लेट्स) में भोजन का मजा ही कुछ और है। पत्थर की घटियाँ (चक्कियाँ), खरल, मर्दनीये, उकरे आदि वह सामग्री है जो वनाँचल की घर-गृहस्थी में ख़ासी पैठ रखती है। स्थायित्व के साथ इनके चोरी हो जाने क भय भी नहीं रहता। परतापुर, भीलूड़ा, गोपीनाथ का गड़ा आदि गांवों में पत्थरों के बरतन व अन्य सामान बनाने का धन्धा ज्यादा प्रचलित है।

खूब बिकते हैं मटके

सारे वागड़ अँचल में सैकड़ों परिवारों की आजीविका मिट्टी से बनने वाले पात्रों पर निर्भर है। यहाँ के मिट्टी के बर्तन दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। मिट्टी के मटके, माटले, गोरे इस मेले में खूब बिकने आते हैं। बेणेश्वर मेले से ही शुरुआत होती है ग्रीष्म ऋतु की, इसलिये मिट्टी के जल पात्रों की सर्वाधिक बिक्री होती हैं।

इसके अलावा मृतिका (मिट्टी) के परणाईये(दीपक), सऊड़िया, सुराहियाँ, कोपरिये (मैल छुड़ाने वाले), चिलम, ढाँकणे, नौलियाँ आदि की कलात्मकता देखने लायक होती हैं। खासकर टामटिया के मटके दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं।

वार्षिक खरीद का केन्द्र है मेला

बेणेश्वर के संगम तटों पर खरीदे गए मटकों व जल पात्रों को घर-परिवार के लिए सुकून माना जाता है। पूरे आदिवासी क्षेत्र के लोगों के लिये हथियारों की वार्षिक खरीद का माध्यम होता हैं यह मेला। चाकू-छुरी से लेकर बरछी, कृपाण, गुप्ती, भाले, फरसे, ढाल, तलवार, लट्ठ आदि की खरीदी इसमें की जाती है।

एक बाजार पूरी तरह हथियारों का ही होता है। शहरी एवं विदेशी-देशी सैलानी इन कलात्मक अस्त्र शस्त्रों की खरीदी घरेलू सजावट के लिये करते हैं। वागड़ अँचल में भिन्न-भिन्न स्थानां पर ढोल, नगाड़े, कौण्डियां, टाँसे, तानपूरे, शहनाई, बांसुरी, बाँस के वाद्य आदि का निर्माण होता है, ये सब लोग इन्हें लेकर बेणेश्वर मेले में जमा होते हैं व वाद्यों को बजा-बजा कर मेलार्थियों को अपनी ओर आकर्षित कर इनकी बिक्री करते हैं।

आज के  झाडुओं को कहीं पीछे छोड़ देने वाले सदियों से प्रचलित ‘‘फणगे‘‘ व ‘लोटवाणियां’  यहीं की देन हैं। खजूर के पर्णां से फणगे (झाडू) बनाने का काम गाँवों में बडे़ पैमाने पर होता है। घर की साफ-सफाई में भी ये अधिक कारगर तथा टिकाऊ होते हैं। मेले में बैर सहित अन्य वानस्पतिक सामग्री, जड़ी-बूटियाँ भी खूब बिकती हैं।

घर-गृहस्थी व खेती-बाड़ी का हर सामान उपलब्ध

क्षेत्र के गन्ना उत्पादकों के लिये बेणेश्वर  बड़ा गन्ना बाजार उपलब्ध कराता है। गन्ने की बिक्री के साथ ही गन्ने के रस की दुकानें  धड़ल्ले से चलती हैं। मिर्च-मसाले, रस्सियाँ, वाण आदि के अलावा घर-गृहस्थी के काम आने वाली तमाम चीजों की वार्षिक खरीदी इसमें होती है। श्रृंगार प्रसाधनों, पान की दुकानें तथा गोदना गुदवाने में रत मेलार्थियों की भीड़ परंपरागत शौक को अच्छी तरह अभिव्यक्त करती है।

वागड़ी व्यंजनों का स्वाद

अब फोटोग्राफी और सेल्फि का शौक भी परवान चढ रहा है। होटल उद्योग के ग्रामीण संस्करण के रूप में दाल-बाटी की भी दुकानें लगती हैं। आधुनिक संदर्भां में देखा जाए तो मार्बल के बने चकरोटे, साज-सामान, खिलौने आदि भी बिकने आते हैं।

यहाँ के प्रचलित स्थानीय उत्पादों का जिक्र परंपरा से लोक गीतों में भी होता रहा है। आस्थावादी मेलार्थियों के लिये रत्न, रूद्राक्ष, शंख, मालाएँ, अंगूठियाँ, नंग, जडी-बूटियाँ, धार्मिक फोटो, श्रद्धा चिह्नों आदि की दुकानें सजती हैं। गाड़िया लुहारों एवं स्थानीय लुहारों को लोहे के चिमटे, सण्डासी, तवे, चम्मच, कड़चियां, दाँतले, हँसियाँ, थालियां आदि बेचते देखा जा सकता है। इसके अलावा सिले-सिलाए कपडे़, स्टील, लोहा-पीतल के बर्तन, प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ, पाषाण प्रतिमाएँ आदि भी मेले का अंग हुआ करती हैं।

देश भर से आते हैं कारोबारी

स्थानीय उद्यमियों की बहुतायत के अलावा इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश तथा देश के अन्य हिस्सों से भी व्यापारी आते हैं। लगभग तमाम उद्योगों का प्रतिनिधित्व करने वाले बेणेश्वर मेले में सदियों से स्वदेशी जागरण का शंखनाद होता रहा है।

इन प्राचीन परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए वनाँचल के परंपरागत लघु एवं कुटीर उद्यमियों को सुविधाएँ देकर आधुनिक बनाये जाने और मेला बाजारों के साथ ही पृथक से इनके द्वारा उत्पादित माल के विपणन की सुविधा का विस्तार किये जाने की दिशा में सार्थक प्रयास किए जाकर वागड़ की स्वदेशी उद्योग परम्परा को समृद्ध बनाया जा सकता है। इस दिशा में सरकार को प्रयास करना चाहिए।

Source: