रविवार दिनांक 23-8-2026 को गुरुकुल पौंधा, देहरादून में 36 नये ब्रह्मचारियों का प्रवेश हुआ। इस प्रवेश के अवसर पर किए जाने वाले संस्कार को उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार कहते हैं।
इस अवसर पर नये प्रवेशार्थियों को आशीर्वाद देने के लिए स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी, स्वामी मुक्तानन्द सरस्वती जी, रोजड़-गुजरात एवं उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी के सचिव एवं वैदिक विद्वान डा. विनय विद्यालंकार जी गुरुकुल पधारे पधारे थे।
प्रवेशार्थी बालकों के अभिभावक एवं स्थानीय आर्यसमाज के बन्धु भी बड़ी संख्या में इस संस्कार यज्ञ में उपस्थित थे। उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी, डा. विनय विद्यालंकार जी, स्वामी मुक्तानन्द सरस्वती जी एवं आचार्य डा. धनंजय आर्य जी ने ब्रह्मचारियों एवं श्रोताओं को सम्बोधित किया।
कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
हम यहां उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार यज्ञ के ब्रह्मा आदरणीय डा. विनय विद्यालंकार जी का पूरा व्याख्यान प्रस्तुत कर रहें हैं।
डा. विनय विद्यालंकार जी का व्याख्यान अविकल रूप में प्रस्तुत है: ओ३म् पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह।
वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम्।।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। पूज्यपाद स्वामी जी महाराज, मंचस्थ पूज्य स्वामी मुक्तानन्द जी महाराज, मंच पर विराजमान अन्य संन्यासीगण तथा उपस्थित सभी मातृशक्ति को मेरा प्रणाम!
मैं अपने संबोधन में अधिक समय नहीं लूँगा। मैं प्रातःकाल से ही आपके बीच हूँ। पूज्य स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी महाराज के आशीर्वाद के बाद हमारे लिए कुछ बोलने का औचित्य भी नहीं रह जाता, क्योंकि स्वामी जी का आशीर्वाद केवल शब्द नहीं हैं, वह उनका पूरा जीवन है।
स्वामी जी महाराज ने अपना सम्पूर्ण जीवन संस्कृत, गुरुकुल, गुरुकुलीय शिक्षा, गुरुकुलों की स्थापना और ब्रह्मचारियों के निर्माण के लिए समर्पित किया है। हम जैसे हजारों विद्यार्थियों के जीवन का निर्माण उन्होंने किया है।
मैं विशेष रूप से ब्रह्मचारियों से दो-चार बातें कहना चाहता हूँ।
मैंने अभी अथर्ववेद के वाचस्पति-सूक्त का दूसरा मन्त्र बोला हैः “पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह।
वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम्।।”
इस मन्त्र में मनुष्य के निर्माण की प्रक्रिया का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाव है। हमारे ऋषियों ने मनुष्य के निर्माण के लिए जो मार्ग बताया है, उसमें कुछ शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
आप लोगों ने हिन्दी में एक शब्द सुना होगा - पिपासा। छोटे बच्चों को भी पिपासा होती है। पिपासा अर्थात् पानी पीने की इच्छा।
इसी प्रकार एक शब्द है - बुभुक्षा। बुभुक्षा अर्थात् भोजन की इच्छा।
और तीसरा शब्द है - जिज्ञासा। यह शब्द तो आपने अवश्य सुना होगा। जिज्ञासा का अर्थ है - जानने की इच्छा।
मैंने ये तीन शब्द क्यों कहे? क्योंकि ये हमारे जीवन के प्रमुख आधार हैं। शरीर की दृष्टि से मैंने पिपासा और बुभुक्षा की बात कही। लेकिन भारतीय संस्कृति, मैं विशेष रूप से वैदिक संस्कृति की बात कर रहा हूँ, के दो प्रमुख आधार हैं - ऋषि-प्रधान और कृषि-प्रधान।
हमारी संस्कृति ऋषि-प्रधान भी है और कृषि-प्रधान भी।
कृषि से प्राप्त होने वाले पदार्थ हमारे स्थूल शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। और ऋषियों द्वारा किए गए अन्वेषण, चाहे वे भौतिक पदार्थों के सम्बन्ध में हों अथवा आत्मा के सम्बन्ध में, हमारी आत्मिक सुधा की पूर्ति करते हैं।
जब हमारी दोनों प्रकार की भूख शान्त होती है, तब वास्तविक मनुष्य-निर्माण प्रारम्भ होता है।
पहले भूख लगे, तभी भोजन की आवश्यकता अनुभव होगी। उसी प्रकार ज्ञान की भूख भी उत्पन्न होनी चाहिए।
इसलिए ब्रह्मचारियों! अपने भीतर सुश्रूषा उत्पन्न करो।
सुश्रूषा का अर्थ है - ध्यानपूर्वक सुनने और सीखने की इच्छा।
विद्यार्थी कभी-कभी कहते हैं - “बहुत बोर हो गए।’ आचार्य जी चार-चार घंटे से बोल रहे हैं।”
लेकिन ब्रह्मचारियों! यदि ज्ञान को ग्रहण करना है, तो अपने भीतर सुनने की उत्कट इच्छा पैदा करनी होगी।
स्वामी जी महाराज के लिए भी यह कोई साधारण कार्यक्रम नहीं है कि वे लगातार चार-पाँच घंटे एक ही आसन पर बैठे हैं। पहले शरीर में वह सामथ्र्य अधिक था, अब दायित्व भी बहुत हैं और व्यस्तताएँ भी बहुत हैं।
इसलिए ब्रह्मचारियों, मैं आपसे कहता हूँ - बुद्धि के विकास के लिए सुश्रूषा पैदा करो और आत्मा की उन्नति के लिए जिज्ञासा पैदा करो।
ये दो शब्द अपने साथ लेकर जाओ - सुश्रूषा और जिज्ञासा।
और अन्त में मन्त्र का यह भाव अपने जीवन में धारण करोः “मय्येवास्तु मयि श्रुतम्।”
अर्थात् जो ज्ञान हमने गुरुजनों के मुख से सुना है, वह हमारा हो जाए, वह हमारे भीतर स्थिर हो जाए।
आज संसार में बहुत कुछ सुना जा रहा है। पूरे समय टेलीविजन चल रहे हैं, व्याख्यान हो रहे हैं, उपदेश दिए जा रहे हैं, लेकिन सुना हुआ ज्ञान हमारा नहीं बन पा रहा है।
इसलिए ब्रह्मचारियों! हमें इस ज्ञान को अपनी सम्पदा बनाना है। पूज्य स्वामी जी महाराज ने हमें जो ज्ञान दिया है, उसे केवल सुनना नहीं है, उसे अपने जीवन में उतारना है।
अब मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूँ। आचार्य धनंजय जी ने घोषणा की है कि जो विद्यार्थी संस्कृत में बोलते हैं और संस्कृत में संभाषण करने का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, उनके लिए गुरुकुल में अन्न, भोजन और शिक्षा आदि की व्यवस्था की जाएगी।
मैं उत्तराखण्ड सरकार की संस्कृत अकादमी का प्रतिनिधि (आप सचिव के पद पर हैं) होने के नाते यह बात आपके सामने रख रहा हूँ कि यदि कोई विद्यार्थी बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की बड़ी शिक्षा न भी ले पाए, लेकिन संस्कृत में अच्छा संभाषण करना सीख ले, तो उसके लिए संस्कृत के क्षेत्र में अनेक अवसर उपलब्ध हैं।
उत्तराखण्ड सरकार संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए निरन्तर कार्य कर रही है। संस्कृत के प्रशिक्षण और संभाषण को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक सहायता की योजनाएँ भी चल रही हैं।
आपको यह भी ज्ञात है कि उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा संस्कृत है। उत्तराखण्ड भारत का पहला राज्य है जिसने संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया।
उत्तराखण्ड के तेरह जनपदों में तेरह ग्रामों को संस्कृत ग्राम के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन ग्रामों में संस्कृत प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। वहाँ बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक, माताओं और बहनों सहित सभी को संस्कृत सिखाई जा रही है।
10 अगस्त को इन तेरह ग्रामों में संस्कृत के वार्षिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। वहाँ ऐसी माताएँ भी संस्कृत बोलती दिखाई दीं जिन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।
हमारा शिक्षक पूछता हैः “माते! तव किं नाम?”
उत्तर मिलता हैः “मम नाम कुन्ती देवी।”
फिर पूछा जाता हैः “कुत्र गच्छसि?”
और वे संस्कृत में उत्तर देती हैं। यह देखकर अत्यन्त प्रसन्नता होती है कि संस्कृत अब केवल छोटे बच्चों तक सीमित नहीं है। समाज के सभी वर्गों में संस्कृत का वातावरण बन रहा है।
आज आप उत्तराखण्ड सचिवालय जाइए। वहाँ आईएएस और पीसीएस अधिकारी कार्य करते हैं। अनेक स्थानों पर नाम आदि संस्कृत में लिखे जा रहे हैं। हमारे शिक्षक विधानसभा में विधायकों को संस्कृत बोलना सिखा रहे हैं और सचिवालय में अधिकारियों को संस्कृत का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
इस प्रकार उत्तराखण्ड में संस्कृत का वातावरण निरन्तर बन रहा है।
और इस कार्य का बीज पूज्य स्वामी जी महाराज ने बहुत पहले बोया था। सन् 2000 में उत्तराखण्ड में संस्कृत और गुरुकुलीय शिक्षा के क्षेत्र में जो पौधा उन्होंने लगाया था, आज वह वृक्ष बन रहा है।
आज जब प्रान्तीय संस्कृत प्रतियोगिताएँ होती हैं, तो हमारे गुरुकुलों के विद्यार्थी उनमें प्रथम स्थान प्राप्त करते हैं। पतंजलि विद्यापीठ से भी संस्कृत प्रतियोगिताओं के सम्बन्ध में जानकारी माँगी जाती है। यह सब पूज्य स्वामी जी महाराज द्वारा लगाए गए उस संस्कृत-गुरुकुल रूपी पौधे का परिणाम है।
यदि स्वामी जी महाराज ने वह पौधा न लगाया होता, तो आज उत्तराखण्ड में सनातन वैदिक संस्कृति का यह ध्वज इतनी ऊँचाई पर कैसे फहराता?
इसलिए इसका बहुत बड़ा श्रेय पूज्य स्वामी (प्रणवानन्द सरस्वती) जी महाराज को जाता है।
सरकार अपना कार्य कर रही है, लेकिन गुरुकुल जो कार्य कर रहे हैं, उसका अपना विशेष महत्त्व है।
हमारे अधिकारी जब विभिन्न विद्यालयों में जाते हैं तो वहां उन्होंने स्वयं अनुभव किया है कि सामान्य विद्यालयों की अपेक्षा गुरुकुलों में शिक्षा का वातावरण अलग प्रकार का होता है। गुरुकुल, पौंधा और कन्या गुरुकुल द्रोणस्थली जैसे गुरुकुलों में जो संस्कार और शिक्षा का वातावरण मिलता है, वह अत्यन्त विशिष्ट है।
इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि अपने घरों को भी गुरुकुल बनाइए।
जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को गुरुकुल भेजा है, वे साधुवाद और धन्यवाद के पात्र हैं। लेकिन जो माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल नहीं भेज पाए, वे अपने घर में भी गुरुकुलीय दिनचर्या लागू कर सकते हैं।
और एक बात सीख लीजिए, यदि आपका बच्चा गुरुकुल में नहीं पढ़ता है, तो आप किसी गुरुकुल के विद्यार्थी की शिक्षा में सहयोग देकर उसके अभिभावक बनने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
जो धनवान सज्जन यहाँ बैठे हैं और जिनके बच्चे गुरुकुल में नहीं पढ़े हैं, वे किसी विद्यार्थी की शिक्षा का दायित्व ले सकते हैं।
गुरुकुल बच्चों को प्रवेश भी देता है और समाज के लोगों को संस्कारवान बच्चों के निर्माण में सहयोग करने का अवसर भी देता है। ये दोनों अवसर आपके सामने हैं। इनका सदुपयोग कीजिए।
दुनिया में बहुत लोगों ने बहुत धन संग्रह किया और चले गए। ऐसे-ऐसे लोग हैं जिनकी करोड़ों रुपये की एफडी पड़ी हुई है, लेकिन धन समाज के काम नहीं आ रहा।
मैं पूछता हूँ, ये गुरुकुल कैसे चलेंगे? गुरुकुल की ओर से हम सबका यही आग्रह रहता है कि आप हमें सहयोग दीजिए, हम आपको संस्कृति, संस्कार और संस्कारवान जीवन देने का विश्वास दिलाते हैं।
आपका सहयोग मिलेगा तो ये गुरुकुल समाज को संस्कारवान संतानों और संस्कृति-संपन्न जीवन देने का कार्य करते रहेंगे।
अब मैं अपनी बात को यहीं विराम देता हूँ। पूज्य स्वामी जी महाराज का आदेश हुआ और हमें यहाँ बैठने का अवसर मिला। आज हम उन दिनों को याद करते हैं जब हम अपने गुरुजनों के चरणों में बैठकर पढ़ा करते थे।
आचार्य धनंजय जी ने सभागार में अपनी स्मृतियाँ सुनाईं हैं और पूज्य स्वामी जी महाराज की स्मृतियों को भी हमारे सामने रखा।
मैं तो छठी कक्षा से ही गुरुकुल जाना चाहता था, लेकिन मेरी माता जी ने मुझे गुरुकुल नहीं जाने दिया। स्वामी शान्तानन्द जी महाराज मुझे लेने आए थे। मेरे पिताजी से कहा गया कि बेटे को गुरुकुल भेज दीजिए। मेरी माता जी ने कहा - “नहीं बाबा जी, यह तो संन्यासी बन जाएगा।”
छठी में नहीं जाने दिया गया, आठवीं में भी नहीं जाने दिया गया।
फिर मेरे एक भाई ने कहा कि हाई स्कूल का बोर्ड बहुत कठिन होता है, इसलिए वह गुरुकुल जाना चाहता है। स्वामी जी! उनकी यह बात मेरे लिए चुनौती बन गई।
मैंने कहा - “पहले हाई स्कूल पास करके दिखाऊँगा, फिर गुरुकुल जाऊँगा।”
मैंने उत्तर प्रदेश बोर्ड से हाई स्कूल उत्तीर्ण किया और फिर कहा - “अब मुझे गुरुकुल भेजिए।”
लेकिन तब घर में सबने कहा - “अब क्या करेगा? विद्यालय में ही पढ़ो।”
आखिर मैं घर से भाग गया और गुरुकुल, एटा पहुँच गया। बाद में पिताजी ने गुरुकुल में मेरा प्रवेश कराया।
आज मेरे जीवन में जो कुछ भी है, उसमें उस गुरुकुलीय शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है।
यदि मैं गुरुकुल न गया होता तो शायद कहीं पुलिस इंस्पेक्टर बनकर चैराहे पर खड़ा होता और लोगों को डाँट रहा होता। थोड़ी और बुद्धि होती तो शायद कहीं क्लर्क बन जाता। शायद आईएएस भी बन जाता।
लेकिन गुरुकुल ने मुझे जो जीवन दिया, वह केवल किसी नौकरी से प्राप्त नहीं हो सकता था।
आज मुझे स्वामी जी महाराज के साथ अनेक देशों में जाने का अवसर मिलता है। यह अवसर मुझे केवल इसलिए प्राप्त हुआ कि मैंने गुरुकुलीय शिक्षा प्राप्त की।
इसलिए ब्रह्मचारियों! इस गुरुकुल को छोटा मत समझना और इस शिक्षा को छोटी मत समझना।
यह शिक्षा जीवन का निर्माण करती है। गाँव-गाँव में संस्कृत और गुरुकुलीय शिक्षा का वातावरण बनाना हम सबका दायित्व है।
एक बात और। मैंने एक ब्रह्मचारी से पूछा - “वर्ष में छुट्टी होती है?”
उसने कहा - “नहीं, केवल एक बार।” जो गुरुकुल बीच-बीच में बहुत अधिक छुट्टियाँ करते हैं, उनके बच्चे प्रायः घर में रह जाते हैं। लेकिन हमारी गुरुकुल परम्परा में जून में आए हुए बच्चे जुलाई में प्रवेश लेते हैं और अगले जून में ही कुछ दिनों के लिए घर जाने का अवसर मिलता है।
इससे बच्चे पूरे वर्ष गुरुकुल के वातावरण में रहते हैं, संस्कार ग्रहण करते हैं और धीरे-धीरे परिपक्व होते जाते हैं।
फिर जब उन्हें घर की याद आती है, तो उसके पीछे भी कई कारण होते हैं। उनमें एक कारण माता-पिता का बार-बार फोन करना भी है।
इसलिए यदि किसी माता-पिता को अपने बच्चे से बात करने का अवसर मिले, तो उसे यह मत कहिए - “बेटा, हम तुम्हें लेने आ रहे हैं।”
बल्कि उससे कहिए: “बेटा! तुम वहीं रहो, मन लगाकर पढ़ो और गुरुकुल की शिक्षा पूर्ण करो।”
जैसे माता अपनी बेटी को विदा करते समय उसके सुख और भविष्य की कामना करती है, वैसे ही माता-पिता को भी अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें गुरुकुल के संस्कारमय वातावरण में दृढ़तापूर्वक बनाए रखना चाहिए।
इसी भावना के साथ मैं पूज्य स्वामी जी महाराज, सभी आचार्यगण, ब्रह्मचारियों, मातृशक्ति और उपस्थित सभी महानुभावों को प्रणाम करता हूँ।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सभी विद्वान एवं श्रोता आपस में मिले। श्रोताओं ने विद्वानों से आशीर्वाद लिया। सबने सामूहिक भोजन किया और आज का कार्यक्रम समाप्त हुआ। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक डा. विनय विद्यालंकार जी का यह व्याख्यान, सम्बोधन वा उपदेश पसन्द करेंगे। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121
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