आज हम आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय साप्ताहिक सत्संग में सम्मिलित हुए। आर्यसमाज में आज प्रातः 8.00 बजे से समाज की यज्ञशाला में आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित श्री विद्यापति शास्त्री के ब्रह्मत्व में यज्ञ सम्पन्न किया गया।
यज्ञ में आर्यसमाज के सदस्यगण एवं बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित हुए। यज्ञ के बाद समाज के सभागार मे सत्संग का आरम्भ हुआ।
आश्रम के बच्चों ने भजन प्रस्तुत किया तथा सामूहिक प्रार्थना भी कराई। आर्यसमाज के पुरोहित श्री विद्यापति शास्त्री जी ने ऋषि दयानन्द के जीवन चरित से कुछ अंशों का पाठ किया।
उन्होंने एक भजन भी प्रस्तुत किया। आज समाज मन्दिर में ब्रह्मचारी भीम देव जी पधारे थे।
उन्होंने भी श्रोताओं को सम्बोधित किया। आज का मुख्य प्रवचन आर्यसमाज के विद्वान आचार्य डा. धीरज शास्त्री, बागपत का था।
आचार्य जी ने वेद एवं वैदिक विचारधारा की महत्ता पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
आचार्य डा. धीरज शास्त्री जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आर्यसमाज वेदों का प्रचार करता है।
चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद अपौरुषेय अर्थात् ईश्वर के द्वारा प्रदत्त ज्ञान है जिन्होंने सृष्टि के आदि काल में ऋषियों ने लिपिबद्ध किया था तथा अब यह वर्तमान समय में पुस्तकों के रूप में उपलब्ध होते हैं।
आचार्य जी ने बताया कि वेदों के अतिरिक्त संसार के सभी ग्रन्थों की रचना समय समय पर मनुष्यों ने की है। परमात्मा को आचार्य जी ने सर्वज्ञ अर्थात् संसार के विषय में सब कुछ सत्य-सत्य जानने वाला बताया।
उन्होंने बताया कि सभी ऋषि वेदों को स्वतः प्रमाण एवं परम प्रमाण मानते थे।
आचार्य धीरज शास्त्री जी ने कहा कि वेद परमात्मा की निज शक्ति से अभिव्यक्त हुए हैं। इसी कारण वेदों की सभी मान्यतायें व बातें सत्य हैं एवं धर्म आदि विषयों में परम प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज संसार में ऐसी संस्था है जो वेदों को स्वीकार करती है और वेदों की मान्यताओं का देश देशान्तर में प्रचार करती है।
आचार्य धीरज शास्त्री जी ने कहा कि वेदों में उन सभी समस्याओं का समाधान हैं जो आज के समय में मनुष्य जाति के समक्ष विद्यमान हैं।
उन्होंने कहा कि आज हम वेदों से दूर हो गये हैं इसलिये वेदों का जितना प्रचार व प्रसार देश व विदेशों में होना चाहिये था, उतना नहीं हो पा रहा है।
आचार्य जी ने बताया कि वेदों में मनुष्य को अग्नि कहा गया है। मनुष्य को वेदों में क्रतु अर्थात् कर्मों को करने वाला भी कहा है।
उन्होंने कहा कि संसार में गति व प्रकाश अग्नि के कारण है। हम भी अग्नि के गुणों को अपने अन्दर धारण करके उसके समान बनें।
आचार्य जी ने कहा कि जिसके अन्दर अग्नि के गुण होते हैं वही समाज में अग्रणीय होता है।
आर्यसमाज के विद्वान आचार्य धीरज जी ने मनुष्य के जीवन में स्वाध्याय एवं सत्संग को आवश्यक बताया और कहा कि इससे मनुष्य में प्रतिभा तथा योग्यता अर्थात् अग्नि उत्पन्न होती है। आचार्य जी ने यह भी कहा कि वेद ईश्वर प्रदत्त संविधान है। जो मनुष्य वेदों के विपरीत आचरण करता है वह ईश्वर से दण्डनीय होता है। उनके अनुसार वेदों के अनुकूल आचरण ही धर्म वा धर्माचरण है तथा वेद विपरीत आचरण ही अधर्माचरण है।
व्याख्यान की समाप्ति पर आर्यसमाज के मंत्री श्री धीरेन्द्र मोहन सचदेव जी ने विद्वान वक्ता आचार्य डा. धीरज शास्त्री जी का धन्यवाद किया।
उन्होंने सूचना देते हुए बताया कि आर्यसमाज आगामी 23 सितम्बर से 27 सितम्बर, 2026 तक 5 दिवसीय वेद प्रचार सप्ताह आयोजित कर रहा है जिसमें प्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य डा. वागीश आर्य जी, एटा तथा भजनोपदेशिका बहिन कल्याणी आर्या जी, हरयाणा पधार नहीं हैं।
शान्ति पाठ के साथ आज की सभा का विसर्जन हुआ। आज के आयोजन में बड़ी संख्या में स्त्री व पुरुष तथा बाल वनिता आश्रम के बच्चे उपस्थित थे।
आयोजन में श्री सुधीर गुलाटी जी, श्री ज्ञान चन्द गुप्ता जी, श्री नवीन भट्ट जी, श्री सतीश आर्य जी, श्री देवेन्द्र कुमार सैनी, श्री लक्ष्मण आर्य, श्री कुलभूषण कठपालिया जी, श्री देवकी नन्दन शर्मा जी, माता सुदेश भाटिया जी, माता जगवती चैधरी, माता स्नेहलता खट्टर जी आदि अनेक विद्वान एवं मातायें उपस्थित हुए।
ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121