उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में चल रहे धार्मिक अनुष्ठान के दौरान प्रवचन आयोजित हुआ।
डॉ सुरेंद्र मुनि ने भक्तामर स्तोत्र की महत्ता बताते हुए कहा कि सच्ची भक्ति निष्काम भाव से की जानी चाहिए।
भक्ति में किसी फल की इच्छा नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए।प्रवचन में बताया गया कि आचार्य मानतुंग जी ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की वंदना की थी।
भक्तामर स्तोत्र की 48 गाथाओं में विशिष्ट बीज मंत्रों एवं यंत्रों का अनुपम प्रयोग समाहित है। श्रद्धापूर्वक साधना करने से जीवन में आध्यात्मिक आनंद एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
श्रीमद् भक्तामर स्तोत्र के द्वितीय श्लोक को वैर, विरोध, संताप एवं कष्टों से मुक्ति का साधन बताया गया।
साधना का विशेष लाभ समाजसेवी हिम्मत मेहता ने प्राप्त किया।धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने विनय धर्म को धर्म का मूल बताते हुए कहा कि विनय से जीवन में सुख-शांति आती है तथा संघ, समाज और परिवार में समृद्धि बढ़ती है।
अहंकार को दुख एवं पतन का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि विनय के अभाव में मनुष्य तनाव और अनेक कष्टों से घिर जाता है।श्रीसंघ अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन ने बताया कि कार्यक्रम में तपस्विनी बहन श्रीमती चंचल वडाला का भावभीना अभिनंदन किया गया।
श्रद्धालुओं का मेहता परिवार द्वारा बहुमान किया गया। उपाध्याय रमेश मुनि एवं दीपेश मुनि ने मंगल भाव प्रदान किए।
महामंत्री हिम्मत बड़ाला ने बताया कि आगामी 20 सितंबर को आचार्य शिव जयंती पर सामूहिक एकाशन, तप एवं जप का आयोजन होगा।