विश्व पर्यटन दिवस हर वर्ष 27 सितंबर को मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आगमन के लिहाज से भारत 2024 में विश्व में 20वें स्थान पर रहा था। पिछले कुछ वर्षों में भारत में धार्मिक और मेडिकल टूरिज्म लगातार बढ़ता जा रहा है। जहां तक राजस्थान की बात आती हैं प्रदेश की बहुरंगी संस्कृति के कारण प्रदेश का अंतर्राष्ट्रीय महत्व भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।
विदेशी पर्यटकों को तो राजस्थान बेहद आकर्षित करता ही है लेकिन पिछले वर्षों में राजस्थान में घरेलू देशी पर्यटकों का सैलाब भी उमड़ता जा रहा है। भारत के राज्यों में विदेशी पर्यटक यात्राओं के मामले में राजस्थान पांचवें स्थान पर रहा। घरेलू पर्यटन में भी राजस्थान 23 करोड़ से अधिक पर्यटक यात्राओं के साथ देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है।
भारत का सबसे बड़ा भौगोलिक प्रदेश अपने हेरिटेज, भव्य किलों,राज महलों, हवेलियों,झीलों,वन अभ्यारण्यों से लेकर पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान की रेत से उठती लोकसंगीत की सुरलहरियों तक, केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति की विश्वव्यापी पहचान है।
27 सितंबर को मनाया गया विश्व पर्यटन दिवस पर्यटन के आर्थिक महत्व के साथ-साथ विभिन्न देशों और संस्कृतियों के बीच संवाद, समझ और आपसी जुड़ाव को रेखांकित करता है।
राजस्थान इस भावना का सशक्त उदाहरण है। क्योंकि यहां इतिहास, लोककला, संगीत, नृत्य, खान-पान, पहनावा, मेले-त्योहार और अतिथि- सत्कार इस तरह घुले-मिले हैं कि राजस्थान आने वाला पर्यटक केवल बेजोड़ स्थलों को ही नहीं देखता, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव लेकर लौटता है।
भारत के पर्यटन मानचित्र पर राजस्थान की पहचान उसके किलों, महलों और रेगिस्तान से कहीं आगे जा रही है। यूनिसेफ की हेरिटेज सूची में शामिल आमेर, चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर, गागरोन और जैसलमेर जैसे दुर्ग इतिहास की विराट गाथा कहते हैं।
शेखावाटी, बीकानेर एवं जयपुर की हवेलियां और महल स्थापत्य की विशिष्ट परंपरा से परिचित कराते हैं तो उदयपुर की झीलें राजसी सौंदर्य का अलग संसार रचती हैं।
इन ऐतिहासिक धरोहरों को जीवंत बनाने वाली लोक संस्कृति ही राजस्थान को विशिष्ट बनाती है।
राजस्थान के घूमर, कालबेलिया, कठपुतली और मांगणियारों की संगीत परंपरा यहाँ की सांस्कृतिक पहचान को सीमाओं के पार ले जाती है।
कालबेलिया नृत्य को भी यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में स्थान मिला है जो इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान की लोक परंपराओं का महत्व भारत की सीमाओं से आगे तक है।
लोकवाद्यों की धुन, पारंपरिक गीत और रंग-बिरंगे परिधान विदेशी पर्यटकों के लिए राजस्थान को एक विशिष्ट सांस्कृतिक अनुभव कराते हैं।राजस्थान के मेले और त्योहार भी राज्य की एक बड़ी पर्यटन की ताकत हैं।
पुष्कर का मेला, जैसलमेर का डेजर्ट फेस्टिवल, जयपुर का तीज एवं गणगौर उत्सव और बीकानेर का ऊंट उत्सव देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इन आयोजनों में स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और छोटे कारोबारियों को अपनी प्रतिभा और उत्पादों के लिए मंच मिलता है।
राजस्थान की हस्तशिल्प परंपरा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश की पहचान मजबूत करती है। ब्लॉक प्रिंटिंग, बंधेज, लहरिया, नीली पॉटरी, मीनाकारी, लाख की चूड़ियां, चमड़े का काम और पारंपरिक आभूषण स्थानीय कौशल को वैश्विक बाजार तक पहुंचाते हैं। पर्यटन और हस्तशिल्प का यह रिश्ता गांवों और छोटे शहरों में रोजगार के अवसर पैदा करने की क्षमता रखता है।
आज पर्यटन की परिभाषा भी बदल रही है। पर्यटक अब केवल स्मारक देखने नहीं, बल्कि अनुभव लेने आते हैं।
ग्रामीण पर्यटन, विरासत होटल, लोकसंगीत, पारंपरिक भोजन, रेगिस्तानी सफारी और स्थानीय जीवन से जुड़ाव राजस्थान को इस बदलते पर्यटन दौर में नई संभावनाएं देते हैं।विश्व पर्यटन दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यटन केवल अर्थव्यवस्था का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने का सेतु भी है।
राजस्थान के सामने सबसे बड़ी चुनौती आधुनिक पर्यटन की जरूरतों को जोड़ते हुएअपनी सांस्कृतिक विरासत एवं उसकी मौलिकता बनाए रखने की है।
रेगिस्तान की सुनहरी रेत पर गूंजती कमायचा की तान से लेकर किलों की प्राचीरों तक राजस्थान दुनिया को यह संदेश देता है कि जिस संस्कृति में अपनी जड़ों की ताकत और बदलते समय के साथ चलने की क्षमता हो, वह सीमाओं से परे जाकर विश्व की साझा विरासत बन सकती है।
विश्व पर्यटन दिवस 2026 की थीम ‘डिजिटल एजेंडा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से पर्यटन का पुनर्रूपांकन’ रखी गई है जोकि भारत के साथ राजस्थान के लिए भी विशेष संदेश देने वाली है।
प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि दुनिया राजस्थान को देखने आए, बल्कि यह भी है कि राजस्थान अपनी हजारों वर्ष पुरानी विरासत को डिजिटल तकनीक और एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के माध्यम से दुनिया के हर कोने तक कैसे पहुंचा सके?
इस दिशा में गंभीर प्रयास और काम करने की आवश्यकता है।