उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभाग द्वारा अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उदयपुर एवं राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना’ का उद्घाटन सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर स्थित गोल्डन जुबली गेस्ट हाउस में हुआ।

मुख्य अतिथि हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलगुरु प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में साहित्य और राष्ट्र के अंतर्संबंधों पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा भारत राष्ट्र का निर्माण शासकों की तुलना में कवियों ने अधिक प्रभावी ढंग से किया है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे साहित्य ने परतंत्र भारत की सुप्त चेतना को जाग्रत किया। उन्होंने तुलसीदास के ‘रामराज्य’ की व्याख्या करते हुए उसे वैज्ञानिक चेतना और शुचिता का प्रतीक बताया, जहाँ सत्ता के प्रति मोह नहीं बल्कि कर्तव्य की प्रधानता थी।
पाण्डे ने कहा कि हिंदी साहित्य ने सदैव राष्ट्र की आत्मा को स्वर दिया है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समकालीन सामाजिक परिवर्तनों तक साहित्य ने राष्ट्रीय चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया है। आज के समय में साहित्य और मीडिया दोनों की जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रबोध को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर प्रस्तुत करें।
अध्यक्षीय उद्बोधन में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी. पी. सारस्वत ने कहा कि हिंदी साहित्य की परंपरा राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के समन्वय की परंपरा है। संगोष्ठी का विषय समकालीन संदर्भों में अत्यंत प्रासंगिक है और इससे गंभीर वैचारिक विमर्श को दिशा मिलेगी।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार व परिषद के प्रदेश अध्यक्ष प्रो अन्नाराम शर्मा ने पाश्चात्य नैरेटिव्स (कथानकों) को चुनौती दी जो भारत को एक खंडित राष्ट्र के रूप में देखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ पश्चिम की राष्ट्र की संकल्पना राजनीतिक है, वहीं भारत की संकल्पना ‘सांस्कृतिक’ है। उन्होंने कहा कि मध्यकाल के संत केवल धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रीय वीर’ थे, जिन्होंने आक्रांताओं के समय भारतीय मानस की रक्षा की। उन्होंने वीरगाथा काल की राष्ट्रीयता को संकुचित कहे जाने वाले तर्कों का खंडन करते हुए उसे परंपरा की गौरवशाली कड़ी बताया।
विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार व परिषद के प्रांत अध्यक्ष विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ ने औपनिवेशिक काल के दौरान हमारी ज्ञान परंपरा पर हुए आघातों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विदेशी शासकों ने भारतीय इतिहास और शिक्षा को विकृत किया, लेकिन साहित्यकारों ने राष्ट्रीय संवेदना को सुरक्षित रखा। उन्होंने 1857 की क्रांति, भगत सिंह और वीर सावरकर के बलिदानों को याद करते हुए दिनकर और हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य को राष्ट्रीय बोध का मार्गदर्शक बताया। साथ ही, उन्होंने आधुनिक लेखिका मृदुला गर्ग के उपन्यासों का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ‘मंदोदरी’ जैसे पात्र आज के युवाओं के लिए पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं। विषय प्रवर्तन कार्यक्रम संयोजक डॉ. आशीष सिसोदिया द्वारा किया गया।
इस अवसर पर डॉ. आशीष सिसोदिया द्वारा संपादित अर्द्धवार्षिक पियर-रिव्यूड पत्रिका 'नव सृजन' के 14वें अंक का मंच पर उपस्थित अतिथियों द्वारा विमोचन भी किया गया।
संगोष्ठी की समन्वयक अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उदयपुर इकाई की अध्यक्ष आशा पाण्डे ओझा ने बताया कि पहले दिन दो सत्र आयोजित हुए। पहले सत्र की अध्यक्षता पत्रकारिता-जनसंचार विभाग के अध्यक्ष और परिषद के प्रांत मीडिया प्रमुख डा कुंजन आचार्य ने की। मुख्य वक्ता हिंदी विभाग के अध्यक्ष डा नवीन नंदवाना थे। मुख्य अतिथि डा अशोक पंड्या थे। दूसरे सत्र की अध्यक्षता राजस्थानी विभाग के अध्यक्ष डा सुरेश सालवी थे। सत्र के वक्ता डा मनीष सक्सेना और डा नीता त्रिवेदी थी। संचालन प्रियंका रावल ने किया।
दो दिवसीय संगोष्ठी के अंतर्गत विभिन्न तकनीकी सत्रों में देशभर से आए विद्वान हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के विविध आयामों—ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं वैचारिक—पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे।