बांसवाड़ा । भागवत गीता-महिमा स्वयं उद्घोषित करती है कि उपनिषदों के समस्त ज्ञान रूपी गौधन का सार ज्ञान-अमृत परात्पर ब्रह्म भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा सरल और सारगर्भित रूप में स्वयं ने अपने श्रीमुख से सम्पूर्ण मानवजाति को प्रदान किया गया है।
उपनिषदों की गहन दार्शनिक विवेचना जहाँ अनुभवी साधक के लिए है वहीं गीता उस वेदान्त को जीवन के मध्य संघर्षों में आचरित करने की कला है।
यह कहना है इस्कॉन उदयपुर के मंदिर अध्यक्ष आचार्य
मायापुर वासी प्रभु का वो आज सुभाष नगर प्रोफेसर कॉलोनी स्थित इस्कॉन केन्द्र बांसवाड़ा में सत्संग संकीर्तन भजन के साथ आयोजित धार्मिक समारोह को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक भक्त को कृष्ण भक्ति में गंभीर रहते हुए कृष्ण की सेवा में तत्पर रहना चाहिए क्योंकि उपनिषद् सत्य को प्रत्यक्ष करने की शिक्षा देते हैं कि आत्मा अजन्मा, अविनाशी है
इसलिए गीता सुगीता कर्तव्यां गीता का सुविचारित अध्ययन अनिवार्य है।
गीता के १८ अध्याय १८ सीढ़ियाँ हैं, जिनसे साधक अहंकार से शुद्धि, शुद्धि से भक्ति और भक्ति से ब्रह्मज्ञान तक पहुँचता है।
श्रीमद्भगवद्गीता वह महा ग्रन्थ है जो उपनिषदों का सार है ब्रह्मसूत्र की साकार अभिव्यक्ति है जीवन का मार्गदर्शन है मोक्ष का विज्ञान है, भक्ति का समर्पण है कर्म की पवित्रता है और ज्ञान की परम् ज्योति है। गीता भागवत का सन्देश है कि हम भी अर्जुन की भाँति भ्रम, भय, मोह से मुक्त होकर कर्तव्य पथ में स्थित हों और आत्मा के परम प्रकाश को पहचानें।
*न जायते म्रियते वा कदाचित्।*
उन्होंने बताया कि ब्रह्म सत्य है, नेति नेति; जीव-ईश्वर-जगत का रहस्य आध्यात्मिक अनुभव से प्रकट होता है। गीता इन उपनिषद्-वाक्यों को यथार्थ जीवन और परिस्थितियों में उतारकर मनुष्य को उस ज्ञान का अनुभव कराती है।ब्रह्मसूत्र का उद्घोष है कि अथातो ब्रह्म जिज्ञासा अब ब्रह्म के ज्ञान की इच्छा करो।
इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान में आचार्य अभिनंदन निमाई प्रभु ने बताया कि गीता सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि है जोकि स्वयं भगवान् योगेश्वर श्री कृष्ण की वाणी है और इसमें वही भावना प्रतिध्वनित होती है - तत्त्वविदः तत्त्वम् ज्ञानी ब्रह्म का तत्व बताते हैं जहाँ ब्रह्मसूत्र दार्शनिक सूत्र देता है, वहीं गीता उसे आचार-प्रयोग बनाकर जीवन-उन्मुख बनाती है।
इस अवसर पर आचार्य अभय गौरांग दास प्रभु ने गीता की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य भौतिक अकर्मण्यता, निराशा, भय और मोह का नाश करना है। गीता निष्काम कर्म द्वारा मन शुद्ध करती है ज्ञान द्वारा अहंकार को नष्ट करती है भक्ति द्वारा हृदय को परमात्मा में समर्पित करती है।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश है कि कर्तापन का अभिमान मनुष्य का नहीं, प्रकृति का है
*प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।*
इसी भाव को कठो पनिषद् कहता है कि इन्द्रियाँ स्वभावतः चलायमान हैं आत्मा साक्षी है। यह अद्वैत वेदान्त का सर्वोच्च शिखर है कि कर्म स्वभावत: होते हैं, परन्तु आत्मा अनासक्त और अकर्ता रहती है।क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की विवेचना बताती है कि शरीर-मन-बुद्धि क्षेत्र है, और उनका साक्षी आत्मा क्षेत्रज्ञ है, जो उपनिषदों का मर्म है। कर्म को ईश्वरार्पण करने पर मन निर्मल होता है।
इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान में आचार्य विश्व आत्मा दास ने कहा कि यह ब्रह्मसूत्र की अदृष्ट–निरोध की अवधारणा का विस्तार है। भक्ति योग पूर्ण समर्पण गीता की चरम घोषणा *मामेकं शरणं व्रज।*
भगवान् योगेश्वर श्री कृष्ण कहते है कि मेरी शरण में आ ज़ाओ में आपकी हर दुःख तकलीफ,पीड़ा को हर लूंगा।
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा कि पलायन समाधान नहीं अकर्मण्यता आत्म विनाश है भय अज्ञान का परिणाम है और मोह निर्णय का शत्रु है उठो, जागो अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो ! जीवन की दुविधाओं में तनाव, भय, मोह, असुरक्षा, जटिल दायित्व इन सबके बीच श्रीमद्भगवद्गीता ही मनुष्य को स्थिर बुद्धि, दृढ़ता और संतुलन प्रदान करती है।
इस अवसर पर चन्द्र कांता वैष्णव और साधिका श्रीमति रचना व्यास ने तुलसी नृसिंह आरती विधान अभिषेक पूजा विधान पूर्ण करते हुए विभिन्न श्रद्धालुओं के जिज्ञासा को आचार्य श्री ने समाधान किया।
इस अवसर पर समारोह में शामिल कृपाली भट्ट,कुशल डिम्पल,सुनील, किशोर पंड्या, ओड्रिला, शिल्पा, रतन,दीपा हिमानी पाठक,अचिंत्य दृष्टि, अक्षी,शाबुनी मंडल,अरुण व्यास दीपिका,रचना व्यास, विभा,अर्चना,अनिता,भारती, चैतन्य, नीरज पाठक,प्राण नाथ निमाई , सुरेश , सुनील , चरण रेनू , रचना, नैमिष,अचिंत्य दशरथी, निखिल,अजय,रौनक, कुशल खुशी त्रिवेदी,सहित कई साधक साधिकाओं श्रद्धालुओं ने संकीर्तन भजन ओर अनुष्ठान में भाग लिया और महामंत्र हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे पर देर रात तक झूमते रहे।