सभ्य समाज की पहचान उसकी तकनीक से नहीं, बल्कि उसके रिश्तों की स्थिरता और सामाजिक संतुलन से होती है। जब रिश्ते स्थायी न रहकर सुविधा और भुगतान पर आधारित होने लगें, तब यह केवल जीवनशैली में बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी बन जाता है।
यूरोप के देश लैटविया में सामने आया “किराये का पति” जैसा चलन इसी चेतावनी का उदाहरण है। यह व्यवस्था महिलाओं द्वारा पुरुषों को घंटों के आधार पर घर के काम, मरम्मत या सामाजिक साथ के लिए बुलाने की है। इसे कुछ लोग व्यावहारिक समाधान मानते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह रिश्तों के बाज़ारीकरण की दिशा में एक गंभीर संकेत है।
रिश्तों का अनुबंध बनना- सुविधा है या संकट?
जब पति, मित्र या साथी आवश्यकता के अनुसार बदले जा सकें, तो रिश्तों की मूल भावना- विश्वास, जिम्मेदारी और त्याग धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। ऐसे रिश्ते समाज को चलाते तो हैं, लेकिन दिशा नहीं देते। यह स्थिति उस समाज की तरह है, जो गति में तो है, पर विचार और विवेक से वंचित। लैटविया की स्थिति केवल एक देश तक सीमित नहीं है। जापान में ‘रेंट ए फ्रेंड’, चीन में त्योहारों पर ‘किराये के रिश्ते’ और पश्चिमी देशों में अनुबंध आधारित सहजीवन- ये सभी आधुनिक समाज में बढ़ते अकेलेपन और पारिवारिक विघटन की अभिव्यक्तियाँ हैं।
भारत में बढ़ती पारिवारिक अस्थिरता- भारत में यह प्रवृत्ति अभी संस्थागत रूप में नहीं दिखती, लेकिन इसके लक्षण स्पष्ट हैं। हाल के वर्षों में-
प्रेम संबंधों के कारण वैवाहिक हत्याएँ,अवैध संबंधों में परिवारों का टूटना,बच्चों पर पड़ता गहरा मानसिक प्रभाव जैसी घटनाएँ बढ़ी हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।
गिरता स्त्री–पुरुष अनुपात: भविष्य की सामाजिक चुनौती
भारत के कई राज्यों में स्त्री–पुरुष अनुपात लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में दशकों से यह असंतुलन देखा जा रहा है। कुछ जिलों में यह अनुपात अब भी 900 से नीचे है। यह केवल जनसंख्या का आँकड़ा नहीं है। सामाजिक इतिहास बताता है कि जब प्राकृतिक लैंगिक संतुलन बिगड़ता है, तो-
विवाह कठिन हो जाते हैं
रिश्ते सौदे में बदलते हैं और सामाजिक तनाव बढ़ता है।
लैटविया में महिलाओं की संख्या अधिक होने से रिश्तों का असामान्य रूप लेना इस बात का प्रमाण है कि जनसांख्यिकीय असंतुलन सामाजिक संरचना को बदल देता है।
रोजगार, असमानता और मानसिक स्वास्थ्य- एक और महत्वपूर्ण पहलू है- रोजगार में बढ़ती असमानता। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को कम वेतन पर नियुक्त करना “लागत-कुशल” माना जाने लगा है। यह न तो वास्तविक सशक्तिकरण है, न समानता, बल्कि श्रम बाजार का असंतुलन है। दूसरी ओर, पुरुषों पर आर्थिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ और भावनात्मक दबाव लगातार बढ़ रहे हैं। पुरुषों में अवसाद और आत्महत्या की दर अधिक होना,इसी दबाव की ओर संकेत करता है। यह स्थिति किसी एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि संपूर्ण सामाजिक ढांचे की विफलता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और रिश्तों का उपभोग-आज डिजिटल माध्यमों पर “कम्पैनियन सर्विस”, “नो-अटैचमेंट रिलेशनशिप” और “लेडीज़ एस्कॉर्ट” जैसी सेवाएँ उपलब्ध हैं। इन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इनका व्यापक प्रभाव यह है कि मानवीय संबंध उपभोग की वस्तु बनते जा रहे हैं। जब साथ, संवाद और अपनापन भी सेवा की तरह खरीदे जाने लगें, तो समाज में विश्वास और स्थायित्व कमजोर पड़ता है। शारीरिक और मानसिक हास- आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक सक्रियता घट रही है और स्क्रीन-आधारित जीवन बढ़ रहा है। इसके साथ ही अश्लील कंटेंट की आसान उपलब्धता ने रिश्तों को अवास्तविक अपेक्षाओं से भर दिया है। इससे—असंतोष,हिंसा और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।
संस्कृति बनाम आधुनिकता-
भारतीय संस्कृति में विवाह और परिवार केवल सामाजिक संस्थाएँ नहीं, बल्कि संस्कार रहे हैं। आधुनिकता का अर्थ इन मूल्यों का त्याग नहीं, बल्कि उन्हें समय के अनुसार सुदृढ़ करना होना चाहिए। यदि रिश्ते केवल सुविधा पर आधारित होंगे, तो समाज स्थायी नहीं रह पाएगा। यह प्रगति नहीं, बल्कि सभ्यतागत संकट होगा।
लैटविया का उदाहरण हमें भविष्य की झलक देता है। यह समय है कि भारत आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन साधे।रिश्तों को बचाना केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सामाजिक प्राथमिकता है। क्योंकि जो समाज रिश्तों को खो देता है, वह अंततः अपनी पहचान भी खो देता है।