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लोक आस्था का महाकुंभ - बेणेश्वर महामेला

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28 Jan 26
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लोक आस्था का महाकुंभ - बेणेश्वर महामेला

भारतवर्ष में बड़े-बड़े मेलों में अग्रणी बेणेश्वर महामेला जगप्रसिद्ध है। देश-दुनिया में इसका बड़ा नाग है।  आदिवासियों के महाकुभ के नाम से विख्यात इस मेले में लाखों श्रृद्धालु हिस्सा लेते हैं। इनमें बहुसंख्य जनजाति समुदाय से आते हैं।

इसकी शुरूआत जया (माघ शुक्ल एकादशी) 29 जनवरी, गुरुवार को हरि मन्दिर पर ध्वजारोहण से होगी और 9-10 दिन तक मेले की धूम रहेगी। माघ पूर्णिमा 01 फरवरी को यह मेला अपने पूर्ण यौवन पर रहेगा।

बेणेश्वर का महामेला राजस्थान के दक्षिणांचल में बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों के बीच बेणेश्वर टापू एवं संगम तीर्थ पर लगता है जहां सोम, माही एवं जाखम नदियों का जल संगम तीर्थ है।

दक्षिणांचलवासियों के लिए यह प्रयाग, पुष्कर, गया, काशी आदि पौराणिक तीर्थों की ही तरह पवित्र महातीर्थ की पहचान रखता है। पवित्र संगम तीर्थ दिवंगत आत्माओं के लिए मुक्तिदायी है जहाँ अस्थि विसर्जन, तर्पण, मुण्डन आदि उत्तरक्रियाएं होती रही हैं। देव-दर्शन, मनोरंजन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, मेला बाजार, लोक रंगों और रसों का दिग्दर्शन, आंचलिक जनजीवन और रहन-सहन की धाराओं आदि का मनोहारी दिग्दर्शन होता है।

इसमें वाग्वर (वागड़) अंचल व पड़ोसी इलाकों के कई लाख लोगों के साथ ही देश के विभिन्न राज्यों से आए मेलार्थी भाग लेते हैं। परम्परागत लोक आस्था का यह धाम लगभग तीन सदियों से श्रद्धा तीर्थ रहा है। इस क्षेत्र के श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा मेला होने के कारण ही इसे महाकुंभ कहा जाता है।

हरिद्वार की तरह ही है मान्यता

इस अंचल के लोगों के लिए बेणेश्वर का त्रिवेणी जलसंगम तीर्थ प्रयागराज, काशी, गंगा, हरिद्वार, गया आदि की ही तरह मान्यता रखता है, जहाँ वे दिवंगतों की मुक्ति के लिए जरूरी सभी परम्परागत विधान पूरे करते हैं और इसके बाद शोक मुक्त होकर देव-दर्शन, सामूहिक प्रसादी आदि के उपरान्त मेले का आनन्द लेकर नई ऊर्जा और जीवनीशक्ति के साथ लौटते हैं।

भोर से ही पवित्र स्नान और अस्थि विसर्जन का दौर

एकादशी से लेकर कृष्ण पक्ष की पंचमी तक बेणेश्वर धाम पर पवित्र स्नान, उत्तर क्रिया अनुष्ठान, देव दर्शन, मेला बाजारों से खरीदारी से लेकर मेले का आनन्द पाने वालों का ज्वार उमड़ा रहता है।

ख़ासकर माघ पूर्णिमा को भोर से संगम जल तीर्थ आबूदरा में पवित्र स्नान, अस्थि विसर्जन तथा तटों पर पूजा-पाठ, पारंपरिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं जो दोपहर बाद तक चरम यौवन पर रहते हैं। संगम किनारे दूर-दूर तक दिवंगतों के प्रति श्रृद्धा और उनकी मुक्ति के लिए निर्धारित परम्पराओं का निर्वाह चलता रहता है।

पहाड़ी पर बेणेश्वर शिवालय

बेणेश्वर टापू की सबसे ऊँची पहाड़ी पर प्राचीन बेणेश्वर शिवालय है। यहां दर्शनार्थियों की रेलमपेल लगी रहती है। इसके साथ ही यहाँ वाल्मीकि, ब्रह्मा, गायत्री, हनुमान सहित विभिन्न देवी-देवताओं के मन्दिर, राजा बलि की यज्ञस्थली आदि श्रद्धा केन्द्र हैं। वाल्मीकि मंदिर पर बड़ी संख्या में लगने वाले रंग-बिरंगे ध्वजों, भक्तों का जमावड़ा और धार्मिक कार्यक्रमों का समन्वय मेले की रंगत को बहुगुणित करता है।

मेला रंगों और रसों का आनन्द

मेले में कई तरफा पसरे हुए मेला बाजार, रंगझूले, चकडौल, सर्कस, पिक्चर, मदारियों के कारनामें, मौत का कूआ, जादू, रेल, चिड़ियाघर आदि सभी विधाओं का जमावड़ा देखा जा सकता है। मेलार्थी अपने जरूरत की चीजों को क्रय करते हैं और घूम-घूम कर मेले का जी भर कर आनन्द पाते हैं।

पीठाधीश्वर के दर्शनों को उमड़ता है जन ज्वार

मेला स्थल के प्रमुख राधा-कृष्ण मंदिर में बेणेश्वर धाम के पीठाधीश्वर की गादी लगती है। मेलार्थी यहां आकर महन्तश्री से आशीर्वाद पाते हैं। इस समय संत मावजी महाराज की परम्परा में नवें महंत गोस्वामी श्री अच्युतानन्द महाराज हैं, जिन्हें बेणेश्वर पीठाधीश्वर के रूप में ख्यातिप्राप्त है।

लोक जीवन के सभी रंगों से भरे इन्द्रधनुषी बेणेश्वर महामेले में जीवन और जगत के उत्तरदायित्वों, घर-गृहस्थी और परिवेशीय कर्त्तव्यों के समसामयिक निर्वहन के साथ ही आनन्द, उमंग और उल्लास से जीवनयापन का संदेश संवहित होता है।

लोक जीवन, संस्कृति और साहित्य से लेकर राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की समन्वित लोक संस्कृति को जानने के इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए बेणेश्वर महामेला सर्वाधिक उपयुक्त है। एक बार जरूर मेले में आएं और अविस्मरणीय आनन्द का अनुभव करें।


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