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“हमें परमात्मा और अपनी आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना होगा तभी हम अविद्या व दुःखों से बच सकते हैं: आचार्य प्रदीप मिश्रा”

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08 Feb 26
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“हमें परमात्मा और अपनी आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना होगा तभी हम अविद्या व दुःखों से बच सकते हैं: आचार्य प्रदीप मिश्रा”

     आर्यसमाज धामावाला, देहरादून में प्रत्येक सप्ताह रविवार को प्रातः 8.30 बजे से सामूहिक यज्ञ होता है। यज्ञ आर्यसमाज के पुरोहित आचार्य विद्यापति शास्त्री जी कराते हैं तथा आर्यसमाज के कुछ अधिकारी एवं सदस्यों सहित श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे इसमें सम्मिलित रहते हैं। आर्यसमाज की स्त्री सदस्यायें भी यज्ञ में भाग लेती हैं वा यज्ञ में यजमान के आसन पर सुशोभित होती हैं। आज रविवार दिनांक 8-2-2026 को प्रातः 8.30 बजे से पं. विद्यापति शास्त्री जी ने यज्ञ कराया। यज्ञ के पश्चात आर्यसमाज के सभागार में भजन, सामूहिक प्रार्थना तथा ऋषि दयानन्द जी के जीवन चरित से कुछ प्रकरणों का पाठ आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने किया। उन्होंने भजन भी प्रस्तुत किया। इसके पश्चात प्रातः 10.00 बजे से आर्यसमाज के स्थानीय विद्वान आचार्य प्रदीप मिश्रा जी का आत्मा, परमात्मा आदि विषयों सहित विद्या, अविद्या एवं मोक्ष आदि विषयों पर प्रभावशाली उपदेश हुआ। अपने व्याख्यान में विद्वान वक्ता प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि मनुष्य के अन्दर सत्, रज व तम गुण विद्यमान होते हैं। सत गुण प्रधान होने पर मनुष्य को सुख मिलता है तथा रज व तम गुणों की प्रधानता होने पर सुख कम व दुःख अधिक मिलते हैं। उन्होंने कहा कि यह तीनों गुण जीवन भर मनुष्य के साथ रहते हैं इसलिये कोई भी मनुष्य पूर्ण सुखी कभी नहीं हो सकता। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि प्रकृति में सुख अवश्य है परन्तु यह सुख दुःख मिश्रित होता है। उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य दुःख नहीं चाहता। हम केवल सुख ही सुख चाहते हैं। आचार्य जी  ने कहा कि हमें अपना यह शरीर अपने पूर्व जन्मों में किये हुए कर्मों का फल सुख व दुःख भोगने के लिये मिला है। परमात्मा का इस सृष्टि को बनाने का प्रयोजन हमें हमारे कर्मों का सुख व दुःखरूपी फल देने के साथ हमें समस्त दुःखों से छुटा कर मोक्ष प्रदान करना है। आचार्य जी ने कहा कि हमारी आत्मा को परमात्मा ने प्रकृति व पंचभूतों से बना हुआ शरीर हमें दिया है। प्रकृति से बना हमारा यह शरीर ही हमारे दुःखों का कारण होता है। उन्होंने कहा कि हमारे दुःखों का कारण हम स्वयं हैं वा हमारे अतीत व वर्तमान के कर्म होते हैं। आचार्य जी ने कहा कि हमारी आत्मा का शरीर से संयोग होने का कारण हमारी आत्मा की अविद्या व हमारे पूर्व कृत कर्म होते हैं। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि जब तक अविद्या दूर नहीं होगी हम दुःखों से मुक्त नहीं हो सकते। आचार्य जी ने कहा कि हमें आज ही अपनी अविद्या को दूर करने का संकल्प लेना चाहिये। उन्होंने कहा कि यदि हम प्रयत्न करेंगे तो हमारी अविद्या अवश्य दूर होगी अथवा कम होगी। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने स्वामी सत्यपति जी का उल्लेख कर कहा कि उनके वचन हैं कि एक एक मनुष्य के मन में अविद्या का पहाड़ विद्यमान है। उन्होंने स्वामी सत्यपति जी के सभी शिष्यों के वैदिक धर्म के प्रचार के कार्यों की सराहना की। आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि स्वामी सत्यपति जी के शिष्यों ने देश देशान्तर में दर्शनों एवं योग विद्या का प्रचार करने का जितना संगठित प्रयास किया है उतना अन्य किसी व्यक्ति या संगठन ने नहीं किया है। 

    वैदिक साहित्य के अध्येता विद्वान आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि हम शरीर को आत्मा मानते हैं इसलिये हमें मृत्यु से डर लगता है। आचार्य जी ने अविद्या के अनेक व भिन्न भिन्न रूपों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब तक हम अविद्या को नहीं छोड़ेंगे वा अविद्या हमारे जीवन से दूर नहीं होगी तब तक हमारा कल्याण नहीं होगा। हमें परमात्मा और अपनी आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना होगा तभी हम अविद्या व दुःखों से बच सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो वस्तु जैसी है उसे ठीक ठीक वैसी ही समझना विद्या होती है तथा वस्तु के यथार्थ स्वरूप के विपरीत समझना अविद्या होती है। सत्य सर्वदा एक ही होता है। जब हमारी अविद्या पूर्णतः दूर हो जायेगी तब हमें अपने जीवन में कैवल्य वा मोक्ष की प्राप्ति होगी। 

    आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने योग के अन्तर्गत आत्मा को प्राप्त होने वाली अवस्था विवेक ख्याति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य वा उसकी आत्मा को आत्मा व परमात्मा सहित प्रकृति व सृष्टि का यथार्थ ज्ञान होना ही विवेक ख्याति है। आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने कहा कि यह संसार अपने आप नहीं बना है। इसे बनाने वाला सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी परमेश्वर है। आचार्य जी ने कहा कि संसार में हम जितने भी पौरुषेय वा अपोरुषेय पदार्थों को देखते हैं उन सबकी रचना का निमित्त कारण वा बनाने वाली एक चेतन सत्ता परमात्मा व मनुष्य आदि प्राणी होते है। 

    आचार्य जी ने कहा कि हमारे जीवन का प्रमुख लक्ष्य परमात्मा का साक्षात्कार करना है। ईश्वर का साक्षात्कार होने पर मनुष्य मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनता है। ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिए मनुष्य को योगाभ्यास करने सहित योग के सभी अंगों को सिद्ध व सफल करना आवश्यक है। आचार्य प्रदीप मिश्रा जी ने सभी श्रोताओं को योग दर्शन का अध्ययन करने व उसके अनुसार जीवन को व्यतीत करने की प्रेरणा की। आचार्य जी ने बताया कि योगाभ्यास करने से प्रतिक्षण मनुष्य की अविद्या का नाश होता है तथा विद्या की वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि योगाभ्यास की सफलता से विवेक ख्याति का प्राप्त होना होता है। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि हम अपने जीवन के उद्देश्य को जानें और उसे सफल करने के लिये प्रयत्न करें।

    व्याख्यान की समाप्ति पर आचार्य पं. विद्यापति शास्त्री जी ने श्री प्रदीप मिश्रा जी का आज के सुन्दर व्याख्यान के लिये धन्यवाद किया। उन्होंने कुछ सूचनायें भी दी। शान्ति पाठ के साथ आज का सत्संग समाप्त हुआ। आज के कार्यक्रम में आर्यसमाज के सदस्यगण बड़ी संख्या में उपस्थित थे। श्रीमती कमला नेगी, श्रीमती सुदेश भाटिया जी, माता जगवती चौधरी सहित श्री कुलभूषण कठपालिया, डा. विनीत कुमार, श्री संजय भल्ला, श्री हर्षदेव शर्मा, श्री ज्ञानचन्द गुप्ता, श्री अशोक आर्य, श्री आदर्श कुमार अग्रवाल, श्री देवकीनन्दन शर्मा, श्री पवन कुमार, श्री बसन्त कुमार एवं बालवनिता आश्रम के बच्चे बड़ी संख्या में आर्यसमाज के सत्संग में उपस्थित थे। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121 
 


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